सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ
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सुश्रुतसंहिता
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| चार रसों के संयोग | ७६६ | षट्चषट्टितमोऽध्यायः | कितने एकवाले, दो वाले अथवा | ||
| छ रसों का संयोग | ८०० | तंत्रयुक्ति अध्याय का व्याख्यान | ८०६ | तीन वाले | ८०९ |
| स्वस्थवृत्त अध्याय का | ८०१ | ३२ तंत्र युक्तियाँ | ८०६ | पथ्य रसों से अविकृत तीन | |
| चिकित्सा प्रयोजन | ८०१ | तंत्र युक्तियों का लाभ | ८०६ | दोष | ८१० |
| जिस २ श्रुतु में जो २ दोष | अधिकरण, योग, पदार्थ, हेतुर्थ, | षोडश कलावाला पुरुष | ८१० | ||
| प्रकृपित होते हैं उन २ | उद्देश, निर्देश, उपदेश आदि | सत्त्व, रज, तम के भिन्न प्रकार | ८१० | ||
| श्रुतुओं में वे २ रस | के लक्षण | ८०७-८०९ | पृथक् रूप में वात, पित्त, कफ | ||
| देने चाहिये | ८०१-८०२ | षट्षष्टितमोऽध्यायः | तीन दोषों में | ८११ | |
| भोजन के १२ विभाग | ८०४ | दोष भेदविकल्प अध्याय का | दोष रक्तादि धातु आदि में | ||
| औषध के १० काल | ८०४ | व्याख्यान | ८०६ | मिलकर असंख्येय बनते हैं | ८१२ |
| आहारकाल | ८०५ | रसभेदविकल्प में कहे ६२ भेदों में | ब्राह्म वचन | ८१२ |