सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 52, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें"~~ "4
५ ुश्रतसं हिता
शान्ति कर्म बक्िदान आदि के द्वार प्रह की शान्ति क ल्य
भूतविद्या दै । |
(५) कौमारमूत्य--ब्रालकं के भरएपोपषण धात्री के दुघ
क दोभों के संशोधन के लिये, दूषित स्तन्य के कारण (शरा
सकि) एवं इ््रह के कारण ( आगन्त॒ज ) रोगो कौ शा न्तिके
व्यि कोमारमभृत्य दे । स
(६) अगदतन्ब-खाप, कीड़ा, मकड़ी, चे आदि कं दश॒
से उन्न विषरोग की परीक्षा के व्यि तथा नाना प्रकारं के
विधो के संयोग से उन्न इए विकारो कौ शान्ति क ल्य
अगदतन्तर हे ।
(७) रसायनतन््र-अवस्था को बनाये रखने के ल्यः
आयु, मेधा ओर ब को बढाने के व्यि, तथा रोगों को दूर
करने की शक्ति के व्यि, १रसायनतन्तर दे ।
(८) बाजीकरण तन्ब- स्वभाव से ही अल्पवीयवाटे
पुरुषों मे वीयं को बद़ाने के यि, वात आदि मे दूषित शुक्रवालों में श॒क्र के शोधन के ट्य, किन्दीं कारणों से स्वाभाविक
परिमाण मे क्षीणशयक्रवालो में शुक्र की ब्द्धि के व्यि, बदा
वस्था के कारण शुष्कवीयंवाखों मे शुक्र पेदा करने के ल्यि
` तथा खीप्रसङ्ग मे प्रहपं उत्पन्न करने के च्थि वाजौकरण हे 1
एवमयसायुवदोऽषटाङ्ग उपदिश्यते; अत्र कस्म किमु
च्यतामिति (€)
~~ -- ~ -----*
१ रसायन-'रसराब्देन
लाभोपायः रसायनम् 1 जसा करि चरक मे कहा है-
लाभोपायो हि शस्तानां रसादीनां रसायनम् ॥
२ जिस प्रकार आजकरू रावित के माप की इकाई घोडा माना
गया है, उसी प्रकार प्राचीनकार मं घोड़े की ही शक्ति से तुरना
की जाती थी) इसी संकटा द-
` “ज्जवाजितनं वाजिने कुर्वन्ति मनेन -इति वाजीकरणम् । येन वा
अत्यर्थ व्यज्यते स्त्रीषु शुक्रं तद् बाजोकरणम् 1” जैसा कि चरक
` मे कहा है--
येन नारीष साम्यं वाजिव्रल्लभते तरः ।
व्रजते चाधिके येन वाजीकरणमेव तत् 11
अथवा वाजो वेग प्रस्तावाच्छक्रस्य, स ~ विद्यते येषां ते.
वाजिनः, ते क्रियन्तेऽनेन इति वाजीकरणम् । अथवा ` वाजः, ाक्र- |
~ सोऽस्यास्ति-इति-वाजीः-अवाजी वाजी क्रियते येन तद वाजीकर- । . करणम् 1 कि वां, वाजो मैथुनम्-उक्तं हि हारीते-- |
वाजो नाम प्रकारत्वाच्तच्च मेयनसंञ्जितम ।
| वाजीकरणसंनाभिः संजाभिः पुस्त्वमेव ` प्रचक्षते ॥
रसकार्यत्वात् सवषामेव धातूनां
ग्रहणम् 1 तेन रसादीनां शुक्रान्तानां, कि वा रसवीर्यवपाकानामयन `
राक्रसर तिकर“किचित्, किचित् शक्रविवर्धनम् ।
| अ०१
इस प्रकार से यह आयुर्वेद आठ अज्ञोवाखा कहा जाता
है। इन आठ अङ्गं मे से किस अङ्ग का तुम्हारे मे से किसके
लिय, उपदेश करू, वहं कहौ ॥६॥।
त ऊचुः अस्माकं सवषामेव शल्यज्ञानं मूं खो
पदिश्जतु भगवानिति ॥१०॥
उन शिष्यो ने कहा--हे भगवन् ! आप राल्य ज्ञानको
मुख्य रखकर हम सब को आयुवेद का उपदेश दे ॥१०॥।
स उवाचेवमरिःति ॥११॥
भगवान् धन्वन्तरि ने कहा-एेसा हौ सदी ॥११॥
त॒ उचुभूयोऽपि भगवन्तम्-अस्माकमेकमतीन
मतममिसमीदय सुश्रतो भगवन्तं प्रद्यति; अस्म चोपदि-
रयमानं वयमप्युपधारयिष्यामः ॥१२॥
स॒श्रत आपसे पूछेगा जौर इस सुश्रुत को सम्बोधन करके कै
उपदे को हम सव धारण करगं ॥१२॥
स होवाचेवमस्सिति ॥१३॥
भगवान् धन्वन्तरि ने कहा--रेखा दी सही ।।१३॥
वत्स सुश्रत । इह खल्वरायुवदप्रयोजनं--व्याध्युपसछान् व्याधिपरिमोक्षः, स्वस्थस्य रक्वणं च ॥१४।।
शाख का प्रयोजन-रोगोंसे आक्रान्त प्राणियों कोरोगं से
आयुरस्मिन् विद्यते, अनेन वाऽध्युर्विन्दन्तिः इत्या-
युवद्ः ॥१५।। |
इनके संयोग का नाम आयु है, यह इस आयुवंद् में हे, अथवा
इस शाख के दवारा आयु प्राप्त होती दहे, इसल्यि यह आयु
वेद हेर ॥१५॥
सर तिवद्धिकरं किचित्, तरिविधं वष्यम् च्यते ॥
प्ररामनं च.1। चरक सूत्र अ०३०॥ - ५
२. (१) -हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम् ।
` _ - सान तच्च यच्चोवतमायुवदः स॒ उच्यते ॥
(२) हिताहिततः, सुखासुखंतः अ्रभााप्रपाणतक्च तदायु व॑द“
स स र^ | यतीत्यायुवंदः । यतस्चोयुष्याणिं, अनायुष्याणि च दव्यगुणकंमा
शठदास सत, यहं वाजकरण् तीन भकार कहा है। यथा-- । वेदयति ततोऽप्ययमायुरवेदः ॥ च० सू ० अ० ३० ।
| ` तत्र स् तिकर-स्त्रीस्पर्गादि, वद्धिकरं क्षीरादि; स तिवृद्धि
करं माषादि। | १ प्रयोजन. चास्य-स्वस्थस्थ स्व्ारथ्यरचणमातुरस्य विकार
उन िष्यों ने फिर मी भगवान् धन्वन्तरि को कहा-क्रि
एक विचारवाल्ते हम खों के अभिप्राय कोष्यानमंरखक्रर्
हे वत्व सुश्रत ! आयुवद्रोद्पत्ति के विषय मे-आयुवंद् . |
मुक्त करना ओर स्वस्थ मनुष्यों के स्वास्थ्य कीरक्षा करना है । ˆ
आयुवेद की निरुक्ति--शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व ओर आत्मा प
"---
2 ०9७०० [4.५