भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० १]

सूत्रस्थानम्

वि० मन्तव्यम्—'इह खलु' का तात्पर्य-इस ग्रन्थ में या इस अध्याय में या हमारे विचार में यह माना जाता है, निश्चय किया गया है या कहा जाता है भले ही अन्य ग्रन्थों में प्रकरणों में अध्यायों में अथवा अन्य आचार्यों के विचार मत में कुछ भी माना जाता हो निश्चय किया गया हो या कहा जाता हो। इस प्रकार विरोध तथा विरोधाभास का निराकरण हो जाता है जो मित्र २ प्रकारों, दृष्टिकोणों या विधिभेदों के अनुसार कहे गये विषय विरुद्ध (परस्पर या पूर्वोपर विरोधी) प्रतीत होते हैं ॥

तद्यथा—शल्यं, शालाक्यं, कायचिकित्सा, भूतविद्या, कौमारभृत्यम्, अगदतन्त्रं, रसायनतन्त्रं, वाजीकरणतन्त्रमिति ॥७॥

यथा—शल्य, शालाक्य, कायचिकित्सा, भूतविद्या, कौमारभृत्य, अगदतन्त्र, रसायनतन्त्र और वाजीकरण तन्त्र ॥७॥

अथास्य प्रत्यङ्गलक्षणसमासः—

तत्र, शल्यं नाम विविधतृणकाष्ठपाषाणपांशुलोहलोष्टास्थिबालनखपूयास्त्रावदुष्टव्रणान्तर्गर्भशल्योद्भरणार्थं, यन्त्र-शस्त्रस्त्रारान्नप्रणिधानव्रणविनिश्चयार्थं च ॥१॥

शालाक्यं नामोर्ध्वजत्रुगतानां श्रवणनयनबदनघ्राणादिसंश्रितानां व्याधीनामुपशमनार्थम् ॥२॥

कायचिकित्सा नाम सर्वाङ्गसंश्रितानां व्याधीनां ज्वररक्तपित्तशोषोन्मादापस्मारकुष्ठमेहातिसारादीनामुपशमनार्थम् ॥३॥

भूतविद्या नाम देवासुरगन्धर्वयक्षरक्षःपितृपिशाचनागमह्राद्युपसृष्टचेतसां शान्तिकर्मबलिहरणादिग्रहोपशमनार्थम् ॥४॥

कौमारभृत्यं नाम कुमारभरणधात्रीक्षीरदोषसंशोधनार्थं दुष्टस्तन्यग्रहसमुत्थानां च व्याधीनामुपशमनार्थम् ॥

अगदतन्त्रं नाम सर्पकीटतूतामूषकादिदुष्टविषयज्जन्तार्थं विविधविषसंयोगोपशमनार्थं च ॥६॥

रसायनतन्त्रं नाम वयःस्थापनमायुर्भधाबलकरं रोगाहरणसमर्थं च ॥७॥

वाजीकरणतन्त्रं नामाल्पदुष्टक्षीणविशुष्करेतसामाप्याग्रनमसादोपचयजनननिमित्तं प्रहर्षजननार्थं च ॥८॥

अब इन आठ अङ्गों में से प्रत्येक अङ्ग का लक्षण संक्षेप में कहते हैं। इनमें—

शल्य से अभिप्राय—नाना प्रकार के तिनके, काष्ठ, पत्थर, धूलि, लोहा, घातु, ढेला, अस्थि, बाल, नख, पूय, स्त्राव, दूषित व्रण, अन्तः शल्य, गर्भशल्य आदि को निकालने के लिये और यन्त्र, शस्त्र, स्नार, अग्नि के प्रयोग के लिये एवं व्रण के निश्चय के लिये, शल्य शास्त्र है।१

जत्रु ( ग्रीवामूल अथवा अंस सन्धि ) से ऊपर के रोग अर्थात्, कान, आँख, मुख और नासिका आदि में होनेवाले रोगों की शान्ति के लिये शालाक्य शास्त्र है।

वक्तव्य—जत्रु—शब्द से मिलता हुआ शब्द 'जात' या 'जोता' है। बैलों को गाड़ी में जोतते समय उनके गले के नीचे जो पड़ी या रस्सी जूले में बाँधी जाती है, उसे जोत कहते हैं। यह पड़ी जहाँ गले में बाँधती है, उस भाग का नाम जत्रु है।

(२) शलाका—पटलवेधनी—यह अर्थ है। लिंग नाश की चिकित्सा में शलाका का उपयोग सुश्रुत में बताया गया है। यथा—

नाधो नोर्ध्वं न पाश्चाभ्यां छिद्रं देवकृते ततः।

शलाकया प्रयत्नेन विश्वस्तं यवकृया ॥

मध्यप्रदेशिन्यंगुष्ठस्थिरहस्तगृहीतया।

दक्षिणेन भिषक् सव्यं विध्येत् सव्येन चेतर्त् ॥

सु० उ० अ० १७ ॥५६,६०॥

और चूँकि जत्रु से ऊपर के मुख, नाक, शिर, कान के रोगों में आँख के रोग ही अधिक हैं और इनमें आँख ही प्रधान है, इसलिये इस अङ्ग का नाम शालाक्य रक्खा गया है१।

(३) काय चिकित्सा—सारे अङ्गों में होने (प्रभाव डालने) वाले रोगों की अर्थात्, ज्वर, रक्तपित्त, शोष, उन्माद, अपस्मार, कुष्ठ, प्रमेह, अतिसार आदि रोगों की शान्ति के लिये कायचिकित्सा है।

वक्तव्य—'काय' का अर्थ सम्पूर्ण शरीर है, इसकी चिकित्सा कायचिकित्सा। अथवा 'कायति शब्दं करोति—इति कायो जाठराग्निः, अंगुलिपिहिते कर्णयुगले धुक इति शब्दश्रवणात् तास्थ्याद् वा कायशब्देन अग्निरुच्यते। उक्तं च भोजेन—

जाठरः प्राणिनामग्निः काय इत्यभिधीयते।

यस्तं चिकित्सेत् सीदन्तं स वै कायचिकित्सकः ॥

क्योंकि ज्वर, अतिसार आदि रोग अग्नि के दोष से ही होते हैं। इसी से कहा है—

शान्तेऽग्नीं प्रियते, युक्ते चिरं जीवत्यनामयः।

रोगी स्याद् विकृते मूलं, अग्निस्तस्मान्निरुच्यते ॥

चरक चि० अ० १५।

(४) भूतविद्या—देव, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितर, पिशाच, नाग, ग्रह आदि के आवेश से दूषित मनवालों की

अतिप्रवृद्ध मलदोषजं वा शरीरिणां स्थावरजंगमानाम्।

यत् किंचिदाबाधकरं शरीरे तत् सर्वमेव प्रवदन्ति शल्यम् ॥

१ जत्रु से ऊपर के रोगों में प्रायः शलाका से काम किया जाता है इससे शालाक्य नाम है।

१ शल्यम्—शल्य-हिंसायाम्-अथवा, शल्य-शलनम्—हिंसा इत्यर्थः—इसी से कहा है—