भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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विषयानुक्रमणिका

१७

विषयपृष्ठ
क्षेत्र नष्ट करने के कई उपाय४२८
किलास नाश का उपाय४२८
नीलघृत४२८
महानील घृत४२८
कुष्ठरोगी के लिये वसन
विरेचन अवश्य४२९
कुष्ठरोग के लिये सिद्ध किया
पुरातन घृत कुष्ठ नाशक४२९
स्नान में क्वाथ४३०
नीम का क्वाथ४३०
कुष्ठ में क्रमि नाश के लिये४३०
वज्रक तैल४३०
महावज्रक तैल४३०
लाक्षादि तैल४३१
दोषों के शांत होने पर स्नान
क्वाथ तथा पीने के लिये४३१
दोष का प्रकोप न हो ऐसे
उपाय४३१
सम्पूर्ण रूप में वरता खैर कुष्ठ को
शक्ति भर नष्ट कर देता है४३१
दशमोऽध्यायः
महाकुष्ठ चिकित्सा व्याख्यान४३१
मन्थकल्प४३२
अरिष्टों का वर्णन४३२
आसवों का वर्णन४३२
सुरा का वर्णन४३२
लेहों का वर्णन४३२
चूर्ण किया४३३
अयस्कृतिका वर्णन४३३
खदिर विधान४३४
गिलोय का क्वाथ४३४
काले तिलादि का योग४३५
एकादशोऽध्यायः
प्रमेह चिकित्सा की व्याख्या४३५
दो प्रकार का प्रमेह४३५
रुध के लिये संस्कृत किया४३५
रक्त पुरुष के लिये अपतर्पणवाली
किया४३५
सब प्रकार के प्रमेही को
विषयपृष्ठ
त्यागने योग्य४३६
सब प्रकार के प्रमेही को खाने योग्य४३६
स्निग्ध प्रमेह रोगी के लिये४३६
पांच योग सब प्रमेहों के लिये४३६
विशेषरूप से वर्णन४३६
बड़े ऐश्वर्य वाले के लिये४३७
गरीब के लिये४३८
द्वादशोऽध्यायः
प्रमेह पिडका चिकित्सा व्याख्यान४३८
साध्य पिडकायें४३९
प्रमेह रोगी की प्रारम्भ में ही चिकित्सा४३९
धान्वन्तर घृत४३९
तीक्ष्ण विरेचन४४०
स्वेद कभी भी न देना चाहिये४४०
प्रमेहियों में दोष ऊपर को नहीं जाते४४०
अपक्व तथा पक्व पिडकाओं की चिकित्सा४४०
लेह सब प्रमेहों के नाश के लिये४४०
नवायस४४०
लोहारिष्ट४४०
त्रयोदशोऽध्यायः
मधुमेह चिकित्साका व्याख्यान४४१
शिलाजतु रंगादि छ में से किसी के मिला रहता है
जो शिलाजतु लौह से उत्पन्न होता है
रंगादि छ में से शिलाजतु उत्तरोत्तर श्रेष्ठ होता है
सब प्रकार के शिलाजतु४४१
शिलाजतु सब रोगों को नष्ट करता है४४१
शिलाजतु और माक्षिक सेवन करनेवाला कपोत और कुलत्थ को छोड़ दे४४१
तुवरक फल का तैल४४१
विषयपृष्ठ
चतुर्दशोऽध्यायः
उदररोग की चिकित्सा का व्याख्यान४४२
बद्धगुदोदर और परिखावी असार्ध शेष कष्ट साध्य४४२
उदररोगी को खाने योग्य४४३
वातोदररोगी के लिये विदारीगन्धादि४४४
पित्तोदररोगी को काकोल्थादि४४४
कफोदररोगी को पिप्पल्यादि४४४
दृष्योदररोगी के लिये घृत४४५
इसमें सामान्ययोग४४५
कोष्ठ के क्रमियों को नाश करने के लिये४४५
आनाहवर्ति किया४४६
प्लीहोदररोगी के लिये४४६
घट्टपलक घृत४४६
प्लीहा की शांति के लिये४४६
बद्धगुद उदर तथा परिखावि उदर के लिये४४६
पञ्चदशोऽध्यायः
दकोदर रोगी के लिये४४७
मृदुगर्भ चिकित्साव्याख्यान४४७
मृदुगर्भ को निकालना महाकठिन४४८
मृदु गति आठ प्रकार की होती है
गर्भ के जीवित रहने पर
अपरा पातन की औषधियों का प्रयोग४४९
अन्य उपाय
पिप्पली आदि का प्रयोग४५०
बला तैल
तिलों को बला क्वाथ से भावित कर तैल निकालना४५०
शतपाकी तैल
बला तैल के समान तैल४५१
षोडशोऽध्यायः
विद्रधि की चिकित्सा का व्याख्यान४५१