सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 58, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें१०
मुश्रुतसंहिता
[ ७० ]
को गोबर से लेपकर इस पर कुशा बिछा दे। फिर रत्न, फूल, लाजा, ( चावल आदि ) अन्न से देवताओं का, ब्राह्मणों का, वैद्यों का पूजन करे। फिर, इस स्थान पर ऊर्ध्वमुखी रेखाकरके इसे जल से प्रोक्षण करके, ब्रह्मा को दक्षिण दिशा में बैठाकर अग्नि प्रज्वलित करे। खैर, ढाक, देवदार, विल्व इनकी समिधाओं से, अथवा, बड़, गूजर, पीपल, सहुवा इन चार खीरी वृक्षों की समिधा से, दही, शहद, घी इनके साथ दार्वी होम विधि से, ओं मूः स्वाहा, ओं सुवः स्वाहा, ओं स्वः स्वाहा—इस ओंकार विधि पूर्वक सुवे से घृत की आहुति देते हुए, तथा प्रत्येक के लिये (ब्रह्मणे स्वाहा, प्रजापतये स्वाहा, अश्विभ्यां स्वाहा, इन्द्राय स्वाहा), प्रत्येक ऋषि के लिये (धन्वन्तरये स्वाहा, भारद्वाजाय स्वाहा, अत्रेयाय स्वाहा) 'स्वाहा' इस शब्द के साथ घी की आहुति देवे। शिष्य भी इसी प्रकार से करे।
वि० मन्त्रव्यं—ज्योतिःशास्त्रानुसार—उपनयन के लिये—प्रशस्त तिथि—द्वितीया, तृतीया, प्रतिपदा, एकादशी, द्वादशी तथा दशमी। भद्रा से अतिरिक्त कर्ण, नक्षत्र—हस्त, अश्विनी पुष्य, तीनों उत्तरा, रोहिणी, आरुलेवा, स्वाती, पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, मूल, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, तीनों पूर्वा, आर्द्रा। वार—रविवार, बुध, गुरु, शुक्र। उक्त तिथियाँ शुक्लपक्ष की हों और कृष्णपक्ष में प्रतिपदा से पञ्चमी पर्यन्त। समय—मध्याह्न से पूर्व। मास—ब्राह्मण के लिये वसन्त—चैत्र एवं वैशाख, क्षत्रिय के लिये मीक्षम—ज्येष्ठ एवं आषाढ़, वैश्य के लिये शरद—आश्विन एवं कार्तिक। मुहूर्त—दैवज्ञ से पूछिये ॥ ४ ॥
ब्राह्मणस्त्रयाणां वर्णानामुपयनं कर्तुमर्हति, राजन्यो द्रव्यस्य, वैश्यो वैश्यस्येवेति। (शूद्रमाप कुलगुणसंपन्नं मन्त्रवर्जमुपनीतमध्यापयेदित्येके) ॥५॥
ब्राह्मण तीनों वर्णों का उपनयन कर सकता है, क्षत्रिय दो वर्णों का (अपना और वैश्य का), वैश्य—वैश्य का ही उपनयन कर सकता है। कई आचार्यों का मत है कि यदि शूद्र आयुर्वेद पाठि कुल में उत्पन्न हो, तथा शौच शील आदि गुणों से युक्त हो तो, मन्त्र (ओं मूः स्वाहा) को छोड़कर इसको उपनयन देकर आयुर्वेद पढ़ाना चाहिये। (चरक) में ब्राह्मण, राजन्य और वैश्य के लिये आयुर्वेद पढ़ने का विधान करके—फिर 'सामान्यतो वा धर्मार्थकामपरिग्रहार्थं सर्वैः'—यह कह दिया है ॥ ५ ॥
ततोऽग्निं त्रिःपरिणीयामिनसाक्षिकं जिष्यं वृयात्—कामक्रोधलोभमोहमानाहङ्कारैर्योपाख्यपैशुन्यानुनालस्या-
१ दार्वी होमविधि—मीमांसासादर्शन के आठवें अध्याय के चौथे पाद में देखिये। अथवा सामान्य होम की विधि से यज्ञ करना चाहिये।
यशस्यानि हित्वा नीचनखरोष्णा शूचिना कषायवाससा सत्यव्रतब्रह्मचर्याभिवादनतपरेणावश्यं भवितव्यं, मदनु-मतस्थानगमनशयनासनभोजनाध्ययनतपरेण भूत्वा मत्प्रियहितेषु वर्तितव्यम्; अतोऽन्यथा ते वर्तमानस्याधर्मो भवति, अफला च विद्या, न च प्राकार्यं प्राप्नोति ॥६॥ अहं वा त्वयि सम्यग्वर्तमाने यद्यन्यथादर्शी स्यामेनोभारभवेयमफलविद्यश्च ॥७॥
स्वाहाकार के पीछे अग्नि की तीन बार प्रदक्षिणा कराके शिष्य को—अग्नि की साक्षि रखकर आचार्य उपदेश दे—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मान, अहंकार, ईर्ष्या, कठोरवाणी, खल्ला, भूत, आलस्य एवं निन्दित कर्मों को छोड़कर, नख और सिर के बाल कटाकर, पवित्रता के साथ, कषाय वस्त्र पहिनकर, सत्य, शास्त्रोक्त नियम, ब्रह्मचर्य, नामोच्चारण पूर्वक अभिवन्दन करते हुए, सदा बरतना चाहिए। मेरी आज्ञा से उठना, बैठना, जाना, सोना, खाना, पढ़ना चाहिये। मेरे प्रिय एवं हितकारी कार्यों में तुमको बरतना चाहिए। यदि इससे विपरीत करोगे तो तुमको अधर्म होगा, विद्या भी निष्फल जायेगी, विद्या कभी प्रकाशित नहीं होगी। और यदि तुम्हारे ठीक प्रकार से व्यवहार करने पर भी मैं इसमें विपरीत मिथ्याचरण करूँ तो मैं पाप का भागी बनूँ और मेरी विद्या व्यर्थ हो। (चरक में—“त्रिः पक्षस्य केशश्मश्रुलोमनखान् संहरेत्”—यह पाठ है—परन्तु शाल्यशास्त्र होने से इसमें इस नियम का अपवाद रखकर—'सदा नीचनखरोष्णा'—इसका पालन करना चाहिये) ॥ ६-७ ॥
द्विजगुरुदरिद्रमित्रप्रव्रजितोपनतसाध्वनाथाभ्युपगतानां चात्मबान्धवानामिव स्वभेषजैः प्रतिकर्तव्यम्, एवं साधु भवति; व्याधशाकुनिकपतितपापकारिणां च न प्रतिकर्तव्यम्; एवं विद्या प्रकाशते, मित्रयशोधर्मार्थकामांश्च प्राप्नोति ॥८॥
रोगी परिचर्या के लिये उपदेश—
ब्राह्मण, गुरु, दरिद्र, मित्र, संन्यासी, पास में नम्रतापूर्वक आये, सत्युत्पन्न, अनाथ, दूर से आये सज्जनों को चिकित्सा स्वजनों को भाँति अपनी औषधियों से करनी चाहिये। इस प्रकार करने से मंगल होता है। व्याध, चिड़ियार, नीच, पाप कर्म करनेवालों की चिकित्सा में अर्थ लाभ की इच्छा से भी प्रवृत्त नहीं होना चाहिये। इस प्रकार करने से विद्या प्रकाशित होती है, तथा मित्र, यश, धर्म अर्थ और काम की प्राप्ति होती है ॥ ८ ॥
१ चरक विमान—अध्याय में इसको सुन्दर रूप से लिखा है, यथा—त्वया गोब्राह्मणमादै कृत्वा सर्वप्राणभूतां शर्माशयितव्यम्। सर्वात्मना चातुराणामारोग्याय प्रयतितव्यम्। जीवित-