सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
१६
विषय
पच साध्य बिद्रधियां
वातजन्यविद्रषि
पित्तजविद्रधि
करंजादिघत
कफजन्यविद्रषि में
रक्तजन्य ओर आगन्व॒ज
विद्रधिर्या
कृफजन्य अन्तः विद्रधि
पक्र विद्रधि की चिकिस्छा
मज्जाजन्यविद्रषि सप्रदओोऽध्यायः विसरष-नाडी-स्तन रोग
चिकित्सा ६ साध्य तथा असाध्य विप
वातजन्यविसप
पित्तजन्यविसपं मे केप
गोयांदिघत
कृफजन्य विखप के लिये अजगन्धा
आदि्छेप
वरुणादिगण का प्रयोग
वरेण को शोघन करनेवाला
तेल ` पित्तजन्य नादी =
कोष्टस्थित नाडी को नष्ट
करने का घत
कफजन्य नाडी में
हाल्यजन्य नाडी में
कृश दुं पुरष की नाडी
सब वर्तयां नाड्यां में
बरतनी चाहिये
दुध क विक्त होने पर
उसका शोघन
स्तन विद्रधि
ग्रन्थि, अपची अदु द्, गक्ग्ण्ड ।
। चिकित्षा का व्याख्यान
४५
2
सुश्रतसं हितां
पुष | विषय
४५१ | पित्तजन्य म्रन्थि मे
४५१ | कफजन्य ग्रन्थि मं
५१ | जो ग्रन्थि उपरोक्त चिकित्षा
से शातन दहो उसे चीरकर
निकाल दं
मांस कन्दी के लि
मे दोजन्यग्रन्थि में
जीमूतक आदि से सिद्ध घुत
ममंस्थान से रहित स्थानों मे
अपक्त म्रथिरयों के विषय में
इन्द्रवस्तिमम
अपंचियों क निड्त्ति के यि
रोपण काल में
कर्कार चूर्णं आदि पित्ताबुदमें कफाबुद में
अन्द् पर ल्ेपादि ` मेदो द स्वेदन आदिः
बातजन्य गण्ड मे स्वेद
कफजन्य गण्ड मं स्वेद आदि
४५४
४५४
४५४
४५४
४५४
$प्र ४
क न च ४५४
मेदोजन्य गलगण्ड में ४११ स्नेहन आदि
४१५
४५५
५२ का व्याख्यान `
बृद्धिरोग
वातब्रद्धि मे -
पित्तजन्य इद्धि में
फफजन्य बृद्धि भ
मेदजन्य ब्द्धि्मे ..
. | मूत्रजन्यव्रद्धिमे
-साध्यउपदंशोर्मे
वातजन्य उपदंश में
वैत्तिकं उपदंश मे
५५६
४५७ ४१७
| प्रकारे उपद्श् के ल्थि चूण
गर्रण्डरोग मे चिकट आदि `
एकोनविज्ञोऽध्यायः
चरद्धिः उपदंश, श्टीपद, चिकित्सा
अत्रबदिको छोड बाकी-छ ~ =:
--3 ४६२ - ४६३
२४६३
९२
~ ~
ः = < | < 4 ४६४ ४६४
४: कफजन्य उपदंश मँ ~ ˆ - : ४६४
| उपद्् चिक्त्ा सब : 1 ४६५ ६
पृष्ठ
४५८
४६८
४५६
४५६
४५६
४५६
४६०
४६०
४६१
४६१
४६१
४६१
४६१
४६२१
४६२ ~ ४६२
23
४६२
४६२
४६२
४६२
-जवुमणि आदि ्
न्यच्छ, व्यंग ओर नीलिका
-चिषश्ड प्रकशमं.
गुद्श्रशम -4
एकविंशतितमोऽध्यायः |
शक्रदोष चिकिस्वा का व्याख्यान . ४५
अष्टील्कामे ` -
विषय
उपद॑शों मँ रोपण के स्यि तेख तरणजन्य विषपं के.ख्यि चूं
रक्त जन्य ओर सन्निपातजन्य
उपदश
सन्निपातजन्य उपदंश में विशेष
चिकित्सा
वातजन्यश्लोपद मे स्नेहन आदि
कफजन्य श्लोपद् में
पित्तजन्य श्लोपद् में
पानीयक्षार
काकादनी आदिमे सिद
किथा तेख
त्रिफला क्राथ मिलाया क्षार
विंशतितमोऽध्यायः
लुद्ररोग चिकित्साका व्याख्यान
अपक्व अजगल्लिका मं
स्वेद तथा लेप
पित्तजन्य विसपुः
चिप्परोग~;“
पकी विदारिका को चीरना
शकरा दकी चिकित्सा
पाददारी मे स्नेहन आदि
अलसरोगण म~~
इन्द्रलुक्त मं
अरूषिका में
दाङ्णकःरोग मं मसूरिका मे
युवान पिड़काओं मे
पद्मिनी कटक रोगमं.
परिवर्तिकामं
वल्मीकमं ._
अहिपूतना रोग मं
सषपी मं व्रण रोपकः तेल
वि्ष॑य |
ग्रथित को निरन्तर नाडी स्वेद
अछ्जी को जोक लगाकर
मृदित को वला ते से
संमूढ पिडका में
अवमन्यमें
उत्तमा में
शतपोनक, रक्तजन्य मं
द्रा विञ्चतितमोऽध्यायः
मुखरोग चिकित्सा व्यास्यान
खाध्य ओष्ठ प्रकोपं की
चिकित्सा
दन्तमूल मेँ होनेवाल रोगों की
चिकित्सा
द्न्तवेष्टमें
उपकुशरोग में
शिरोविरेचन
दन्त नाडी को सामान्य
नस्य मेँ बरतने के ल्यि सिद्ध तैल
चिकित्सा
जिहागत साध्य रोगों की
चिकित्सा
ं ताह के रोगोंकी चिकित्सा
कण्ठ के रोगों की चिकित्सा । स्नेहिक धूम सवंसरमे ` उत्तम है
सअसाध्यमुखरोग
पष्ठ
४७०
४७०9
४७०
४७०9
४७१
४७१
४७१
४७१
४७१
४७९१
४७२९
४७९
, ४७२
४७२ ।
४७२९
४७३
४७४
` ४७४
४७४
४७१
त्रयोविशतितमोऽध्यायः `
शोफं की चिकित्साका
व्याख्यान
अवयव मे उत्पन्न शोफ छ
` प्रकारका दै सवसर शोथ पाच प्रकारका दहै श्वयथु शोथ
` वातजन्य शोथ
.. आमाशय मे स्थित दोष ऊपर के
भाम मे.शोय उसन्न करता ह . सामान्य् चिकित्सा
फ को नष्ट करने के छ्यि
ष्याज्च 2,
४७
४७५
४७५
४७१
` ४७६
४७६ .
, ४७७
४७७.
विषय
सिु.रश्व् र् मनुष्य ध त नी ५ ~= 4 ¢> = र > क 99 क च क) य् + ~ ~ = 4 भ्यः नि कि न्क + = क 9 , क क ^ # = ् क ऋ" ^, ~ र # ६
पृषु
चतुविशतितमोऽभ्यायः
अनागताबाधा प्रतिषेध अध्याय का
व्याख्यान ४७८
आरोग्य चाहनेवाले को एतिदिन
क्या करना चाहिये ४७८
प्रथम दातुन करना ४७८
जिह्वा साफ करने के छ्यि मुख
ग्रह्नाङक्न ४७८
आंखों मेँ आंजन क्गाना ४७६
पान खाना उत्तमदहै ४७६
शिर पर ते क्गाना ४७६
शिर पर लगने के ल्यितैल ४७६
कधी का करना ४७६
कानों मे ते डालना ४७६
स्नेह का अभ्यंप ४७६
सम्पूणं अंगों का परिषेक ४७६
स्नेह का अभ्यंग जहां नहीं करना
चाहिये ४८9
व्यायाम के संबंध में २
उबटन लगना ४८१
उद्घषण ओर उद्वतन ४८१
स्नान ४८१
पूखों कौ माला तथा
सुन्द्र् बख्र ४८१
मुख पर ठेप करने से ४८२
ओखां मे काजल ठ्गना ४८२
आहार ' ४८२
पैरों का धोना तथा तैर मल्ना ४८२
जूते का पहनना ४८२
शिर पर पगड़ी आदि पहनना ४८२
छाते का धारण करना ४८२
हाथमे दण्डेका धारण करना ४८२
आराम करना 2८
मुसाफरी ४८२
सुखदायक शय्या पर सोना ठरे
संबाहन (चापी करना) ४८३
वायुसेवन् ४८३
मनुष्य के त्यागने योग्य -४८३-४८१
श 9 । 4 क
विषय पृष
जो २ दोष ऊुपित होते हं ४८५
मेथुन मे अयोग्य तथा
योग्य स्री ४८ पंचर्विशतितमोऽध्यायः £
मिश्रक चिकित्सा का व्याख्यान ४८७
परिपोट ४८७
स्नेहदादि उपचार धटे
पठित रोग को नष्ट करने के स्यि तैक ` ४८टं बार घने, पंघराङे तथा कालत बनाने का तैक ४८८
मुख पर अभ्यंग करने के ल्य
सिद्ध धुत ४८८
राजाओंके योग्य छेष ४६०
षडबिशतितमोऽध्यायः, `
क्षीणव्रलीय वाजीकरण चिकित्सा
व्य सख्यान् ४६९०
वाजीक्रण योग किनके ल्यं उत्तम ४६१ वाजोकरण के तीन प्रकार ४६१ क्खीबता का वणन ४६१
भ्रष्ठ वाजीकर विधि ४६२ वाजीकर अनेक योग ४६२-४६३
सप्रविशतितसोऽभ्यायः
सर्वोपघातशमनीय अध्याय का
व्याख्षान् ४६३
वय स्थिर रहने का उपाय ४६३ विंडंग-तण्डुर चूणं ४६४
रक्त पित्तजन्य रोगां मे गम्भीरी कल्य ४६५
बल की चाहवाछरे के ल्यं
४ह१् `
ओषधियां ४६५ .
वाराही कन्द मू का चूण ४६१.
ओंखों के तेज के छियं
अष्टाविरतितमोऽध्यायः
मेषायुष्कामीय रसायन चिक्रित्वा ` व्याख्यान
मेधा ओर आयु की कामनावाले
के छियि चण
मेघावी के ल्यि मण्डूकपणी
२०
सुश्रुतसंहिता
विषय
मेधावी के लिए ब्राह्मी आदि का योग ४६७-४६८
आयुर्वर्षक मंत्र और औषध के साथ एक वर्ष में फल देने वाली रसायन ४६८
पाप दौर्भाग्य नष्ट करने के लिये रसायन ४६८
वचा चूर्ण आदि योग ४६८
मधु का योग ४६८
एकोत्तत्रिंशत्तमोऽध्यायः
स्वभावव्याधि प्रतिषेधनीय रसायन का व्याख्यान ४६६
सोम का विधान ४६६
चौवीस नाम के सोम ४६६
सोम सेवन विधि ५००-५०१
सोम के पत्ते आदि कैसे होते हैं ५०१
सोम कहाँ होता है ५०२
त्रिंशत्तमोऽध्यायः
निवृत्तसन्तापीय अध्याय का व्याख्यान ५०२
रसायन के सेवन से देवताओं का आनन्द ५०२
सात पुरुष रसायन को सेवन न करें और सात ही कारणों से रसायन गुण नहीं करते ५०३
औषधी (सोम के सहस्र) का व्याख्यान ५०३
औषधियों की प्रथक २ पहचान इन सातों औषधियों को उखाड़ने के मन्त्र ५०४
सात औषधियों को दूँढने के स्थान ५०५
एकत्रिंशत्तमोऽध्यायः
स्नेहोपयोगिक चिकित्सा का व्याख्यान ५०५
स्नेह की उत्पत्ति स्थान दो प्रकार का है ५०५
स्थायर स्नेहों का वर्णन ५०५
कषाय स्नेह पाकविधि ५०६
विषय
पल कुडव आदि का परिमाण स्नेहपाकविधि ५०७
स्नेहपान विधि ५०७
घृतपान, तैल, वसा, मज्जा के योग ५०७
पित्तविकार, वायुरोग और कफ की अधिकता में घी कैसे लेना चाहिए ५०७
तिरसठ प्रकार के रसों से घी का सेवन ५०७
केवल स्नेहपान उत्तम है ५०८
ऋतुओं में स्नेहपान का समय स्नेहपान के पीछे प्यास लगने पर गरम पानी स्नेह की मात्रा जीर्ण होने पर किनके लिये उत्तम है स्नेह के जीर्ण होने पर क्या करना चाहिये स्नेह के लिये घृत स्नेहपान का निषेध स्नेहन के अयोग में सम्यग स्निग्ध के लक्षण अतिसिग्ध के लक्षण स्नेह तथा रूक्षण स्नेह के नित्य सेवन का फल
द्वान्त्रिंशत्तमोऽध्यायः
स्वेदावचारणीय चिकित्सा का व्याख्यान ५१०
स्वेद चार प्रकार का है तापस्वेद, उष्मास्वेद, उपनाह स्वेद, द्रवस्वेद ५११
निरग्नि और साग्नि स्वेद ५१२
नस्य, वसित और शोधन के पहले स्वाद देना चाहिए बिना स्नेहन किया शरीर स्वेद से नष्ट हो जायगा छिपे हुए दोष भी स्वेद पर बाहर निकल आते हैं भली प्रकार दिया स्वेद से जड़ बनी सन्धियाँ क्रियाशील बन जाती हैं ५१३
विषय
किनको स्वेद नहीं देना चाहिये ५१३
त्रयखिण्णत्तमोऽध्यायः
वमन-विरेचन साध्य उपद्रव चिकित्सा व्याख्यान ५१४
दोषों के लिये सिद्धान्त दोषों को निकालने के लिये वमन और विरेचन ५१४
वमन विरेचन की विधि वमन भली प्रकार हुआ जानने के लक्षण ५१४
भली प्रकार वमन हो जाने के बाद क्या देना चाहिए वमन करनेवाले व्यक्ति को जो दोष नहीं होते वमन द्वारा कफ शोधन वमन का निषेध ऊर्ध्ववायु का लक्षण वमन के अयोग्य पुरुषों को वमन देने से रोग कष्ट साध्य अपवाद वमन के योग्य विरेचन कित्ते देना चाहिए विरेचन से पहले लघु भोजन कोष्ठ तीन प्रकार का है विरेचन पीने पर मल को न रोके विरेचन में मूत्र, मल आदि क्रम से आते हैं भली प्रकार विरेचन न होने पर दोष भली प्रकार विरेचन के लक्षण ठीक विरेचन न होने पर पेया न पिलाये विरेचन से पित्तजन्य दोषों का नाश विरेचन के योग्य अयोग्य युक्त विरेचन स्वभाव से दोषों को अघोषार्ग से निकालता है मृदु कोष्ठवाले व्यक्ति में अतितीक्ष्ण विरेचन दोषों को भली प्रकार नहीं निकालता ५१८
विषयानुक्रमणिका
२१
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| प्रातः पी हुई औषध प्रशस्त है | ५१८ | शुद्ध रक्त और अशुद्ध रक्त की परीक्षा | ५२२ | अयोगजन्य हानियों को चिकित्सा | ५३० |
| दुर्बल मनुष्य के दोषों को थोड़ा २ करके बाहर निकाले | ५१८ | अन्न के शेष रहने पर निर्बल शरीर आदि के अति-तीक्ष्ण उष्ण अतिलवण आदि को पीने पर | ५२२ | सप्तत्रिंशत्तमोऽध्यायः अनुवासन उत्तर बस्ति चिकित्सा व्याख्यान | ५३१ |
| पके हुए दोषों की उपेक्षा करना ठीक नहीं | ५१८ | कूरकोष्ठ अतिलवण या अतिसिन्धु पुरुष में बरती हुई औषध | ५२३ | अनुवासन कब देना चाहिये बिना शोधन किये मनुष्य को स्नेहबस्ति नहीं देनी चाहिये | ५३१ |
| मन्दगनि और कूर कोष्ठवाले के लिये अतिशय स्नेहगान पर स्निग्ध विरेचन नहीं पीना | ५१८ | जो मूर्खता से औषध के वेग को रोकता है जिस पुरुष के दोष ऊपर या नीचे प्रवृत्त हुये हों | ५२३ | अर्श, ग्रहणी रोग आदि वायुजन्य रोग को नष्ट करने का योग | ५३१ |
| स्नेहसात्प्य व्यक्ति के लिये कोमल प्रकृतिवाले को थोड़ी हानि करनेवाली औषध | ५१८ | पञ्चत्रिंशत्तमोऽध्यायः नेत्रबस्ति प्रमाणप्रविभाग चिकित्सा का व्याख्यान | ५२४ | वात रोगियों में अनुवासन रूप से बरतनेवाला तैल | ५३१ |
| स्नेहन, स्वेदन के बिना संशोधन | ५१८ | स्नेहादि कर्मों में बस्ति मुख्य किन रोगों में बस्ति बरतनी चाहिये | ५२४ | बस्ति में देने योग्य अनेक प्रकार के तैल | ५३१-५३३ |
| स्नेहन स्वेदन से चलायमान दोष वमन विरेचन द्वापा जाते हैं | ५१९ | बस्ति के भिन्न २ परिमाण बस्ति के विषय में बस्ति के दो प्रकार कौन किसमें देनी चाहिये वायु के वेग को बस्ति ही सहन करती है | ५२५ | भली प्रकार निरुद्ध होने पर विविध तैल अनुवासन के लिये | ५३३ |
| चतुर्त्रिंशत्तमोऽध्यायः वमन विरेचन व्यापत् चिकित्सा का व्याख्यान | ५१९ | बस्ति के दोष | ५२५ | रात्रि में बस्ति का प्रयोग न करे | ५३४ |
| वमन विरेचन की व्यापत्ति १५ प्रकार की | ५१९ | अतिशय जोर से अथवा धीरे से दवाई बस्ति का दोष और उसको ठीक करने के उपाय | ५२५ | अपवाद अनुवासन लेने का काल जिसको अनुवासन देना हो | ५३४ |
| भली प्रकार वमन न होने से तीक्ष्ण वमन देना चाहिये | ५१९ | अतिस्निग्ध में रुक्षबस्ति तथा रुक्ष में स्निग्ध | ५२६ | भली प्रकार अनुवासन के लक्षण | ५३४ |
| अशुद्ध आमाशयवाले तथा प्रचुर कफवाले को विरेचन ठीक न होने पर तुरन्त अतिशय तीक्ष्ण विरेचन देना चाहिये | ५१९ | पट्त्रिंशत्तमोऽध्यायः नेत्रबस्ति व्यापत् चिकित्सा नेत्र के हिल जाने से या घूम जाने से बस्ति के मोटा या छोटे होने से दोष | ५२६ | १९ बस्तियाँ शुक्रगत रोगों को भली प्रकार अच्छा करती हैं | ५३६ |
| भली प्रकार विरेचन होने पर लक्षण देखकर वमन कराये | ५१९ | अतिशय जोर से अथवा धीरे से दवाई बस्ति का दोष और उसको ठीक करने के उपाय | ५२६ | १८ निरुद्ध और १८ बस्तियाँ को पालनेवाला मनुष्य बड़ा बलवान् होता है | ५३६ |
| किस किस अवस्था में अतितोष्ण विरेचन देना चाहिये वायु की अधिकता में अतिशय स्नेह देकर स्वेद कराके फिर शोधन देवे | ५२० | अतिस्निग्ध में रुक्षबस्ति तथा रुक्ष में स्निग्ध | ५२६ | स्नेह बस्ति और निरुद्ध एक साथ सेवन न करे | ५३६ |
| अति मात्रा में स्नेह और स्वेदन करने पर वमन के अतियोग पर विरेचन के अतियोग पर | ५२० | किस प्रकार की बस्ति दोष करती है | ५३० | बहुत वायुवाले व्यक्ति को प्रतिदिन स्नेह बस्ति स्नेह बस्ति जन्य हानियाँ उत्तर बस्ति की व्याख्या कौनसी बस्ति अच्छी है बस्ति के शोधन के लिये मात्रा उत्तर बस्ति के वापिस न आने पर | ५३७ |
२२
सुश्रुतसंहिता
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| बस्ति में जलन होने पर | ५३६ | ग्राहीबस्ति | ५४५ | नस्य का समय | ५५३ |
| उत्तर बस्ति किन रोगों को नष्ट करती है | ५३६ | बन्ध्या स्त्रियों के लिये बस्तियाँ | ५४५ | नस्य के पूर्व | ५५३ |
| अष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायः | माधुवैतलिक बस्तियाँ | ५४६ | स्नेह की मात्रा आठ बिन्दु | ५५४ | |
| निरुहक्रम चिकित्सा व्याख्यान | ५४० | युक्तस्थ, दोषहर बस्ति, सिद्ध | नस्य में त्याज्य | ५५४ | |
| अनुवासन दिये हुये व्यक्ति को | बस्ति आदि | ५४६ | नस्य के योग, अतियोग अयोग के लक्षण | ५५४ | |
| निरुह बस्ति तथा उसे देने का प्रकार | ५४० | एकोत्तचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः | शिरो विरेचन स्नेह की मात्रा | ५५४ | |
| बस्ति देने के लक्षण उत्पन्न होने पर निरुह बस्ति बन्द कर देवे | ५४० | आतुरोपद्रव चिकित्सा का व्या० स्नेहपान, वमन विरेचन आदि लिये कायागनिमंद हो जाती तीनमाप यवागू | ५४७ | प्रयोग की दृष्टि से नस्य के तीन लक्षण | ५५४ |
| कोमल प्रकृतिवालों को अधिक मात्रा में बस्ति न देवे | ५४० | कफपित्त की अधिकतावाले के लिये तर्पणादि विधि | ५४७ | सर्पदष्ट, मूर्च्छित पुरुषों के लिये | ५५५ |
| भली प्रकार निरुह हुआ जानने के लक्षण | ५४१ | रोगी एक एक अनुवासन बस्ति लेकर तीन दिन तक परहेज करे | ५४८ | कोमल प्रकृति स्त्रियों के सिर को शोधन के लिये | ५५५ |
| भली प्रकार निरुह होने के पश्चात् कर्म | ५४२ | व्रण रोगी, आदि गिद्धी के कच्चे वर्तन के समान है | ५४८ | नस्य के लिये अयोग्य | ५५५ |
| आस्थापन और स्नेह बस्ति से रोगी को शान्ति | ५४२ | क्रोध करने पर कुपित हुआ पित्त, दाह प्यास आदि करता है | ५४८ | अतिमात्रा, अतिशीत आदि से हानियाँ | ५५५ |
| निरुह देने के दिन वायु के कोप का भय | ५४२ | चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः | हानियों की चिकित्सा कैसे | ५५५ | |
| एक मुहूर्त प्रतीक्षा करने पर निरुह बस्ति के बाहर न आने पर | ५४२ | धूमनस्य कवलग्रह चिकित्सा का व्याख्यान | ५५५ | प्रतिमर्श नस्य का उपयोग | ५५५ |
| विपरीत गतिमान् वायु से दोष भोजन करने पर आस्थापन नहीं देना चाहिये | ५४२ | धूम पाँच प्रकार का है प्रायोगिक धूम के लिये वर्ति वमन करानेवाले द्रव्यों को वामनीय धूम में बरते | ५५० | १४ समय | ५५६ |
| अवस्थानुसार निरुह देना चाहिये | ५४२ | धूमनेत्र को बनाने के लिये धूम पीने के प्रकार | ५५० | भित्र २ समय में लिये नस्य के गुण | ५५६ |
| निरुह में देने योग्य | ५४२ | धूम पीने का समय | ५५० | कवल ग्रहण की विधि | ५५६ |
| स्वस्थावस्था में क्वाथ आदि का भाग | ५४२ | स्नेहिक धूम स्नेह एवं उपलेंप से वायु को शमन करता है | ५५० | गण्डूष का लक्षण | ५५७ |
| कल्पना विधि | ५४२ | धूमनेत्र को बनाने के लिये धूम पीने के प्रकार | ५५० | कवल में शुद्धि के लक्षण | ५५७ |
| बारह प्रसृतवाले निरुह | ५४३ | धूम पीने का समय | ५५० | तिल आदि का कवल जले हुये मुल के दाह को नष्ट करता है | ५५७ |
| पृथक् रूप से बस्तियाँ | ५४३-५४६ | स्नेहिक धूम स्नेह एवं उपलेंप से वायु को शमन करता है | ५५० | औषध का बुद्धि पूर्वक विभाग करके चार रूपों में प्रतिसारण | ५५७ |
| शोधनबस्तियाँ | ५४५ | धूम के गुण | ५५० | ||
| लेखनबस्तियाँ | ५४५ | धूमपान के तीन योग्य | ५५० | ||
| बुँहणबस्तियाँ | ५४५ | धूमपान में कितने कितने घूँट और कैसे लेने चाहिये | ५५० | ||
| बाजीकरबस्तियाँ | ५४५ | नस्य की विधि | ५५० | ||
| पिच्छाबस्ति | ५४५ | नस्य के पाँच प्रकार | ५५० | ||
| किन रोगों को ठीक करने के लिये नस्य लेना ठीक है | ५५३ |
कल्पस्थान
प्रथमोऽध्यायः
| अन्नगान रक्षा कल्प का व्याख्यान | ५५८ |
|---|---|
| वैद्य निरन्तर राजा की विष से रक्षा करे | ५५८ |
| राजा को कभी किसी का विश्वास नहीं करना चाहिये | |
| वैद्य की योगता | ५५८ |
| रसोई कैसे हो | ५५६ |
| रसोई का अधिकारी वैद्य गुणों |
विषयानुक्रमणिका
२३
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| से युक्त मनुष्य हो | ५५६ |
| भन्य कैसे हों | ५५६ |
| रसोई में काम करनेवाले सब वैद्य के अधीन हों | ५५६ |
| विषदाता की पहचान | ५५६ |
| कभी २ सज्जन पुरुष भी असाधुओं जैसी चेष्टा कर लेते हैं | ५६० |
| विष देने के साधन | ५६१ |
| विषैले भोजन की परीक्षा में पशु पक्षियों का उपयोग | ५६० |
| विषैले अन्न के परोसने पर बाण के ऊपर जाने से हृदय आदि में दोष | ५६० |
| हाथों में लगा विषैला अन्न | ५६० |
| विषैला अन्न खाने से विकार | ५६१ |
| अमाशय में गया विष | ५६१ |
| पक्वाशय में पहुँचा विष | ५६१ |
| दूध, मधु, पानी आदि तरल द्रव्यों में विष से विकार | ५६१ |
| शाक, दाल, अन्न आदि में विष के विकार | ५६१ |
| दातुन में विषका संचार होने से | ५६१ |
| विषैला अम्यंग | ५६१ |
| कंधी आदि के विष से युक्त होने पर दोष तथा उसका उपाय | ५६१ |
| शिर, मुख, हाथी घोड़े ( आदि की पीठ पर ) विष लगाने से विकार तथा चिकित्सा | ५६२ |
| नस्थ और धूम में विष होने से विकार तथा चिकित्सा | ५६२ |
| विषले पुष्पों का विकार और चिकित्सा | ५६२ |
| कान के तैल के विषैला होने पर विषैले अंजन से | ५६२ |
| विषैले, जूते, खड़ाऊँ, आभूषण आदि के विकार तथा चिकित्सा | ५६२ |
| वैद्य राजा को हर प्रकार से विष से बचाये | ५६३ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| राजा सदा विषन्न द्रव्यों के साथ भन्य और भोजनों का सेवन करे | ५६३ |
| द्वितीयोऽध्यायः | |
| स्थावर विष विज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान | ५६३ |
| स्थावर और जंगम भेद से विष के दो प्रकार | ५६३ |
| दस स्थावर विषके अधिष्ठान आठमूल विष, पांच पत्र विष, १२ फलविष, ५ पुष्प विष, ७ त्वक सार, ३ शीर विष, २ घातु विष, १३ कन्द विष | ५६३ |
| सब मिलाकर ५५ स्थावर विष | ५६४ |
| अवान्तर भेद | ५६४ |
| भिन्न २ विषों के लक्षण | ५६६ |
| तीक्ष्ण कन्दों का विस्तार | ५६५ |
| विष के दसगुण | ५६५ |
| दूषीविष संज्ञा | ५६५ |
| दूषीविषके लक्षण | ५६५ |
| विष नानाप्रकार के | |
| रोगोत्पत्तिकारण | ५६६ |
| स्थावर विष के लक्षण | ५६६ |
| चिकित्सा | ५६६ |
| अजेय घृत | ५६६ |
| दूषीविषारि नाम का अगद | ५६७ |
| तृतीयोऽध्यायः | |
| जंगम विषविज्ञानीय कल्प का व्याख्यान | ५६७ |
| जंगमविष के १६ स्थानों का विस्तार | ५६७ |
| विष से दूषित जल और उसे दूर करने के उपाय | ५६८ |
| विष से दूषित भूमि | ५६६ |
| घास भूसा एवं भोजन गेहूँ आदि के विष से दूषित हो जाने पर उनकी चिकित्सा | ५६६ |
| धूम या वायु के विष से युक्त होने पर | ५६६ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| विष की उत्पत्ति | ५६६ |
| विष में प्रायः सब गुण तीक्ष्ण होते हैं | ५६६ |
| विष सॉप के सारे शरीर में फैला रहता है | ५७० |
| विषों में शीतल परिवेक, कीटों का विष मन्द होने से स्वेद दे सकते हैं | ५७१ |
| विष से मरे प्राणी का मांस नहीं खाना चाहिये | ५७१ |
| विषपान के लक्षण | ५७१ |
| सभी विष उष्ण उपचार से दुगुने बढ़ते हैं | ५७१ |
| असाध्य के लक्षण | ५७२ |
| चतुर्थोऽध्यायः | |
| सर्वदृष्टविज्ञानीय कल्प का व्याख्यान | ५७२ |
| दंष्ट्रा विषवाले पृथ्वी के सॉप ८० प्रकार के हैं | ५७२ |
| उनके पांच प्रकार के भेद तथा आकार दृष्टि से तीन प्रकार | ५७२ |
| अतिशय क्रोधी सॉप काटते हैं और उनका काटना तीन प्रकार का है सर्पाङ्गभिद्य | ५७३ |
| सॉपों के भिन्न २ विह्न आकार | ५७३ |
| सॉपों के भी ब्राह्मण क्षत्रिय आदि चार वर्ण | ५७३ |
| दर्वाँकर वायु को मण्डलि पित्त को राजिमान् कफ को कुपित करते हैं | ५७३ |
| तीनों के धूमने का काल | ५७३ |
| तीनों की अवस्था जो मृत्यु का कारण होती है | ५७४ |
| डरनेवाले सॉप अत्यविष के होते हैं | ५७४ |
| पुरुष, स्त्री तथा नपुंसक जाति सब सॉपों के दृष्ट लक्षणों के समान्य रूप | ५७६ |
| भिन्न २ सॉपों के काटने से शरीर पर प्रभाव | ५७६ |
१४
सुभुतसंहिता
विषय पृष्ठ
साँपों के विष के सात वेग ५७६
विष का पशु-पक्षियों पर प्रभाव ५७६
पञ्चमोऽध्यायः
सर्पदण्डविष चिकित्सित कल्प ५७७
व्याख्यान ५७७
सर्प के काटे हुये स्थान पर अरिष्टा ५७७
बाँधनी चाहिये ५७७
जहाँ अरिष्टा न बाँधी जा सके वह ५७७
स्थान अभिनसे जला दे ५७७
मुख को वस्त्रों से भरकर ५७७
चूसना ५७७
मंत्र जाननेवाला अरिष्टा को ५७८
भी मंत्रों से बाँधे ५७८
तपस्वियों के मंत्रों से विष ५७८
औषधियों से भी जल्दी नष्ट ५७८
होता है ५७८
मंत्र सीखने के उपाय ५७८
अगद उपचार ५७८
साँप काटने की चिकित्सा ५७८-५८२
विषयुक्त वस्तु से विद्ध हुये ५७९
के लक्षण ५७९
अस्थि विष के कारण उत्पन्न ५७९
व्रण की चिकित्सा ५७९
महागद ५८१
अजित अगद ५८१
तात्पर्य अगद ५८२
श्रृषभ अगद ५८२
संजीवनी अगद ५८२
लसुड़ा आदि से बनाया अगद ५८२
द्राक्षा आदि से मिलाया अगद ५८२
क्षेप, अंजन, नत्य ५८२
कीट विषों के नष्ट करने के ५८३
लिये क्वाथ ५८३
चूहों के विष को नाश करने के लिये ५८३
एकसर गण ५८३
षष्ठोऽध्यायः
दुन्दुभिस्त्वनीय कल्प का व्याख्यान ५८३
घावड़ी आदि से क्षार की भाँति ५८३
अगद विष को नाश के लिये ५८३
विषय पृष्ठ
कल्याणक घृत ५८४
अमृतघृत ५८४
महासुगन्धि अगद ५८४
विषपीडित व्यक्तियों के लिये अन्न ५८५
अविष मनुष्य ५८४, ५८५
सप्तमोऽध्यायः
मूषिक कल्प का व्याख्यान ५८५
शुक्रविषवाले १८ प्रकार के चूहे ५८५
इनके काटने के लक्षण ५८५
विस्तार से ५८५, ५८६
सब मूषिकों में शिरावेधन, संशोधन ५८६
सब चूहों के दंश में सुखदायक योग ५८६
विरेचन के लिये ५८६
सारिवा आदि के क्वाथ और क्वाथ में सिद्ध घृत ५८६
न भरनेवाले व्रण की चीरकर चिकित्सा करे ५८७
पागल विषवाले पशु के काटने से ५८७
जिस प्राणी से काटा गया हो उसके समान ही चेष्टा करने पर मनुष्य मर जाता है ५८८
जल त्रास का लक्षण ५८८
जलत्रास भी असाध्य है ५८८
पागल जानवरों के विष को नष्ट करने के लिये ५८८
शरपुंवा आदि का योग ५८८
पागल कुत्ते के काटने में नहलाना और उसके बाद संशोधन देवे ५८९
हिसक पशुओं के नख या दान्तों से जो क्षत हुआ हो ५८९
अष्टमोऽध्यायः
कीटकल्प का व्याख्यान ५९०
साँपों के शुक्र मल मूत्र आदि के सड़ने से उत्पन्न कीट ४ प्रकार के ५९०
विषय पृष्ठ
१८ प्रकार के वात स्वभाव के कीट ५९०
२४ कीट पित्रा प्रकृति के ५९०
१३ कीट कफ प्रकोपक हैं उपद्रव छ गलगोलिका के काटने से ५९१
आठ प्रकार के शतपदी आदि मण्डूक आदि आठ ५९१
विश्वभमरा के काटने से अहिण्डुका, कण्डूका, शूकंबुन्त के काटने से ५९१
पिपीलिका ६ प्रकार की ५९१
मक्खियाँ छ प्रकार की ५९२
मशक पाँच प्रकार की एक जाति में छ असाध्य है विषैले शव, मूत्र, मल से दोष ५९२
कष्ट साध्य दंश ५९२
१२ कीट प्राण नाशक इन कीटों के तोड़ण विष में मन्द विष ५९२
इन कीटों के नानाप्रकार के योगों से बने चूर्ण को गर कदना ५९२
एक जातिवाले कीटों को सामान्य सेदों से काटने के लक्षणों से साध्य असाध्य पाँच गोधेरक के काटने से ५९२
उग्रविषवाले कीटों के काटने पर सर्प विष की भाँति चिकित्सा ५९२
स्वेदन, आलेपन आदि ५९२
उत्कारिका स्वेदन में उत्तम कूठ आदि त्रिकण्टक विष में उत्तम है ५९२
गलगोलिका के विष नाश करनेवाला अगद कान खजुरा के विष को नाश करनेवाला अगद ५९२
मण्डूकों के विष को नाश करने वाला अगद ५९३
विश्वभमरा के विष को नाश करनेवाला अगद ५९३
विषयानुक्रमणिका
२५
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| अहिण्डुका " " | ५६३ |
| शुक्रवृन्द " " | ५६३ |
| विच्छू के तीन प्रकार | ५६३ |
| विच्छू ३० हैं | ५६३ |
| मन्द विष विच्छू का वर्णन | " |
| मध्यम विष विच्छू " " | ५६३ |
| तीक्ष्णविष वाले विच्छू | ५६४ |
| तीव्र और मध्य विष वाले विच्छू की चिकित्सा सर्प दंश की तरह | ५६४ |
| चिकित्सा | ५६४ |
| मकड़ी विष अतिभयानक | ५६४ |
| मकड़ी विष थोड़ी मात्रा में फैला हुआ कठिनाई से जाना जाता है | ५६४ |
| मकड़ी विष सात से १५ दिनों में ही मार देता है | ५६४ |
| मकड़ियाँ सात प्रकार से विष निकालती हैं | ५६४ |
| लताओं के विषय में पुराना इतिहास, काटने के सामान्य लक्षण साध्यासाध्य और मेदों के साथ चिकित्सा | ५६५-५६८ |
| कीटों के काटने से उत्पन्न ब्रणों की चिकित्सा | ५६८ |
| कर्णिका को निकालने के लिये | ५६८ |
| उत्तरतन्त्रम् | |
| प्रथमोऽध्यायः | |
| औपद्रविक अध्याय का व्याख्यान | ५६६ |
| शिर के रोग | ५६६ |
| आँख की आकृति | ५६६ |
| आँख में मांस पृथ्वी से, रक्त अनि से आदि | ५६६ |
| कृष्णमंडल तथा दृष्टि के भाग | ५६६ |
| आँख में पाँच मण्डल | ६०० |
| आँख में छू सन्धियाँ | ६०० |
| आँख में छू पटल | ६०० |
| आँखों को बाँधनेवाली खिरायुत श्लेष्मा | ६०१ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| विपरीत गतिवाले दोष अतिशय भयानक रोग उत्पन्न करते हैं | ६०१ |
| रोग का पूर्वरूप | ६०१ |
| आँखों के उत्पन्न रोगों में पूर्वरूप देखकर चिकित्सा करें | ६०१ |
| पहले कारण का परित्याग बाद में वातादि दोषों का | ६०१ |
| नेत्रों में उत्पन्न रोगों के कारण | ६०१ |
| आँख के ७६ रोग | ६०१ |
| वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, रक्तजन्य तथा सर्वगत नेत्र रोगों में | ६०१ |
| बाह्य रोगों में दो असाम्य हैं | ६०२ |
| द्वितीयोऽध्यायः | |
| सन्धिगत रोग विज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान | ६०२ |
| सन्धिगत रोग ६ हैं | ६०२ |
| पूयालस किसे कहते हैं | ६०२ |
| कनीनिका प्रदेश, पूयस्वाव, श्लेष्मस्वाव, रक्तस्वाव, पित्तस्वाव के लक्षण | ६०३ |
| पर्वणी, अलजी, क्रमिग्रन्थि के लक्षण | ६०३ |
| तृतीयोऽध्यायः | |
| वर्त्तमगत रोगविज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान | ६०३ |
| २१ रोग रोगवर्त्त में लक्षणों सहित | ६०३-६०६ |
| चतुर्थोऽध्यायः | |
| शुक्लगत रोग विज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान | ६०६ |
| आँख के शुक्ल भाग में ११ रोग | ६०६ |
| पञ्चमोऽध्यायः | |
| कृष्णगत रोगविज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान | ६०७ |
| कृष्णभाग में होने वाले ४ रोग | ६०७ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| षष्ठोऽध्यायः | |
| सर्वगत रोग विज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान | ६०८ |
| सर्वगत रोगों में कुल १७ रोग हैं | ६०८ |
| आँखों के सब रोग अभिष्यन्द के कारण हैं | ६०८ |
| वाताभिष्यन्द, पित्ताभिष्यन्द, कफाभिष्यन्द तथा रक्ताभिष्यन्द में | ६०८ |
| अधिमन्थ के सामान्य लक्षण वातज, पित्तज, कफज, रक्ताधिमन्थ में | ६०८ |
| उपरोक्त कितने २ दिनों में दृष्टि नष्ट कर देते हैं | ६०९ |
| सखोफ पाक | ६०९ |
| हताविमन्थ | ६०९ |
| वातपर्याप | ६०९ |
| शुष्काक्षिपाक | ६१० |
| अन्वतो वात | ६१० |
| अस्लाधुषित | ६१० |
| सिरोत्पात-खिराप्रदर्ष | ६१० |
| सप्तमोऽध्यायः | |
| दृष्टिगत विज्ञानीय अध्याय का व्याख्या | ६१० |
| दृष्टि का प्रमाण, उत्पत्ति आदि | ६१० |
| दृष्टि में आश्रित १२ भयानक रोग | ६१० |
| पटलों में प्रविष्ट तिमिर रोग रोग के लक्षण | ६११ |
| परिल्लाधि रोग | ६१२ |
| रक्तजन्य मण्डल | ६१२ |
| छूः लिंगनाश | ६१३ |
| पित्त से विदग्ध दृष्टि | ६१३ |
| कफ से विदग्ध दृष्टि | ६१३ |
| धूमदर्शी | ६१३ |
| हृस्वजड्य | ६१३ |
| नकुलान्ध | ६१३ |
| गम्भीरका | ६१३ |
| निमित्तजन्य रोग | ६१३ |
| अनिमित्तजलिंगनाश | ६१३ |
२६
सुश्रुतसंहिता
विषय
आँख के यह कुछ छिहत्तर रोग ६१४
अष्टमोऽध्यायः
चिकित्सक प्रविभाग विज्ञानीय
अध्याय की व्याख्या ६१४
ग्यारह प्रकार के छेदन करने योग्य रोग ६१४
नौ रोग लेखन के योग्य ६१४
पाँच रोग भेदन के योग्य ६१४
पंद्रह रोग वेधन के योग्य ६१४
१२ रोग शस्त्रकर्म के अयोग्य हैं ६१४
सात रोग याप्य हैं ६१४
पन्द्रह रोग असाध्य हैं ६१४
नवमोऽध्यायः
बातामिष्यन्द प्रतिषेध चिकित्सा का व्याख्यान ६१५
अभिष्यन्द और अविमन्य वाले रोगी का सिरामोक्षण ६१५
योग्य उपनाहों से स्वेद दें ६१५
भोजन ग्राह्य ६१५
भोजनोपरान्त घृत पान ६१५
सिद्ध किया तैल नस्य में ६१६
सिद्ध किये दूध का परिषेक, आश्च्योतन में ६१६
अभिष्यंद में अंजनादि ६१६
दशमोऽध्यायः
पित्तामिष्यन्द प्रतिषेध का व्याख्यान ६१६
पित्त जन्य अविमन्य में पित्तज अभिष्यन्द आदि में ६१७
सिद्ध किया घृत, दूध, नस्य आदि के योग ६१७
आश्च्योतन ६१७
अम्लाद्युषित में सिरामोक्षण न करे ६१७
एकादशोऽध्यायः
श्लेष्माभिष्यन्द प्रतिषेध व्याख्या ६१८
कफजन्य अभिष्यन्द और अविमन्य में ६१८
बलासमप्रियत रोग में ६१९
विषय
पिष्टक रोग ६१९
योगांजन ६१९
द्वादशोऽध्यायः
रक्ताभिष्यन्द प्रतिषेध अध्याय का व्याख्यान ६१९
अभिमन्य, अभिष्यन्द, सिरोत्पात और सिराहर्ष ६१९
उपरोक्त रोगों में पुरातन घृत तथा सिरामोक्षण करे ६१९
विरेचन के बाद शोधन ६२०
आँखों के चारों ओर प्रलेप ६२०
अतिशय पीड़ा होने पर चारों ओर के लिये विविध अंजन ६२०-६२३
त्रयोदशोऽध्यायः
लेख्य रोग प्रतिषेध का व्याख्यान ६२३
लेखन के योग्य जो ९ रोग कहे हैं उनमें सामान्य विधि जिसमें रक्तस्त्राव आदि न हो वह लेखन भली प्रकार जानो ६२३
ठीक प्रकार लेखन न होने के दोष ६२३
अतिस्त्रावित का लक्षण ६२४
किन २ में लेखन करना चाहिये ६२४
चतुर्दशोऽध्यायः
मेघ रोग प्रतिषेध का व्याख्यान ६२४
पकी हुई बिसग्रन्थि के लिये लगप के भिन्न हो जाने पर ६२४
अंजन नामिका में स्वेदन ६२४
कुमिग्रन्थि में स्वेदन करने से कफज उपनाह में ६२४
बिसग्रन्थि आदि पाँचों मेघ योग्य रोगों के अपक्व होने पर ६२४
पञ्चदशोऽध्यायः
छेद्य रोग प्रतिषेध का व्याख्यान ६२४
सैंधव के चूर्ण से आँख में क्षोभ उत्पन्न करना ५२५
अर्म के क्षोभित हो जाने पर ६२५
जो अर्म मछली के जाल के समान फैला हो ६२५
विषय
प्रतिसारण के लिये ६२५
शूल होने पर ६२५
यदि अर्म कुछ वच जाये ६२५
जो अर्म छोटा दही के समान ६२५
जो अर्म चमड़े के समान मोटा हो ६२५
अगं के हट जाने से स्वाभाविक वर्ण ६२५
सिराजाल में जो सिरा कठिन हो ६२५
जो पिडका औषधियों से शान्त न हो ६२५
सिराजाल, सिरापिडका में यवक्षार से प्रतिसारण ६२५
अश्रुनाड़ी ब्रण होने के कारण ६२५
चूर्णांजन से अर्म, पिडका आदि नष्ट ६२५
पलक पर स्वेद देकर ६२६
षोडशोऽध्यायः
पद्मकोप प्रतिषेध का व्याख्यान ६२९
पलकों में होनेवाले पद्मकोप के विषय में ६२६
यदि इससे पद्मकोप शान्त न हो तो प्रतिसारण आदि ६२६
बालों की जो नई पंक्ति पैदा हो गई है उसके विषय में ६२७
पद्मकोप को नष्ट करने के लिये सब उपायों को बरते ६२७
सप्तदशोऽध्यायः
हृष्टिगत रोग प्रतिषेध का व्याख्यान ६२७
३ रोग साध्य ३ असाध्य ६ याप्य ६२७
पित्तविदग्ध हृष्टि में ६२७
अंजन दोनों रोगों में उत्तम है ६२७
पित्त एवं कफ दोनों विदग्ध हृष्टियों में अंजन करे ६२८
दिवान्ध और राग्यन्ध दोनों को नष्ट करने के लिये अंजन ६२८
विषयांलुक्रमणिकां
३७
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| पित्तविदग्ध हृष्टि में रसौत | प्रशस्त शलाका | ६३४ | सेक आश्च्योतन पुटपाक की भांति | ||
| आदि | ६२८ | व्यधन के दोष से रोग | ६३४ | तीनों रूपों में | ६३८ |
| पित्तविदग्ध हृष्टि के सौ | वेदना में अन्य योग | ६३४ | कितनी बूँद बरतनी चाहिये | ६३८ | |
| वीरांजन आदि चूर्ण | ६२८ | हृष्टि की निर्मलता के लिये | पारिषेक का कारणकाल | ६३८ | |
| पित्तविदग्ध हृष्टि में अंजन | ६२८ | शुभ अंजन | ६३५ | कफज रोग में | ६३८ |
| राज्यन्ध को नष्ट करनेवाला | अष्टादशोऽध्यायः | शिर में उत्पन्न अतिप्रबल रोगों | |||
| अंजन | ६२८ | क्रियाकल्य का व्याख्यान | ६३५ | को नष्ट करके | ६३८ |
| राज्यन्ध में गोमूत्र आदि | ६२८ | आंखों पर तर्पण | ६३५ | दोष के लक्षण स्पष्ट होने पर | ६३८ |
| राज्यन्ध में लुद्रांजन | ६२८ | तर्पण में तृप्ति के लक्षण | ६३५ | मधुर रस को छोड़कर पांच रस | ६३८ |
| नक्तान्ध में अंजन | ६२९ | अतितर्पण से दोष | ६३६ | प्रसादन अंजन | ६३८ |
| राज्यन्धता को नष्ट करने के | हीनतर्पण से दोष | ६३६ | प्रातः सारथ वा रात्रि में कौन सा | ||
| लिये अन्य योग | ६२९ | इनमें दोषकी अधिकता के | अंजन बरतना | ६३८ | |
| वातजःय तिमिर में संस्कृत तैल | ६२९ | अनुसार चिकित्सा | ६३६ | गुटिका, रसक्रिया, चूर्णभेद से | |
| पुरातन घृत आदि तिमिरो में | आँख जिसे तर्पण द्वारा अवश्य | अंजन तीन प्रकार का है | ६३९ | ||
| उत्तम | ६२९ | बल मिलता है | ६३६ | लेखन अंजन की वर्ति का प्रमाण | ६३९ |
| पित्तजन्य तिमिर में | ६२९ | पुटपाक कब करनी चाहिये | ६३६ | रसांजन की मात्रा | ६३९ |
| बकरी का घी नस्य में उत्तम है | ६२९ | पुटपाक के तीन प्रकार | ६३६ | इन अंजनों के लिये इनके | |
| अणुतैल वायु एवं रक्तजन्य | पित्त रक्तज व्रण के लिये | समान गुणवाले पात्र बरते | ६३९ | ||
| तिमिर में | ६२९ | रोपण पुटपाक | ६३६ | शलाकाओं का अकार | ६३९ |
| वातज तिमिर में | ६२९ | स्वेदन पुटपाक २०० गिनने तक | ६३६ | शलाका से अंजन को लगाना | ६३९ |
| अन्य कई प्रकार के अंजन | ६२९ | लेखन द्रव्यों को मिलाकर | प्रत्यंजन कब बरतना | ६३९ | |
| नस्य, रसक्रिया, धूमपान आदि | ६३० | लेखन पुटपाक | ६३६ | किन में अंजन नहीं करना | ६३९ |
| श्लैष्मिक लिंगनाश की | रोपण पुटपाक ३०० गिनने तक | ६३६ | किन हालतों में लगाने से | ||
| चिकित्सा | ६३२ | लेखन आदि पुटपाक कितने | अंजन दोष करता है | ६३९ | |
| वेधन के पीछे धावन से | दिन बरतना | ६३६ | अकालकृत अंजन से उत्पन्नरोग | ६४० | |
| सेचन आदि | ६३२ | परहेज पालने का समय | ६३६ | लेखन अंजन के सम्यग् योग में | ६४० |
| भली प्रकार लेखन हुआ | तर्पण किये तथा पुटपाक लिये | लेखन अंजन के अतियोग में | ६४० | ||
| जानने के लक्षण | ६३३ | व्यक्ति को त्याज्य | ६३७ | लेखन के हीन योग में | ६४० |
| सिरावेध विधि में | ६३३ | तर्पण और पुटपाक के मिथ्या | प्रसादन अंजन के सम्यग् योग | ६४० | |
| दैवकृत छेद से अन्यत्र वेधन | आचरण में | ६३७ | प्रसादांजन के अतियोग में | ६४० | |
| होने पर | ६३३ | पुटपाक के सम्यग् योग से | ६३७ | सफलता चाहनेवाला मात्रा से | |
| अपांग के पास वेधन होने पर | ६३३ | पुटपाक के अतियोग से | ६३७ | अंजन करे | ६४० |
| पूर्ण पका धन शलाका के अग्र | पुटपाक प्रसादन | ६३७ | अनुक्त अंजनों में हजारों रूप | ||
| भाग के छूने मात्र से नष्ट | अतिउष्ण और अतितीक्ष्ण | की कल्पना | ६४१ | ||
| होता है | ६३३ | तर्पण एवं पुटपाक | ६३७ | हृष्टिवल को बढ़ाने के लिये | |
| लिंगनाश अपूर्ण कच्छा होने | ठीक मात्रा में तर्पण बरतने से | ६३७ | श्रेष्ठ अंजन | ६४१ | |
| पर वेधन होने से वापिस | तर्पण और पुटपाक के प्रारंभ | एकोनविंशतिसप्तमोऽध्यायः | |||
| आता है | ६३४ | और अन्त में | ६३७ | नयनाभिघात प्रतिषेध का व्याख्यान | ६४१ |
| शलाका दोष | ६३४ | दोष के अनुसार उपयुक्त | तीक्ष्णांजन, धूप, घूल, आदि से | ||
| आश्च्योतन | ६३७ | आंखों में आघात की चिकित्सा | ६४२ |
२८
सुश्रुतसंहिता
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| इनका उपचार तुरन्त सात दिन से पहले करना | ६४२ |
| चोट लगी आंख पर पटलों में हुये क्षत का साध्यासाध्य विचार | ६४२ |
| यदि नेत्र अन्दर बहुत दब गया हो | ६४२ |
| कुक्कुणक रोग और उसकी चिकित्सा | ६४३ |
| पलकों को घोने के लिये इसमें उपयोगी अज्ञान लेपादि | ६४३ |
| विशतितमोऽध्यायः | |
| कर्णगत रोग विश्वानीय अध्याय का व्याख्यान | ६४४ |
| कर्णगत रक्त रोग | ६४४ |
| कष्टसाध्य शूल | ६४४ |
| कर्ण प्रसाद रोग | ६४४ |
| वाषिर्ष रोग | ६४४ |
| कर्णसंखाव | ६४४ |
| कर्णकण्ठ | ६४४ |
| कर्णगृध्र | ६४५ |
| कर्णप्रतिनाह | ६४५ |
| क्रमिकण | ६४५ |
| कर्णपाक | ६४५ |
| पूतिकर्णक | ६४५ |
| एकविंशतितमोऽध्यायः | |
| कर्णगत रोग प्रतिषेध का व्याख्यान | ६४५ |
| कर्ण रोग में पथ्य | ६४५ |
| कर्ण शूलादि चार रोगों में सामान्य औषध | ६४५ |
| नाडीस्वेद और पिण्डस्वेद | ६४५ |
| पीपल के पत्तों का तेल | ६४५ |
| कर्ण शूल में वला तैल | ६४६ |
| कानों में डालने की वसा | ६४६ |
| वेदना की शान्ति के लिये स्नेह | ६४६ |
| वेदना नाश के लिये लहसुन आदि | ६४६ |
| कर्णशूल में घृत | ६४६ |
| दीपिका तैल | ६४७ |
| कर्ण शूल के लिये अन्य प्रयोग | ६४७ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| कर्णशूल में मूत्र कई प्रकार के तेल कर्णशूल के लिये तथा अन्य कई योग | ६४७ |
| द्वारविंशतितमोऽध्यायः | |
| नासागत रोग विश्वानीय अध्याय का व्याख्यान | ६४६ |
| ११ नासारोग | ६४६ |
| अपीनसरोग के लक्षण | ६४६ |
| पूतिनासा के लक्षण | ६४६ |
| नासागाक के लक्षण | ६५० |
| पूररक्त के लक्षण | ६५० |
| क्ष्वशु के लक्षण | ६५० |
| भ्रंशशु के लक्षण | ६५० |
| दीप्त के लक्षण | ६५० |
| नासा प्रतिनाह | ६५० |
| नासा परिखाव | ६५० |
| नासा परिशोष | ६५१ |
| सात अबुर्द | ६५१ |
| पांच प्रकार के प्रतिशयाय | ६५१ |
| त्रयोविंशतितमोऽध्यायः | |
| नासागत रोग प्रतिषेधका व्याख्यान | ६५१ |
| अपीनस और पूतिनासा में | ६५१ |
| अवपीडन के रूप में नश्य | ६५१ |
| नसापाक में | ६५१ |
| पूररक्त में चिकित्सा क्ष्वशु और भ्रंशशु चिकित्सा | ६५१ |
| दीप्त, नासानाह, नासाखाव | ६५२ |
| चतुर्विंशतितमोऽध्यायः | |
| प्रतिशयाय प्रतिषेधका व्याख्यान | ६५२ |
| प्रतिशयाय के कारण | ६५२ |
| पूर्वरूप | ६५२ |
| वातजन्य, पित्तज, कफज, सन्निपातज रक्तजन्य, प्रतिशयाय में | ६५२ |
| दुष्ट प्रतिशयाय | ६५३ |
| नूतन प्रतिशयाय को छोड़ सब में घृतपान | ६५४ |
| अपक्व प्रतिशयाय में स्वेद | ६५४ |
| कफको शिरोविरेचनसे खींचना | ६५४ |
| पीनस रोगी को असेव्य | ६५४ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| तक्षण पीनस के लिये वातिक प्रतिशयाय में पित्तरक्त जन्य प्रतिशयाय में कफजन्य प्रतिशयाय में सन्निपातजन्य प्रतिशयाय इनमें तैल के योग | ६५४ |
| पंचविंशतितमोऽध्यायः | |
| शिरोरोग विश्वानीय अध्याय का व्याख्यान | ६५५ |
| ११ प्रकार की शिरोवेदना | ६५५ |
| सूर्यावर्त्तक | ६५६ |
| वायु, पित्त, कफ के प्रकोप से शिरोरोग | ६५७ |
| सन्निपात तथा रक्तजन्य, कुमिजन्य शिरो रोग | ६५७ |
| अनन्त वात के लक्षण | ६५७ |
| शंखक के लक्षण | ६५७ |
| षड्विंशतितमोऽध्यायः | |
| शिरोरोग प्रतिषेध का व्याख्यान | ६५७ |
| वातजन्य में वातव्याधि की चिकित्सा | ६५७ |
| इसमें खाने योग्य | ६५८ |
| घृत तथा लेपादि | ६५८ |
| कफजन्य में चिकित्सा | ६५८ |
| क्षयजन्य की चिकित्सा | ६५८ |
| जिस रोगी के शिर को क्रमि खाते हों | ६५९ |
| अर्घावभेदक में | ६५९ |
| अनन्त, शंखक, आदि की चिकित्सा | ६५९ |
| सप्तविंशतितमोऽध्यायः | |
| नवग्रहाकृति विश्वानीय अध्याय का व्याख्यान | ६६० |
| बालकों के ग्रहों के लक्षण, उनकी चिकित्सा, उत्पत्ति तथा कारण | ६६१-६६२ |
| अष्टाविंशतितमोऽध्यायः | |
| स्कन्दग्रह प्रतिषेध का व्याख्यान | ६६२ |
| स्कन्दग्रह से आकांत बच्चों की शान्ति के लिये उपाय तथा रक्ष्य विधि | ६६२ |
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ुश्र॑तसंहितौं ३9
विषय प्रष्ठ | विषय प विषय |
बात पित्त रमे क्वाथ क्षयरोगी को व्याञ्य ७१६ पाण्डुरोग चार प्रकारका है ९ ।
आदि ६८७ | धमं के अविरोधी विषय ७१६ | पूवर्प ०१
सन्निपात ज्वर मे क्वाथ आदि £ द्विचस्वारिशत्चमोऽभ्यायः खव पाण्डुरोग के रक्षण न |
सब्र उरो को नष्ट करने का गुल्मप्रतिषेध का व्याख्यान ७१७ | उशन्न ध ।
योग ६८६ | गुल्म पांच प्रकार का ७१७ | साध्य पाण्डुरोगी को धृत चूण 8
विषम उवरादि में भिन्नयोग ६६० | गुल्म का रक्षण ७१७ | आदि अनेक योग ०३९...
(प को नष्ट गुल्म के नाम काकारण ७१७ | पठ्चचत्वारिञत्तमोऽध्यायः |
र ६९० | गुल्म पकता नदी ७९७ | रक्त पित्त प्रतिषेध का
न २ सिद्ध किये तेल ६६० | पांच प्रकार का गुल्म कुपित व्याख्यान ह
0 ६६२ | होने पर तीन प्रकार के ७१७ | विदग्ध हआ रक्त दोनों मागो से
कफवातादि उवरां में ६६३ | पूवरूप ७१७ | प्रवृत्त होता है |
उपद्रव नाशक विशेष चिकित्सा ६६४ | वातः पित्त, कफः सन्निपातः साध्यासाध्य विचार ०
नस्य, विरेचन, स्नेह।दि ६९४ | रक्तजन्य गुल्म ७१८ | पूर्वरूप ० २
= ~ ७२४ ज्वर मे धृत देने का समय ६६६ | निरू श अनुवासनों से लाल ल (त
जवर मुक्त रोगी के लक्षण ६६७ | चिकित्वा` 8 || उन ७.५
ज्वर महादेव के क्रोध से ुभआ ६६७ | सलनिपातजन्य गुल्म मे तनिदोष ७९५ बदु
अतिसार प्रतिषेधका नाशक. चिकित्सा ७९६ भोषव ४ र
व्याख्यान | ही देनं ह
६६७ | चिकादि धृत िग्बायधृतः त २६
कारण ६६७ | दाधिक पूत, रसोनादि धृत॒ ७१६ | ऊर्ष्वमामी कौ
लक्षण व पंचतृणमूलादि घृत एर | विरेचन से ७२७ ,
सम््राति ६९७ । पानीयकषार ल उखके बाद् ७३७
अतिषार छः प्रकार का है ६६८ अरिष्ट ९८ मृद वमन सिद्धघृत पशप ७२७
पूचस्प ६ | शटा, दन्ती आदि की गोलियां ७२१ रने के व्यि लेह् तथाफल ७२७ |
असाध्य का लक्षण ६€ गुल्मरोगि्यों के लि | 2 पित्त नाच के छ्य अनेक
चिकित्छा (त ८ उद्ररोग, वात व्याधि आदिम ७२१ योग ७२७ ७३६ ,
एकचत्वारिखत्तमोऽध्यायः 8 श म ७२३ षट्चत्वारिसत्तमोऽध्यायः =
न त (१ शाः कर मू्खाप्रतिषेष का व्याख्यान ७३६
कारण तथा लक्षण ७१०.७१२ | योग मिन्न २ मूढ का करण ७३६
पूवरूप ७२४.७२७ | मोहमू्छी ७३९ `
अधः मृदु शोषन दे ७१४ निचस्वारिशत्तमोऽष्यायः || मृच्छा के छ प्रकार ७२६.
शोषन हो जाने पर. खाने हृद्गेग प्रतिषेष का व्याख्यान ७२७ | खश्चण | ७२६ .
७१४ | वाता र | ८
उपद्रव शान्त होने पर बृंहण ७ । < व प से ३ प्रकार रतजन्य, मयजनितृ . ।
व्यवायशोषी के लि क सान्नपरात् से चार प्रकार ७२७ | विषजनित मछ म इसके ६
समनाकेष्मि ७११ | जन्य रो किमे अनेक योग ८५
~ ओोषरोग का एक = | ङभजन्य, हृद्रोग मं ७२७-२८ || संन्यास सं्ावाला ७४५
` महीनेमंनाश - चतुञ्चत्वारिरत्तमोऽध्याय संज्ञ ७१५ | पाण्डुरोग प्रतिषेष का 1 आ जाने पर ७४१
हुन दि | व्यास्यान २ सप्रच त्वारिशत्तमोऽभ्यांयः ^
७१५ | पाण्डुरोग कै कारण ` ७३ पानस्य प्रतिषेष का 1
= = € व्ाख्यान - ७४२ |
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३२
सुश्रुतसंहिता
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| चार रसों के संयोग | ७६६ | षट्चषट्टितमोऽध्यायः | कितने एकवाले, दो वाले अथवा | ||
| छ रसों का संयोग | ८०० | तंत्रयुक्ति अध्याय का व्याख्यान | ८०६ | तीन वाले | ८०९ |
| स्वस्थवृत्त अध्याय का | ८०१ | ३२ तंत्र युक्तियाँ | ८०६ | पथ्य रसों से अविकृत तीन | |
| चिकित्सा प्रयोजन | ८०१ | तंत्र युक्तियों का लाभ | ८०६ | दोष | ८१० |
| जिस २ श्रुतु में जो २ दोष | अधिकरण, योग, पदार्थ, हेतुर्थ, | षोडश कलावाला पुरुष | ८१० | ||
| प्रकृपित होते हैं उन २ | उद्देश, निर्देश, उपदेश आदि | सत्त्व, रज, तम के भिन्न प्रकार | ८१० | ||
| श्रुतुओं में वे २ रस | के लक्षण | ८०७-८०९ | पृथक् रूप में वात, पित्त, कफ | ||
| देने चाहिये | ८०१-८०२ | षट्षष्टितमोऽध्यायः | तीन दोषों में | ८११ | |
| भोजन के १२ विभाग | ८०४ | दोष भेदविकल्प अध्याय का | दोष रक्तादि धातु आदि में | ||
| औषध के १० काल | ८०४ | व्याख्यान | ८०६ | मिलकर असंख्येय बनते हैं | ८१२ |
| आहारकाल | ८०५ | रसभेदविकल्प में कहे ६२ भेदों में | ब्राह्म वचन | ८१२ |
N श्रीनिर्णयचर्या ॥
सुश्रुतसंहिता
सूत्रस्थानम्
प्रथमोऽध्यायः
अथोतो वेदोक्तिसंध्योर्येन्यदयाख्याम् ॥ १ ॥ एथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अब इसके आगे 'वेदोक्तिसं' नामक अध्याय की व्याख्या करने— जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥ १ ॥
यत्तस्य—वेदोक्तिसं के अभिप्राय आयुर्वेदोक्तिसं का है। यथा—“तस्यानुकृष्टुमतेमो वेदो वेदविदा मतः—” चरक में आयुर्वेद की उत्पत्ति के सम्बन्ध में स्पष्ट किया है, कि—
“न द्राक्षुर्वेदस्याभ्योत्पत्तिस्फलदभ्यं, अन्यत्रात्रयोशोपदे- वाभ्यामि ॥ एतेहे ह्यमधिकृत्योत्पत्तिमुपदिशन्त्येके ॥” च० सू० अ० ३० ॥ २७ ॥
भगवान् बालक का अभिप्राय—अतिशये जनवान् पुरुष से है, जैसा कि भगवान् का उल्लेख किया है—
उत्पत्तिकारणं चैव भूतानामागतं गतिम् । चैत्ति विद्यामविद्यां च स श्रेयं भगवदिति ॥
अथवा इसका दूसरा अर्थ—समस्त परवर्य, यथा, श्री आदि से युक्त को भगवान् कहा है। क्योंकि योगपुरुषों का यही परवर्य है—जैसा कि चरक में कहा है—
आवेशभतसौ मानमर्थात्तौ हृन्दतः क्रिया । दृष्टिः श्रोत्रं स्मृतिः कान्तिषिष्ठतश्चाप्यदण्डानम् ॥
१ भगवान् का लक्षण— भुजपातः, भुजनाञ्चैव धारणादव्यवहृतिः । द्रुवस्थानं समुदितम्— ॥ ३० सू० अ० ३ ॥
अथवा—यथा भुजपातः भुज संहरणं विद्योयते । उपहाय तक्षदयनिस्तृषिण उपहाः कृतः ॥ ४ ॥ चरक सू० अ० ३० ॥ २८ ॥
हिरण्यशना चोत्थि—फलां को भुजके के लिये-भुज की उपहाय होते हैं, यही पर शरीर को झुकाने के लिये भुज लाहिये।
इत्युक्तेष्वेमाख्याते योगिनो वृद्धेभ्यवसम् । शुद्धकृत्वसमाधानात् तत् संयमुपजयते ॥
चरक सू० अ० ११३० ॥ २९ ॥
परवर्यस्य समस्तस्य माहात्म्य-यशसाः प्रियः । वेमास्यथ प्रयत्नस्तदपण्णा भग इतीडना ॥
मानुषमताः ।
धन्वन्तरिः—धनुः सत्यं, वरयान्तिष्विचिन्ति गृह्णतेति फल- स्तरीः—शब्द मात्रा के पारंगत होने से 'धन्वन्तरि' ।
विशेष मन्तःय—यह सुश्रुत संहिता श्री नारायण (प्रति- हरेर्ज्योतिषो नारायण एव० ड० टी०) द्वारा प्रतिसंस्कृत (सम्पादित) है और प्रतिसंस्कृत ग्रन्थ में ४ प्रकार के सूत्र या वाक्य रहते हैं अथवा यों कहिये कि प्रतिसंस्कृत ग्रन्थ ४ प्रकार के वाक्यों से भरपूरित होता है, यथा—१—गुरुमत्र = आचार्य की वाक्य, २—शिष्येभ्यः या श्रेता की वाक्य (प्रश्न), ३—प्रतिहरेर्यकां का सूत्र जैसे यहाँ तथा वहाँ वहाँ “यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः” आदि ३ और ४—एकीय सूत्र अर्थात् किसी एक ऋषि (आचार्य) का मत, जिसका सुन न मानते हो परन्तु कुछ अवश्य मानते हो या उसमें उपवेष्टि हो, या सत्यांश हो, यथा—श्लो० स्थान० अ० ३ में रामसमभव में ऋषियों के अनेक मतों का वर्णन तथा श्लो० अ० ६ में “तत्र केचिद् आहुः” और यत्र तत्र “यद् आहुः एते” “इति केचित्” आदि वाक्य । इस प्रकार उनके चार प्रकार के वाक्यों से भरपू- रित ग्रन्थ सुगम, सरल एवं संक्षिप्त होता है ॥ ३ ॥
अथ सलु भगवन्तमप्यवरस्यपिगणपरिवृतमोक्षमस्य कागिराज दिवोदास धन्वन्तरिस्मोपधेनवचेतरेणीरधो- ष्टोषावतकरवीर्य (२) गोध्रुरक्षितसुश्रुतप्रभृतय उच्युः ॥३॥
देवताओं में श्रेष्ठ, ऋषियों के समूह से घिरे, वानप्रस्थाश्रम में रहते हुए—कागिराज, भगवान्, दिवोदास धन्वन्तरि की
१ जगदर्यसाम्नाद् भगवन्तः-तस्यान्तो व्याधिः प्रका- तस्यसम्भटकोऽयमः, तस्यातिः स्याप्यकालमुपनिवशतान् ॥
आयुष्यते ।
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अ० १]
सूत्रस्थानम्
३
वि० मन्तव्यम्—'इह खलु' का तात्पर्य-इस ग्रन्थ में या इस अध्याय में या हमारे विचार में यह माना जाता है, निश्चय किया गया है या कहा जाता है भले ही अन्य ग्रन्थों में प्रकरणों में अध्यायों में अथवा अन्य आचार्यों के विचार मत में कुछ भी माना जाता हो निश्चय किया गया हो या कहा जाता हो। इस प्रकार विरोध तथा विरोधाभास का निराकरण हो जाता है जो मित्र २ प्रकारों, दृष्टिकोणों या विधिभेदों के अनुसार कहे गये विषय विरुद्ध (परस्पर या पूर्वोपर विरोधी) प्रतीत होते हैं ॥
तद्यथा—शल्यं, शालाक्यं, कायचिकित्सा, भूतविद्या, कौमारभृत्यम्, अगदतन्त्रं, रसायनतन्त्रं, वाजीकरणतन्त्रमिति ॥७॥
यथा—शल्य, शालाक्य, कायचिकित्सा, भूतविद्या, कौमारभृत्य, अगदतन्त्र, रसायनतन्त्र और वाजीकरण तन्त्र ॥७॥
अथास्य प्रत्यङ्गलक्षणसमासः—
तत्र, शल्यं नाम विविधतृणकाष्ठपाषाणपांशुलोहलोष्टास्थिबालनखपूयास्त्रावदुष्टव्रणान्तर्गर्भशल्योद्भरणार्थं, यन्त्र-शस्त्रस्त्रारान्नप्रणिधानव्रणविनिश्चयार्थं च ॥१॥
शालाक्यं नामोर्ध्वजत्रुगतानां श्रवणनयनबदनघ्राणादिसंश्रितानां व्याधीनामुपशमनार्थम् ॥२॥
कायचिकित्सा नाम सर्वाङ्गसंश्रितानां व्याधीनां ज्वररक्तपित्तशोषोन्मादापस्मारकुष्ठमेहातिसारादीनामुपशमनार्थम् ॥३॥
भूतविद्या नाम देवासुरगन्धर्वयक्षरक्षःपितृपिशाचनागमह्राद्युपसृष्टचेतसां शान्तिकर्मबलिहरणादिग्रहोपशमनार्थम् ॥४॥
कौमारभृत्यं नाम कुमारभरणधात्रीक्षीरदोषसंशोधनार्थं दुष्टस्तन्यग्रहसमुत्थानां च व्याधीनामुपशमनार्थम् ॥
अगदतन्त्रं नाम सर्पकीटतूतामूषकादिदुष्टविषयज्जन्तार्थं विविधविषसंयोगोपशमनार्थं च ॥६॥
रसायनतन्त्रं नाम वयःस्थापनमायुर्भधाबलकरं रोगाहरणसमर्थं च ॥७॥
वाजीकरणतन्त्रं नामाल्पदुष्टक्षीणविशुष्करेतसामाप्याग्रनमसादोपचयजनननिमित्तं प्रहर्षजननार्थं च ॥८॥
अब इन आठ अङ्गों में से प्रत्येक अङ्ग का लक्षण संक्षेप में कहते हैं। इनमें—
शल्य से अभिप्राय—नाना प्रकार के तिनके, काष्ठ, पत्थर, धूलि, लोहा, घातु, ढेला, अस्थि, बाल, नख, पूय, स्त्राव, दूषित व्रण, अन्तः शल्य, गर्भशल्य आदि को निकालने के लिये और यन्त्र, शस्त्र, स्नार, अग्नि के प्रयोग के लिये एवं व्रण के निश्चय के लिये, शल्य शास्त्र है।१
जत्रु ( ग्रीवामूल अथवा अंस सन्धि ) से ऊपर के रोग अर्थात्, कान, आँख, मुख और नासिका आदि में होनेवाले रोगों की शान्ति के लिये शालाक्य शास्त्र है।
वक्तव्य—जत्रु—शब्द से मिलता हुआ शब्द 'जात' या 'जोता' है। बैलों को गाड़ी में जोतते समय उनके गले के नीचे जो पड़ी या रस्सी जूले में बाँधी जाती है, उसे जोत कहते हैं। यह पड़ी जहाँ गले में बाँधती है, उस भाग का नाम जत्रु है।
(२) शलाका—पटलवेधनी—यह अर्थ है। लिंग नाश की चिकित्सा में शलाका का उपयोग सुश्रुत में बताया गया है। यथा—
नाधो नोर्ध्वं न पाश्चाभ्यां छिद्रं देवकृते ततः।
शलाकया प्रयत्नेन विश्वस्तं यवकृया ॥
मध्यप्रदेशिन्यंगुष्ठस्थिरहस्तगृहीतया।
दक्षिणेन भिषक् सव्यं विध्येत् सव्येन चेतर्त् ॥
सु० उ० अ० १७ ॥५६,६०॥
और चूँकि जत्रु से ऊपर के मुख, नाक, शिर, कान के रोगों में आँख के रोग ही अधिक हैं और इनमें आँख ही प्रधान है, इसलिये इस अङ्ग का नाम शालाक्य रक्खा गया है१।
(३) काय चिकित्सा—सारे अङ्गों में होने (प्रभाव डालने) वाले रोगों की अर्थात्, ज्वर, रक्तपित्त, शोष, उन्माद, अपस्मार, कुष्ठ, प्रमेह, अतिसार आदि रोगों की शान्ति के लिये कायचिकित्सा है।
वक्तव्य—'काय' का अर्थ सम्पूर्ण शरीर है, इसकी चिकित्सा कायचिकित्सा। अथवा 'कायति शब्दं करोति—इति कायो जाठराग्निः, अंगुलिपिहिते कर्णयुगले धुक इति शब्दश्रवणात् तास्थ्याद् वा कायशब्देन अग्निरुच्यते। उक्तं च भोजेन—
जाठरः प्राणिनामग्निः काय इत्यभिधीयते।
यस्तं चिकित्सेत् सीदन्तं स वै कायचिकित्सकः ॥
क्योंकि ज्वर, अतिसार आदि रोग अग्नि के दोष से ही होते हैं। इसी से कहा है—
शान्तेऽग्नीं प्रियते, युक्ते चिरं जीवत्यनामयः।
रोगी स्याद् विकृते मूलं, अग्निस्तस्मान्निरुच्यते ॥
चरक चि० अ० १५।
(४) भूतविद्या—देव, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितर, पिशाच, नाग, ग्रह आदि के आवेश से दूषित मनवालों की
अतिप्रवृद्ध मलदोषजं वा शरीरिणां स्थावरजंगमानाम्।
यत् किंचिदाबाधकरं शरीरे तत् सर्वमेव प्रवदन्ति शल्यम् ॥
१ जत्रु से ऊपर के रोगों में प्रायः शलाका से काम किया जाता है इससे शालाक्य नाम है।
१ शल्यम्—शल्य-हिंसायाम्-अथवा, शल्य-शलनम्—हिंसा इत्यर्थः—इसी से कहा है—
"~~ "4
५ ुश्रतसं हिता
शान्ति कर्म बक्िदान आदि के द्वार प्रह की शान्ति क ल्य
भूतविद्या दै । |
(५) कौमारमूत्य--ब्रालकं के भरएपोपषण धात्री के दुघ
क दोभों के संशोधन के लिये, दूषित स्तन्य के कारण (शरा
सकि) एवं इ््रह के कारण ( आगन्त॒ज ) रोगो कौ शा न्तिके
व्यि कोमारमभृत्य दे । स
(६) अगदतन्ब-खाप, कीड़ा, मकड़ी, चे आदि कं दश॒
से उन्न विषरोग की परीक्षा के व्यि तथा नाना प्रकारं के
विधो के संयोग से उन्न इए विकारो कौ शान्ति क ल्य
अगदतन्तर हे ।
(७) रसायनतन््र-अवस्था को बनाये रखने के ल्यः
आयु, मेधा ओर ब को बढाने के व्यि, तथा रोगों को दूर
करने की शक्ति के व्यि, १रसायनतन्तर दे ।
(८) बाजीकरण तन्ब- स्वभाव से ही अल्पवीयवाटे
पुरुषों मे वीयं को बद़ाने के यि, वात आदि मे दूषित शुक्रवालों में श॒क्र के शोधन के ट्य, किन्दीं कारणों से स्वाभाविक
परिमाण मे क्षीणशयक्रवालो में शुक्र की ब्द्धि के व्यि, बदा
वस्था के कारण शुष्कवीयंवाखों मे शुक्र पेदा करने के ल्यि
` तथा खीप्रसङ्ग मे प्रहपं उत्पन्न करने के च्थि वाजौकरण हे 1
एवमयसायुवदोऽषटाङ्ग उपदिश्यते; अत्र कस्म किमु
च्यतामिति (€)
~~ -- ~ -----*
१ रसायन-'रसराब्देन
लाभोपायः रसायनम् 1 जसा करि चरक मे कहा है-
लाभोपायो हि शस्तानां रसादीनां रसायनम् ॥
२ जिस प्रकार आजकरू रावित के माप की इकाई घोडा माना
गया है, उसी प्रकार प्राचीनकार मं घोड़े की ही शक्ति से तुरना
की जाती थी) इसी संकटा द-
` “ज्जवाजितनं वाजिने कुर्वन्ति मनेन -इति वाजीकरणम् । येन वा
अत्यर्थ व्यज्यते स्त्रीषु शुक्रं तद् बाजोकरणम् 1” जैसा कि चरक
` मे कहा है--
येन नारीष साम्यं वाजिव्रल्लभते तरः ।
व्रजते चाधिके येन वाजीकरणमेव तत् 11
अथवा वाजो वेग प्रस्तावाच्छक्रस्य, स ~ विद्यते येषां ते.
वाजिनः, ते क्रियन्तेऽनेन इति वाजीकरणम् । अथवा ` वाजः, ाक्र- |
~ सोऽस्यास्ति-इति-वाजीः-अवाजी वाजी क्रियते येन तद वाजीकर- । . करणम् 1 कि वां, वाजो मैथुनम्-उक्तं हि हारीते-- |
वाजो नाम प्रकारत्वाच्तच्च मेयनसंञ्जितम ।
| वाजीकरणसंनाभिः संजाभिः पुस्त्वमेव ` प्रचक्षते ॥
रसकार्यत्वात् सवषामेव धातूनां
ग्रहणम् 1 तेन रसादीनां शुक्रान्तानां, कि वा रसवीर्यवपाकानामयन `
राक्रसर तिकर“किचित्, किचित् शक्रविवर्धनम् ।
| अ०१
इस प्रकार से यह आयुर्वेद आठ अज्ञोवाखा कहा जाता
है। इन आठ अङ्गं मे से किस अङ्ग का तुम्हारे मे से किसके
लिय, उपदेश करू, वहं कहौ ॥६॥।
त ऊचुः अस्माकं सवषामेव शल्यज्ञानं मूं खो
पदिश्जतु भगवानिति ॥१०॥
उन शिष्यो ने कहा--हे भगवन् ! आप राल्य ज्ञानको
मुख्य रखकर हम सब को आयुवेद का उपदेश दे ॥१०॥।
स उवाचेवमरिःति ॥११॥
भगवान् धन्वन्तरि ने कहा-एेसा हौ सदी ॥११॥
त॒ उचुभूयोऽपि भगवन्तम्-अस्माकमेकमतीन
मतममिसमीदय सुश्रतो भगवन्तं प्रद्यति; अस्म चोपदि-
रयमानं वयमप्युपधारयिष्यामः ॥१२॥
स॒श्रत आपसे पूछेगा जौर इस सुश्रुत को सम्बोधन करके कै
उपदे को हम सव धारण करगं ॥१२॥
स होवाचेवमस्सिति ॥१३॥
भगवान् धन्वन्तरि ने कहा--रेखा दी सही ।।१३॥
वत्स सुश्रत । इह खल्वरायुवदप्रयोजनं--व्याध्युपसछान् व्याधिपरिमोक्षः, स्वस्थस्य रक्वणं च ॥१४।।
शाख का प्रयोजन-रोगोंसे आक्रान्त प्राणियों कोरोगं से
आयुरस्मिन् विद्यते, अनेन वाऽध्युर्विन्दन्तिः इत्या-
युवद्ः ॥१५।। |
इनके संयोग का नाम आयु है, यह इस आयुवंद् में हे, अथवा
इस शाख के दवारा आयु प्राप्त होती दहे, इसल्यि यह आयु
वेद हेर ॥१५॥
सर तिवद्धिकरं किचित्, तरिविधं वष्यम् च्यते ॥
प्ररामनं च.1। चरक सूत्र अ०३०॥ - ५
२. (१) -हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम् ।
` _ - सान तच्च यच्चोवतमायुवदः स॒ उच्यते ॥
(२) हिताहिततः, सुखासुखंतः अ्रभााप्रपाणतक्च तदायु व॑द“
स स र^ | यतीत्यायुवंदः । यतस्चोयुष्याणिं, अनायुष्याणि च दव्यगुणकंमा
शठदास सत, यहं वाजकरण् तीन भकार कहा है। यथा-- । वेदयति ततोऽप्ययमायुरवेदः ॥ च० सू ० अ० ३० ।
| ` तत्र स् तिकर-स्त्रीस्पर्गादि, वद्धिकरं क्षीरादि; स तिवृद्धि
करं माषादि। | १ प्रयोजन. चास्य-स्वस्थस्थ स्व्ारथ्यरचणमातुरस्य विकार
उन िष्यों ने फिर मी भगवान् धन्वन्तरि को कहा-क्रि
एक विचारवाल्ते हम खों के अभिप्राय कोष्यानमंरखक्रर्
हे वत्व सुश्रत ! आयुवद्रोद्पत्ति के विषय मे-आयुवंद् . |
मुक्त करना ओर स्वस्थ मनुष्यों के स्वास्थ्य कीरक्षा करना है । ˆ
आयुवेद की निरुक्ति--शरीर, इन्द्रिय, सत्त्व ओर आत्मा प
"---
2 ०9७०० [4.५
वका = `
अ० १ |
तस्याङ्गवरमाद्य प्रस्यक्षागमायुसानोपमानैरविरदध
मुच्यमानसुपधारय ॥१६॥
इस आयुवंद् के श्रेष्ठ एवं आदिम अङ्ग को- प्रत्यक्ष
अनुमान उपमान ओर आगम इन चार प्रमाणो से अविसेध
रूप मे कहता हू, सुनो ' ॥ १६
एतद्धयङ्ग प्रथमं, प्रागभिघातव्रणसंरोहायज्ञभिरः-
सन्धानाच्च । श्रयते हि यथा-““सुद्रेण यज्ञस्य शिरश्छिन्न- मिति, ततो देवा अस्विनावभिगम्योचुः- भगवन्तो ! नः
श्रेष्ठतमो युवां भविष्यथः, सवद्भ्यां यज्ञस्य शिरः सन्धा-
तव्यमिति । तावूचतुरेवमस्वि्ति। अथ तयोरथं देवा
इन्द्र यज्ञभागेन प्रसादयन् । ताध्यां यज्ञस्य जिर
संहितम्?” इति ॥१७।।
इन आटो अङ्गं से-- यह शल्य अङ्ग ही प्रधान दै।
वयोक्रि-- प्रथम देवासुर संग्राम मे वणो्पत्ति के रोहण होने से
ओर यज्ञ का सिर जोड़ने के कारण-यह शल्यतन्ब प्रधान
है । एेखा परम्परा से सुना जाता है कि--^सद्रने यज्ञ का सिर
काट दिया था, तब देवताओं ने अश्विनी कुमारो के पास
जाकर क् कि “ आप दोनों यज्ञ का सिर जोड देः| इस
प्रकार करने से आप हम मे अतिश्रेष्ठ होंगे । अशिनां ने कहा
कि- अच्छा, एेसादहीहो। तव देवताओं ने इन अश्विनः
। कुमारो के यज्ञमागके ल्यि इन्द्र को प्रसन्न किया | अश्विनी
नक 914०-4 ५५०.
कुमारां ने यज्ञ का सिर जोड़ दिया” ।| १७]
अष्टास्पि नायुवदतन्त्रष्वैतदेवाधिकमभिमतम्,
आद्युक्रियाकरणायन्त्रशखक्षाराग्तिप्रणिधानात् सबतन््रसामान्याञ्च ॥९८॥
आयुवद के आगो तन्नो मे यदह -शल्यतन्र ही सब से
अधिक मान्य है । क्योकि यन्न, शखर, क्षारं ओर अग्नि
प्रयोग मे शीघ्र क्रिया करने के कारण तथा शालाक्य आदि सखव
तन्त्रो में सामान्य होने के कारण | ¦
वक्तव्य- शल्य तन्व; मे--यन्, शसन, क्षार आदि का
प्रयोग रीघ्र होने सेरोगकी निद्त्तिमी शीघद्ी होती है।
(२ ओषध-चिकिस्सा म जितना मय गता है, शख-चिकित्सा मेँ + कम कगता है । दूखरी बात--आयुवेंद के शेष सब अङ्गं को ` किसी 1 न किसी रूप मे शल्य तन्न की अपेक्षा रहती दै। इसी
। १ चरकमे तीनही प्रमाण मने हं, यथ त्रिविधं ख.
` रोगविशेषविज्ञानं भवति, तद्यथा-आप्तोपदेश प्रत्त त्यम्, -अत्-
माने चेति ।॥ चरकं वि० अ० ४1
२.अश्विनौ देवभिषजौ यज्ञवाहाविति स्मृतो ।
यज्ञ्य हि शिरशिछन्तं पुनस्ताभ्यां समाहितम् ॥
एतश्चान्यर्चं बहुभिः कर्मभिभिषगु त्तमो ।
बभूवतुमृशं पूज्पानिद््रादीनां महात्मनाम. ~ `.
ष क अय्जका राज ताया उ का -21 यक कज वक त -- 7
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सूत्रस्थानम् | ५
९। € क,9 ऋ.9 ९) सं चरक म अशरोग मं, गुल्म मे, उद्ररोग में (शल्यचिकित्सकः को सहायता ेने के स्यि कहा ३१ ॥शद्] ` तदिदं शाश्वतं पुण्यं स्वग्यं यज्चस्यमायुष्यं वृत्तिकरं चेति ॥१९॥
वह यह शाल्यशास्र शश्वत (अविनाशि), पुण्य का निपित्त
वग के ल्यि मंगल का-यश का खाधन, आयु के च््यि हित- कारी ओर दूसरी जीविका का साधन है ॥ {€॥ ब्रह्मा म्रोवाच ततः प्रजापतिरधिजने, तस्मादशिविनौ
श्विभ्यामिन्द्रः इन्द्रादहं, मया विह प्रदेयमर्थिभ्यः
जाहितहेतोः ।(२०॥
इस आयुर्वेद का ब्रह्मा ने उपदेश क्रिया, ब्रह्मा से प्रजा- पति दक्न ने पदा, दक्ष प्रजापति से अश्विनी कुमारो ने सीला अशिनो से हन्द्र ने ओर इन्द्र से मेने ( षन्वतरि ने ) पदा । मुभे तो इख मव्य लोक मे-प्रजाके कल्याणके ल्यि. अथि रूप मे शिष्य रूप से आये हए ठमकरो देना रैर ।२०॥
अक्ति चात्रअहं हि धन्वन्त्रिरादिदेबो जरार्जामरव्युहरोऽमराणाम्। शल्याङ्गसङ्ञरपरेरुपेतं प्रा्ठोऽस्मि गां भूय इहोपदेष्टम् २९ इस विधयमे कहा भी है-
देवताओं कौ द्धावस्था, रोगउ तथा मल्यु दूर ` करनेवाला
१ अरोग मे -तत्राहुरेके शस्त्रेण कर्तनं हितमर्शसाम ।
दाहं तारण चाप्येके दाहमेके तथाऽग्िना ॥ गुत्मरोग मे-
तत्र धान्वतरीयाणामधिकारः क्रियाविधो ।
वेदयानां क तयोग्यानां व्यधशोधनरोपणे ॥ | ` उदररोग मे इदं तु शल्यहतु णां कर्म स्याद् दृ्टकर्मणाम् ॥ | चरक चि० अ० १३ ।
२ कहा हं--सम्यग् गुरुमुखादधीत्य . यो न प्रयच्छत्यन्तेवा- `
सभ्यः स खलु ऋणी गुरुजनस्य महदेनो विन्दति ॥
(£ अ्विना--शब्द आजकर के 1. 8. 8. ऽ. या
॥4. 13. 1८. 5. का प्रतिनिधि ह । वेदिक देवताओं मे येही
युग ह, ओर इनके दोनों प्रकार के सजिकर शीर मँ डिकर कार्य
मिरुते हं । यथा-सजिकर-यज्ञस्य- हि शिररिछन्ं पतस्ताभ्यां `
` समाहितम् ।
सेडिकक-भागवश्च्यवनः कामी बद्धः सन् विकृति गतः 1
वीतवरणस्वरोपेतः ङतस्ताम्या पुनर्युका-॥1- ~ ~> `
३ देवताओं को भी रोग होते है, यथा-- ~. . ` = ह
` -खालित्यं गरुडध्वजस्य शिरसि, स्ताकिब्रणो ब्रह्मणो।॥ _ मे ०
~ घोरं चापि -जलोदरं ~ च वरूणस्येन्दोस्तथेव . क्षयः श
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