सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
विषय पृष्ठ
रक्त के अतियोग और उसके उपद्रव ५३
रक्तविखावण योग्य काल ५३
रक्तशुद्धि के लक्षण ५३
रक्तके सम्यक् प्रवाह के उपाय ५४
रक्तके अधिक प्रवाह रोकने के योग्य ५४
रक्तखावनिवारण के चार उपाय ५५
पंचदशोऽध्यायः
दोष धातु मलक्षय बुद्धि विज्ञानीय
अध्याय की व्याख्या ५५
स्वस्थों के वातादि का कर्म ५५
धातु रक्षा के उपदेश ५६
दोषों के क्षय की चिकित्सा रसक्षय ५६
मलक्षय ५७
आर्तव क्षय ५७
बढ़े हुए दोष धातु मलों के लक्षण और उनकी चिकित्सा ५७-५८
बल और बलक्षय के लक्षण ५८
ओज का क्षय ५८
ओज के तीन दोष और चिकित्सा ५८
स्थूलता और कृशता की
चिकित्सा ५९-६१
मध्य की श्रेष्ठता ६२
षोडशोऽध्यायः
कर्ण वेधन विधि की व्याख्या ६२
कर्ण वेधन विधि ६२
सिराओं के वेधन से क्या दोष होते हैं ६३
इन दोषों की चिकित्सा ६४
वेधन के पश्चात्कर्म ६५
दोष के शान्त होने पर कानों को लम्बा करना ६५
कानों के दो मार्ग हो जाने पर उनको जोड़ने की विधि ६६
पन्द्रह कर्णबन्धाकृतियाँ ६६
कपाट सन्धि तथा अर्ध कपाट सन्धिक बन्धन ६६
कर्ण पाली को बनाना ६६
कर्ण सन्धि ६६
कर्णबन्ध के समय परित्याग करने योग्य बातें ६६
विषय पृष्ठ
सन्धान न करने के कारण ६७
अदूषित कान को बढ़ाने के लिये अभ्यङ्ग ६७
उद्बर्तन ६७
असंख्य कर्ण बन्धन ६७
पाली के उपद्रवों के नाम और लक्षण ६७
उत्पाटक रोग में ६७
श्याम रोग में ६७
नासिका का शल्यकर्म ६७
ओष्ठ सन्धानविधि ६७
सप्तदशोऽध्यायः
आमपक्ववेणीय अध्याय की व्याख्या ६८
ग्रन्थि, विद्रधि, अलजी आदि रोगों का प्रधान कारण शोथ ६८
शोथ का लक्षण ६८
शोथ छे प्रकार का है ६८
आम शोथ के पकने के लक्षण ६९
शस्त्रकर्म से पूर्व कर्म ७०
कष्टसाध्य शोथ ७०
बाहर न निकली हुई पूय, मांस, शिरा स्नायुओं का भक्षण करता है ७०
अष्टादशोऽध्यायः
त्रणलेपनबन्धविधि की व्याख्या ७१
आलेप ही सब उपायों में प्रधानतम है ७१
आलेप को लोमों के अधिमुख लगाना चाहिये ७१
सूखा हुआ आलेप निरर्थक और दर्द करनेवाला होता है ७१
आलेप तीन प्रकार का है ७१
आलेप का प्रमाण ७१
रात्रि को आलेप नहीं करना चाहिये ७२
प्रदेह साध्य व्याधि में दिन में आलेप करना उत्तम है ७२
त्रणबन्धन द्रव्यों की व्याख्या ७३
पट्टियाँ ७३
शरीर के भिन्न २ प्रदेशों में कौन सी पट्टी बाँधना चाहिये ७३
औषधकल्क ७४
विषय पृष्ठ
त्रणके स्थानभेद से बन्ध भी तीन प्रकार का है
दोष विशेष से बन्ध ७४
कालविशेष से बन्ध विशेष ७४
क्षिथिलबन्ध के स्थान पर गाढ बन्ध नहीं बाँधना चाहिये ७४
त्रण पर पट्टी न बाँधने से त्रण जल्दी कैसे भरता है ७५
किन अवस्थाओं में बन्धन नहीं बाँधना चाहिये ७५
उपसंहार-यंत्रणा तीन प्रकार की है ७६
किन में बन्धन बाँधना आवश्यक है ७६
एकोनविंशोऽध्यायः
त्रणितोपासन्य की व्याख्या ७६
त्रणी पुरुष के लिए सबसे पहले क्या व्यवस्था करनी चाहिये ७६
प्रशस्त प्रदेश में बने घर से लाभ ७६
शय्या पर सोने से लाभ ७६
त्रणी पुरुष को कभी दिन में न सोना चाहिए ७६
त्रणी की चेष्टाएँ किस प्रकार होनी चाहिए ७६
गम्य ग्राम्यधर्म के योग्य स्त्रियों से दूर बचना चाहिए ७७
किस आहार का परित्याग करना चाहिये ७७
बाह्य आहार-विहार-जिनसे बचना चाहिये ७७
आधिदैविक रक्षा ७७
धूप कैसी देनी चाहिये ७८
किन औषधियों को सिर पर धारण करना चाहिये ७८
सेवन विधि ७८
विशतितमोऽध्यायः
हिताहितौय नामक अध्याय की व्याख्या ७९
द्रव्य स्वभाव से, संयोग से, पूर्णरूप में हित या अहित दोनों करने-वाले होते हैं ७९