भारतकोश
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सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

सुश्रुतसंहिता

विषय पृष्ठ

रक्त के अतियोग और उसके उपद्रव ५३

रक्तविखावण योग्य काल ५३

रक्तशुद्धि के लक्षण ५३

रक्तके सम्यक् प्रवाह के उपाय ५४

रक्तके अधिक प्रवाह रोकने के योग्य ५४

रक्तखावनिवारण के चार उपाय ५५

पंचदशोऽध्यायः

दोष धातु मलक्षय बुद्धि विज्ञानीय

अध्याय की व्याख्या ५५

स्वस्थों के वातादि का कर्म ५५

धातु रक्षा के उपदेश ५६

दोषों के क्षय की चिकित्सा रसक्षय ५६

मलक्षय ५७

आर्तव क्षय ५७

बढ़े हुए दोष धातु मलों के लक्षण और उनकी चिकित्सा ५७-५८

बल और बलक्षय के लक्षण ५८

ओज का क्षय ५८

ओज के तीन दोष और चिकित्सा ५८

स्थूलता और कृशता की

चिकित्सा ५९-६१

मध्य की श्रेष्ठता ६२

षोडशोऽध्यायः

कर्ण वेधन विधि की व्याख्या ६२

कर्ण वेधन विधि ६२

सिराओं के वेधन से क्या दोष होते हैं ६३

इन दोषों की चिकित्सा ६४

वेधन के पश्चात्कर्म ६५

दोष के शान्त होने पर कानों को लम्बा करना ६५

कानों के दो मार्ग हो जाने पर उनको जोड़ने की विधि ६६

पन्द्रह कर्णबन्धाकृतियाँ ६६

कपाट सन्धि तथा अर्ध कपाट सन्धिक बन्धन ६६

कर्ण पाली को बनाना ६६

कर्ण सन्धि ६६

कर्णबन्ध के समय परित्याग करने योग्य बातें ६६

विषय पृष्ठ

सन्धान न करने के कारण ६७

अदूषित कान को बढ़ाने के लिये अभ्यङ्ग ६७

उद्बर्तन ६७

असंख्य कर्ण बन्धन ६७

पाली के उपद्रवों के नाम और लक्षण ६७

उत्पाटक रोग में ६७

श्याम रोग में ६७

नासिका का शल्यकर्म ६७

ओष्ठ सन्धानविधि ६७

सप्तदशोऽध्यायः

आमपक्ववेणीय अध्याय की व्याख्या ६८

ग्रन्थि, विद्रधि, अलजी आदि रोगों का प्रधान कारण शोथ ६८

शोथ का लक्षण ६८

शोथ छे प्रकार का है ६८

आम शोथ के पकने के लक्षण ६९

शस्त्रकर्म से पूर्व कर्म ७०

कष्टसाध्य शोथ ७०

बाहर न निकली हुई पूय, मांस, शिरा स्नायुओं का भक्षण करता है ७०

अष्टादशोऽध्यायः

त्रणलेपनबन्धविधि की व्याख्या ७१

आलेप ही सब उपायों में प्रधानतम है ७१

आलेप को लोमों के अधिमुख लगाना चाहिये ७१

सूखा हुआ आलेप निरर्थक और दर्द करनेवाला होता है ७१

आलेप तीन प्रकार का है ७१

आलेप का प्रमाण ७१

रात्रि को आलेप नहीं करना चाहिये ७२

प्रदेह साध्य व्याधि में दिन में आलेप करना उत्तम है ७२

त्रणबन्धन द्रव्यों की व्याख्या ७३

पट्टियाँ ७३

शरीर के भिन्न २ प्रदेशों में कौन सी पट्टी बाँधना चाहिये ७३

औषधकल्क ७४

विषय पृष्ठ

त्रणके स्थानभेद से बन्ध भी तीन प्रकार का है

दोष विशेष से बन्ध ७४

कालविशेष से बन्ध विशेष ७४

क्षिथिलबन्ध के स्थान पर गाढ बन्ध नहीं बाँधना चाहिये ७४

त्रण पर पट्टी न बाँधने से त्रण जल्दी कैसे भरता है ७५

किन अवस्थाओं में बन्धन नहीं बाँधना चाहिये ७५

उपसंहार-यंत्रणा तीन प्रकार की है ७६

किन में बन्धन बाँधना आवश्यक है ७६

एकोनविंशोऽध्यायः

त्रणितोपासन्य की व्याख्या ७६

त्रणी पुरुष के लिए सबसे पहले क्या व्यवस्था करनी चाहिये ७६

प्रशस्त प्रदेश में बने घर से लाभ ७६

शय्या पर सोने से लाभ ७६

त्रणी पुरुष को कभी दिन में न सोना चाहिए ७६

त्रणी की चेष्टाएँ किस प्रकार होनी चाहिए ७६

गम्य ग्राम्यधर्म के योग्य स्त्रियों से दूर बचना चाहिए ७७

किस आहार का परित्याग करना चाहिये ७७

बाह्य आहार-विहार-जिनसे बचना चाहिये ७७

आधिदैविक रक्षा ७७

धूप कैसी देनी चाहिये ७८

किन औषधियों को सिर पर धारण करना चाहिये ७८

सेवन विधि ७८

विशतितमोऽध्यायः

हिताहितौय नामक अध्याय की व्याख्या ७९

द्रव्य स्वभाव से, संयोग से, पूर्णरूप में हित या अहित दोनों करने-वाले होते हैं ७९

विषयानुक्रमणिका

विषयपृष्ठ
पूर्णरूप में हितकारी द्रव्य८०
प्राणियों का पथ्य-आहार८०
विहार८०
अन्य द्रव्य संयोग के आहार
विषवत् अतिकारी हो जाते हैं८०
अग्नि आदि पदार्थों को देखकर
एकान्त अहित पदार्थों का भी
उपयोग करें८०
अन्यसंयोगरूपी अहितकारी
द्रव्य८०
कर्मविरुद्धद्रव्य८१
मानविरुद्ध द्रव्य८१
रस, वीर्य और विपाक में विरुद्ध
द्रव्य८१
कोई द्रव्य दोष का प्रकोपक और
कोई द्रव्य दोष की शान्ति
करता है८१
रस आदि धातुओं में विकार
कैसे होता है८२
चिकित्सासूत्र८२
किन अवस्थाओं में विरुद्ध भोजन
निष्फल हो जाता है८२
दिशा के योग से वायु की हित्
कारिता और अहित कारिता८३
एकविंशतितमोऽध्यायः
व्रण प्रश्न नामक अध्याय की
व्याख्या८३
शरीर की उत्पत्ति में कारण८३
निरुक्ति८३
दोषों के स्थान८४
इनके पांचविभाग८४
पित्त के अतिरिक्त क्या कोई
और अग्नि शरीर में है८४
शरीर में पित्त के कार्य८४
पित्त के लक्षण८५
कफ के स्थान८५
कफ के गुण८५
दोषों के प्रकोपक कारण८६
विषयपृष्ठ
दोषों का प्रसार८६
रोग की उपलब्धि८८
व्रण शब्द की निरुक्ति८६
द्वविंशतितमोऽध्यायः
व्रणस्त्रावविज्ञानीय अध्याय की
व्याख्या९०
व्रण के आठ अधिष्ठान९०
त्वचा में स्थित व्रण सुख
साध्य है९०
व्रण की चार आकृतियाँ९०
दुष्ट व्रण के लक्षण९०
सब प्रकार के स्त्राव९१
वायु के कारण९१
असाध्य स्त्राव९१
सब व्रणों की वेदना९१
पैतिक व्रणों के लक्षण९१
कफजन्य व्रण के लक्षण९२
व्रण के रङ्ग९२
त्रयोविंशतितमोऽध्यायः
कृत्याकृत्य नामक अध्याय की
व्याख्या९२
अतिशय सुखसाध्यव्रण९३
कृच्छ्र साध्य व्रण९३
व्रण जो सुखपूर्वक रोहण हो जाते हैं९३
साध्य के भेद कृच्छ्रसाध्य व्रण९३
याप्य व्रण९३
याप्य का लक्षण९३
असाध्य रोग९३
शुद्धव्रण के लक्षण९४
रोहण होते हुये व्रण के लक्षण९४
सम्यग् रुद्ध के लक्षण९४
चतुर्विंशतितमोऽध्यायः
व्यापिसमुद्देशीय नामक अध्याय की
व्याख्या९५
रोग दो प्रकार के हैं९५
तीन प्रकार का दुःख९५
सात प्रकार की व्याधियाँ९५
दुष्ट शोणित बलजाता९५
विषयपृष्ठ
प्रहार शक्ति से उत्पन्न आगन्तु-
जरोग९५
कालवृल प्रवृत्ता९५
रसादि धातुओं के विकार९६
वात आदि दोषों का ज्वर आदि
रोगों के साथ सम्बन्ध सदा बना
रहता है अथवा नहीं९७
पञ्चविंशतितमोऽध्यायः
अष्टविध शस्त्रकर्मोपध्याय की
व्याख्या९७
छेदन करने योग्य रोग९७
भेदन करने योग्य रोग९८
लेखन करने योग्य रोग९८
वेधन करने योग्य रोग९८
शलाका द्वारा एषण करने
योग्य९८
स्त्रावण करने योग्य रोग९८
सीने योग्य रोग९८
किन अवस्थाओं में सीना नहीं
चाहिये९९
संशोधन करने योग्य९९
सीने की विधि९९
सीने के चार प्रकार९९
सूई के भेद९९
सीने के पश्चात् कर्म९९
आठ प्रकार के शस्त्र कर्म में चार
प्रकार की व्यापद है९९
किस वैद्य का परित्याग करना
चाहिये१००
शस्त्र के अतियोग से होनेवाले
लक्षण१००
सर्म्पविद्धशिशा आदि के
लक्षण१००
स्नायु के विद्ध होने पर१००
सन्धि के विद्ध होने पर१००
अस्थि के विद्ध होने पर१००
बिरादि सर्म्प के विद्ध होने पर१०१

सुश्रुतसंहिता

विषयपृष्ठ
वैद्य को रोगी की रक्षा कैसे करनी चाहिये और उसका फल१०१
षड्विंशतितमोऽध्यायः
प्रनष्टशल्यविज्ञानीय अध्याय की व्याख्या१०१
शल्य के प्रकार१०१
शारीरिक शल्य१०१
शल्य के प्रसिद्ध भेद१०१
छोटे बड़े शल्यों की पाँच प्रकार की गति१०२
शल्य का लक्षण१०२
वात आदि दोषों से अदूषित१०२
त्वचा में शल्य छिप जाने पर१०२
सामान्य विज्ञानीय उपाय१०३
निःशल्य के लक्षण१०३
अस्थि रूप शल्य१०४

सप्तविंशतितमोऽध्यायः

शल्योपनयनीय अध्याय की व्याख्या१०४
शल्य के दो प्रकार१०४
अनवबद्ध शल्य को निकालने के १५ उपाय१०४
सब प्रकार के शल्य निकालने की दो विधियाँ१०५
अर्वाचीन शल्य को निकालने का उपाय१०५
पराचीन शल्य निकालने का उपाय१०५
उत्तुषित मुखवाले शल्य को निकालने का उपाय१०५
कुखि, वक्ष आदि के शल्य को निकालने का उपाय१०५
शल्य को निकालने के पश्चात् कर्म१०५
हृदय के समीप शल्य निकालने का उपाय१०६
अस्थि छिद्र में प्रविष्ट को निकालने के उपाय१०६
विषयपृष्ठ
कर्णवाले शल्य को निकालने का उपाय१०६
लाख आदि वस्तु के गले में फँस जाने से उसे निकालने का उपाय१०७
मछली का शल्य आदि निकालने का उपाय१०७
पानी में डूबे हुए मनुष्य के पेट में से जल निकालना१०७
भोजन का प्राप्त गले में फँस जाने से निकालने का उपाय१०७
गला घोटने पर१०७
अष्टविंशतितमोऽध्यायः
विपरीत व्रण विज्ञानीय अध्याय१०८
रिष्टलक्षण मृत्यु को बता देता है१०८
किन अवस्थाओं में रिष्टलक्षण नहीं पता चलते१०८
रिष्टलक्षणों के निवारण के उपाय१०८
प्राकृतिक गन्ध१०८
वैकृतगन्ध१०८
किन व्रणों का परित्याग करना चाहिये१०८
शब्द वैकृत१०९
स्पर्श वैकृत१०९
आकृति विशेष वैकृत१०९
उपद्रव१०९

एकौनत्रिंशत्तमोऽध्यायः

विपरीताविपरीत-दूत-शकुन-स्वप्न निदर्शनीय नामक अध्याय की व्याख्या१०९
वैद्य की मानसिक चेष्टाओं से रोगी के शुभ अशुभ भाव पता लग जाते हैं१०९
विषयपृष्ठ
निन्दित दूत के लक्षण११०
चेष्टायेँ११०
वेला११०
नक्षत्र११०
तिथि११०
शुभ-अशुभ शकुन१११
शुभ तथा निन्दित वायु१११
वैद्य को इनकी निश्चित रूप से परीक्षा करनी चाहिये१११
स्वप्न११३
विफल स्वप्न११३
उत्तरतंत्र में पढ़े हुये रोगों के लिये अन्य स्वप्न११४
अशुभ स्वप्न में चिकित्सा११४
शुभ स्वप्न११४

त्रिंशत्तमोऽध्यायः

पंचेन्द्रियार्थ विप्रतिपत्ति नामक अध्याय की व्याख्या११४
अरिष्ट के लक्षण११५
न बचनेवाले रोगी के लक्षण११५

एकत्रिंशत्तमोऽध्यायः

छाया विप्रतिपत्ति अध्याय की व्याख्या११६
निश्चयात्मक मरनेवालों के लक्षण११६
मृत्यु के कारण११७

द्वान्त्रिंशत्तमोऽध्यायः

स्वभाव विप्रतिपत्ति नामक अध्याय की व्याख्या११८
प्रकृति से प्रसिद्ध-शरीर के एक भाग में स्थित अवयवों का दूसरे रूप में परिवर्तित होना मृत्यु के लिये होता है११८
असाध्य के लक्षण११८

त्रयत्रिंशत्तमोऽध्यायः

अवार्णीय नामक अध्याय की | ---|---

विषयानुक्रमणिका

9

विषयपृष्ठ
व्याख्या१२०
आठ महारोग१२१
वैद्य को किन रोगियों का परित्याग करना चाहिये१२२
चतुर्विंशतिसप्तमोऽध्यायः
युक्तसेनीय नामक अध्याय की व्याख्या१२२
राजा की रक्षा वैद्य को किस प्रकार करनी चाहिये१२३
१०१ साल की काल मृत्यु१२३
पुरोहित वैद्य से श्रेष्ठ है१२४
राजा के व्यसनों में फँसने के कारण१२४
चिकित्सा कर्म की सफलता में चार कारण वस्तुएँ१२४
वैद्य के गुण१२४
रोगी मनुष्य के गुण१२४
क्षेपज के गुण१२४
परिचारक के गुण१२४
पञ्चत्रिंशतिसप्तमोऽध्यायः
आतुरोपक्रमणीय अध्याय की व्याख्या१२४
चिकित्सा से पहले रोगी की आयु परीक्षा१२४
दीर्घायु के लक्षण१२५
मध्यमायु पुरुष के लक्षण१२६
जघन्य आयु के लक्षण१२६
आयु के विज्ञान के लिये अङ्ग प्रत्यंग का ज्ञान, प्रमाण एवं सार१२६
क्रिया का लक्षण१२८
अग्नि के चार प्रकार१२९
विषमार्गिन१२९
तीक्ष्णार्गिन१२९
समार्गिन१२९
जाठराग्नि१३०
वय तीन प्रकार की है१३०
बृद्धावस्था में बाल्यावस्था के समान औषध मात्रा१३०
देह परीक्षा१३१
देश तीन प्रकार का है१३१
विषयपृष्ठ
मुख साध्य रोग१३१
षट्त्रिंशतिसप्तमोऽध्यायः
भूमिप्रविभागीय नामक अध्याय की व्याख्या१३२
भूमि का दो प्रकार का विभाग१३२
विशेष भूमि परीक्षा१३२
गन्ध, वर्ण एवं रस से उक्त भूमि का प्रकार की है१३३
औषधियों को रखने का स्थान१३३
सप्तत्रिंशतिसप्तमोऽध्यायः
मिश्रक अध्याय की व्याख्या१३४
सन्निपातजन्य शोथ को नष्ट करने के प्रलेप१३४
लेप का संस्कार१३४
पाचन द्रव्य१३४
दारण द्रव्य१३४
पीडन द्रव्य१३४
शोथन द्रव्य१३४
वर्ति१३५
कल्क१३५
संशोधनघृत१३५
तैल१३५
शोथन चूर्ण१३५
शोथनी रसक्रिया१३५
धूपन१३५
रोपणकषाय१३५
रोपणवर्ति१३५
व्रण के संरोहण के लिये कल्क१३५
सिद्ध घृत१३५
रोपण तैल१३५
रोपणचूर्ण१३६
रोपण कार्य के लिए रस क्रिया१३६
मांसवर्धन कार्य में प्रशस्त औषधियाँ१३६
उभरे हुए मांस को काटने के लिये१३६
अष्टत्रिंशतिसप्तमोऽध्यायः
द्रव्यसंप्रहणीय अध्याय की व्याख्या१३६
विषयपृष्ठ
सैतीस द्रव्य समूह के नाम आरग्वधादिगण१३६
सालसारदिगण१३६
वीरतर्वादिगण१३७
लोब्रादिगण१३७
अर्कादिगण१३७
सुरसादिगण१३७
मुष्कादिगण१३७
पित्तक्यादिगण१३७
एलादिगण१३७
वचादि तथा हरिद्रादिगण१३८
श्यामादिगण१३८
बृहत्यादिगण१३८
पटोलादिगण१३८
काकोल्यादिगण१३९
ऊषकादिगण१३९
सारिवादिगण१३९
अञ्जनादिगण१३९
पुरुषादिगण१३९
अम्बुघादिगण१३९
न्यम्रोघादिगण१३९
गुड्द्यादिगण१३९
उत्पलादिगण१३९
मुस्तादिगण१३९
त्रिफला१३९
त्रिकटु१३९
आमलक्यादिगण१३९
त्रप्वादिगण१३९
पञ्चमूल१३९
महापञ्चमूल१३९
वक्षमूल१३९
वल्लीपञ्चमूल१४०
कण्टकपञ्चमूल१४०
तुष्ट्यपञ्चकमूल१४०
एकोनचत्वारिंशतिसप्तमोऽध्यायः
संशोधनसंशमनीय नामक अध्याय की व्याख्या१४१
दो प्रकार के संशोधन१४१
शिरीरविरचन द्रव्य१४२
संशमनद्रव्य१४२

सुश्रुतसंहिता

विषय पृष्ठ

उचित मात्रा में न दी हुई औषध क्या दोष करती है १४३

चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः

द्रव्य, रस, गुण, वीर्य, विपाक विज्ञानीय नामक अध्याय की व्याख्या १४३

द्रव्य ही प्रधान है ऐसा कुछ आचार्य कहते हैं १४४

द्रव्य का लक्षण १४४

रस ही प्रधान है ऐसा दूसरे आचार्य कहते हैं १४४

वीर्य ही प्रधान है ऐसा तीसरे आचार्य का मत १४४

विपाक ही प्रधान है ऐसा चौथे आचार्यों का मत है १४५

पाक भी दो प्रकार का है १४५

विपाक के दो भेद १४६

रस, वीर्य, विपाक में द्रव्य को ही श्रेष्ठ समझना १४६

शास्त्र की प्रधानता १४६

एकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः

द्रव्यविशेष विज्ञानीय अध्याय की व्याख्या १४७

द्रव्य की उत्पत्ति १४७

पार्ष्व द्रव्य १४७

आप्य द्रव्य १४७

वायवीय द्रव्य १४७

आकाशीय द्रव्य १४७

द्रव्य की कार्यशीलता, काल तथा कर्म १४७

द्रव्य के दो भेद (अधोमार्गी, ऊर्ध्वमार्गी) १४७

संशमनगुणवाले द्रव्य संग्राहक, दीपन, आग्नेय, लेखन, बुद्धि १४७

वीर्यसंज्ञक गुण १४८

पंचमहामृतों के समान गुण- वाले द्रव्यों में रस की विलक्षणता १४८

द्विचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः

रसविशेषविज्ञानीय नामक अध्याय की व्याख्या १४९

विषय पृष्ठ

सब मृतों में परस्पर सम्बन्ध बृद्धि तथा ह्राससे जाना जाता है १४९

जलीयरस के छ प्रकार १४९

परस्पर एक दूसरे से मिलने पर ६३ प्रकार १४९

कई आचार्यों के मत से रसों के दो भेद १४९

पित्त १५०

कफ १५०

रस के लक्षण १५०

रस के गुण १५०

अम्ल रस १५१

लवण रस १५१

कटु रस १५१

तिक्त रस १५१

कषाय रस १५१

मधुरवर्ग १५१

अम्लवर्ग १५१

लवणवर्ग १५१

कटुवर्ग १५१

तिक्तवर्ग १५१

कषायवर्ग १५१

छः रसों के परस्पर संयोग से ६३ भेद १५१

त्रिचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः

वमनद्रव्यविकल्पविज्ञानीय नामक अध्याय की व्याख्या १५३

मैनफलकल्प १५३

जीमूतकल्प १५३

कुटजकल्प १५३

कृतवेधनकल्प १५५

इन्द्राकुल्प १५५

धामागविकल्प १५५

वमन औषधियों का योजना प्रकार १५५

चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः

विरेचन द्रव्यविकल्प विज्ञानीय अध्याय की व्याख्या १५५

विरेचन में प्रधान द्रव्य १५५

त्रिदूतकल्प १५५

पित्तजन्य तथा कफजन्य रोग १५५

वातकफजरोग १५५

विषय पृष्ठ

मोदक १५६

वैरेचनीयद्रव्य चूर्ण १५६

यूषविधि १५६

पुटपाक रूपत्रिदूतकल्प १५६

वैरेचन लेह १५६

वैरेचन मोदक १५६

वैरेचन लेह गुटिका प्रयोग १५७

वैरेचन चूर्ण १५७

वैरेचन आसव १५७

वैरेचन पैष्टी सुरा १५७

वैरेचन सौवीर (कांजी) १५७

वैरेचन तुषोदक १५७

वैरेचन त्रिदूतमूलविधि १५८

दन्ती द्रवन्ती कल्प १५८

दन्ती द्रवन्ती स्नेहयोग १५८

दन्त्यादिमोदक १५८

व्योषादिविरेचन १५८

तिलककल्प १५८

हरीतकीकल्प १५९

त्रिफलकल्प १५९

हरीतकी विधान १६०

चतुरङ्गुलकल्प १६०

ऐरण्डतैलकल्प १६०

स्तुहीक्षीरकल्प १६०

त्रिदूतमोदक १६१

औषधकल्पनाविधि १६१

पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः

द्रव्यविधि की व्याख्या १६१

आन्तरिक्ष जल के गुण १६१

पानी के गिरने से स्थान विशेष के कारण भिन्न भिन्न रस को प्राप्त करता है १६१

लोहित, कपिल आदि भूमि में मधुर अम्ल आदि रस युक्त जल होते हैं १६२

अन्तरिक्ष जल के अभाव में आकाश गुण बहुल १६२

अन्तरिक्ष जल के चार प्रकार १६२

भूमि के पानी के सात प्रकार १६२

हर-श्रुतु में कौन सा जल लेना चाहिये १६३

न बरतने योग्य जल १६४

विषयानुक्रमणिका

विषयपृष्ठविषयपृष्ठविषयपृष्ठ
ल प्रकार के दोष जो अन्तरिक्ष जल में नहीं१६४हथिनी का दूध१६८मधु के आठ भेद उनके गुणदोष
दूषित पानी को स्वच्छ करने के उपाय१६४प्रातःकाल का दूध१६८भिन्न प्रकार१७५
दूषित पानी को पीने से कौन रोग होते हैं१६४सायंकाल का दूध१६८इलुवर्ग के गुण दोष१७७
रात वस्तुयें जो मलिन जल को स्वच्छ करती हैं१६५कच्चा दूध१६८मध्य वर्ग के भिन्न प्रकार के गुण दोष१७८-१८२
पाँच वस्तुयें जिन पर पानी का बर्तन रखना चाहिये१६५स्त्री के दूध को छोड़ सब गरम पीने चाहिये१६९मूत्र के भिन्न प्रकार, गुण दोष१८२
पानी को ठण्डा करने के सात उपाय१६५धारोण दूध१६९षट्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
भूमि के पानी के गुण१६५त्यागने योग्य दूध१६९अन्नपानविधि की व्याख्या१८३
पृथक् पृथक् नदियों के जल के गुण-दोष१६५दही तीन प्रकार का है१६९शालिवर्ग के भिन्न प्रकार, गुण दोष१८४
जिन अवस्थाओं में शीतल पानी का देना उत्तम है१६६मधुर दही१६९कुधान्यवर्ग के भिन्न प्रकार
जिन अवस्थाओं में शीतल जल नहीं देना चाहिये१६६मन्दजात दही१६९गुण दोष१८५
नदी, सरोवर, तङ्गा, वापी, कुण्ड का खारा पानी, चौण्ड्य, झरने, औद्भिद, वैकिर, खेतों का पानी, छोटे गड्ढों का पानी१६६गाय, बकरी, भैंस, ऊँटनी, भेड़, घोड़ी, स्त्री, हथिनी के दूध केमांसवर्ग के भिन्न प्रकार, गुण दोष१८८
आनूप देश का पानी१६६दही के गुण दोष१६९फलवर्ग के भिन्न प्रकार, गुण दोष१९४
गरम पानी१६६गाय के दूध का दही सर्वश्रेष्ठ वस्त्र में से छाना दही१६९शाकवर्ग के भिन्न प्रकार, गुण दोष१९९
रात का वासी पानी१६६उबाल कर दूध से बनाई दही१७०पुष्पवर्ग के भिन्न प्रकार
नारियल का पानी१६६मलाई१७०गुण दोष२०४
किन अवस्थाओं में गरम करके ठण्डा किया हुआ जल देना चाहिये१६७मलाई के बिना दही१७०कन्दवर्ग के भिन्न प्रकार, गुण दोष२०५
किस अवस्था में पानी धीरे धीरे पीना चाहिये१६७दही किस ऋतु में नहीं खाना चाहिए१७०लवणवर्ग के भिन्न प्रकार
दूध आठ प्रकार का है१६७मस्तु के गुण१७०गुण दोष२०६
गाय का दूध१६७तक्रवर्ग१७०मशियों के गुण२०७
बकरी का दूध१६८तक्र किस अवस्था में नहीं खाना चाहिए१७०सब वर्गों में श्रेष्ठ२०७
ऊँटनी का दूध१६८तक्र के गुण दोष१७०कृत्ताक्षवर्ग के भिन्न प्रकार
भेड़ का दूध१६८तुरन्त निकाला मक्खन१७०गुण दोष२०८
भैंस का दूध१६८दूध से निकाला मक्खन१७१भक्ष्यवर्ग के भिन्न प्रकार, गुण दोष२१३
घोड़ी का दूध१६८दूध की मलाई१७१अनुपानवर्ग२१६
स्त्रियों का दूध१६८घी का सामान्य गुण१७१सम्पूर्ण आहारविधि२२०
गाय, बकरी, भैंस, ऊँटनी, भेड़, घोड़ी, स्त्री, हथिनी का घी१७२निदानस्थान
दूध से निकाला घी१७२प्रथमोऽध्यायः
पुरातन घी१७२वातव्याधिनिदान की व्याख्या२२३
दस साल का पुराना घी१७२वायु के विषय में प्रश्न२२३
एक सौ ग्यारह साल का घी१७२वायु के स्वरूप का वर्णन२२३
तेल१७२वायु का शरीर में विरेचन का क्रम२२४
भिन्न २ प्रकार के तेल के गुण दोष१७३

१०

सुश्रुतसंहिता

विषयपृष्ठ
प्राण, उदान, समान, ध्यान, अपान वायु२२४
नाना स्थानों में आश्रित वायु के प्रकोप से होनेवाले रोग२२५
अवयवों में पहुँचकर वायु असंख्य रोग होते हैं२२५
प्राण वायु के पित्त के साथ मिलने पर२२६
वातरक्त रोग का कारण२२६
सम्प्राप्ति२२६
पूर्वरूप, असाध्य, आक्षेप२२७
असाध्य अपतानक२२७
पक्षाघात, अपतन्त्रक, मन्यास्तम्भ आदि, असाध्य, गुह्रसी विरवाची, क्रोष्टुक शीर्ष, खञ्ज और पंगु, कलाय खञ्ज, वाथ कण्टक, पाददाह, पादद्वर्ष अवबाहुक, बाधियं, कर्णशूल, तूनी-प्रतूनी, आध्मान, प्रत्याध्मान, अछीला, प्रत्यछीला, २२७-२३३
द्वितीयोऽध्यायः
अर्श निदान की व्याख्या२३३
अर्श छ प्रकार का है२३४
सामान्य कारण, गुदा, पूर्वरूप, सामान्यरूप, वातजन्य अर्श, पित्तजन्य अर्श२३५
कफजन्य अर्श, रक्तजन्य अर्श२३५
सन्निपातजन्य अर्श, सहजन्य अर्श२३५
मेढादि में अर्श,२३६
अनिमाम्नाय का कारण२३७
तृतीयोऽध्यायः
अश्मरी निदान२३७
अश्मरी रोग के चार प्रकार२३७
सामान्यलक्षण२३८
रुलेष्माश्मरी पैत्तिक अश्मरी, वातजन्य अश्मरी, शुक्राश्मरी२३८
शर्करा, रोगी के लक्षण२३९
अश्मरी के मूत्रमार्ग में पहुँचने पर उपद्रव२३९
विषयपृष्ठ
बस्ति का मूत्र द्वारा सदा भरना२३९
अश्मरी की उत्पत्ति२३९
वायु के प्रतिलोम होने पर नाना रोग२४१
चतुर्थोऽध्यायः
भगन्दर निदान२४१
भगन्दर के पाँच प्रकार२४१
भगन्दर का पूर्वरूप२४१
शतपोनक भगन्दर२४१
उष्ट्रग्रीव भगन्दर२४१
परिखावि भगन्दर२४१
शम्बूकार्त भगन्दर२४२
उन्मार्गगामि भगन्दर२४२
सृजन के कारण गुदा के समीप पिङ्का२४२
असाध्यभगन्दर२४२
पञ्चमोऽध्यायः
असाध्य कुष्ठरोग निदान२४३
कुष्ठ के कारण२४३
कुष्ठ का पूर्वरूप२४३
सात महाकुष्ठ और ११ लुद्र
कुष्ठ के नाम२४३
महाकुष्ठ के लक्षण२४३
लुद्रकुष्ठों के लक्षण२४४
क्षुद्रकुष्ठों में कफ, वायु
पित्तजन्य२४४
किलास का वर्णन२४४
त्वचा में कुष्ठ के लक्षण२४५
कुष्ठ के रक्त में होने पर२४५
मेद में कुष्ठ के पहुँचने पर२४५
माता पिता में कुष्ठ दोष के कारण
संतान पर प्रभाव२४५
जितेन्द्रिय पुरुष का साध्य तथा
असाध्य कुष्ठ रोग२४६
कर्मजन्य कुष्ठ२४६
कुष्ठ से अधिक दुःखदाई कोई नहीं२४६
कुष्ठरोग से मुक्ति२४६
विषयपृष्ठ
एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में यह रोग आ जाता है२४६
षष्ठोऽध्यायः
त्रिदोषजन्य प्रमेह निदान२४६
प्रमेह के कारण२४६
प्रमेह के पूर्वरूप२४६
कफ के कारण दस प्रमेह२४६
पित्त के कारण छ प्रमेह२४६
वायु के कारण चार प्रमेह२४७
कफजन्य प्रमेह की व्याख्या२४८
पित्त " "२४८
वायु " "२४८
उपद्रव२४८
दशों पिङ्कायों की उत्पत्ति२४९
बीस प्रकार के प्रमेहों की उत्पत्ति२४९
सप्तमोऽध्यायः
उदररोग की व्याख्या२५०
उदर रोग के आठ प्रकार२५०
कारण२५१
सम्प्राप्ति२५१
पूर्वरूप२५१
वातोदर२५१
पित्तोदर२५१
कफोदर२५१
सन्निपातोदर२५१
प्लीहोदर२५२
बद्धगुदोदर२५२
परिखाण्युदर२५२
दकोदर२५२
सामान्य लक्षण२५३
साध्यासाध्य लक्षण२५३
अष्टमोऽध्यायः
मूद्गर्भ रोग निदान२५३
मूद्गर्भ के कारण२५३
मूद्गर्भ के चार प्रकार२५३
मूद्गर्भ की आठ गतियाँ२५३
असाध्य के लक्षण२५३
यह गर्भ भी असमय में गिरता है२५४

विषयानुक्रमणिकां

११

विषयपृष्ठ
गर्भस्त्राव और गर्भपात२५४
असाध्य मूढ़गर्भ तथा गर्भिणी के लक्षण२५४
शिशु के गर्भाशय में मरने के लक्षण२५४
माता के मरने पर जीवित गर्भ को निकालने के उपाय२५४
नवमोऽध्यायः ✓
विद्रधि निदान व्याख्या२५५
सम्प्राप्ति२५५
वातजन्यविद्रधि२५५
पित्तजन्यविद्रधि२५५
कफजन्यविद्रधि२५५
सन्निपातजन्यविद्रधि२५५
आगंतुजविद्रधि२५६
रक्तजन्यविद्रधि२५६
अभ्यन्तरविद्रधि२५६
स्थान२५७
स्थानमेद से विशेष लक्षण२५७
रक्तविद्रधि२५७
गुल्म और विद्रधि रोगमें मेद२५७
विद्रधि के अस्थि में पहुँच कर पक जाने के लक्षण२५७
दशमोऽध्यायः
विसर्प नाड़ी स्तन रोग की व्याख्या२५८
विसर्प के लक्षण२५८
वातादि दोष मेदों से लक्षण२५८
पित्तजन्य विसर्प२५८
कफजन्य विसर्प२५८
सन्निपातजन्य विसर्प२५८
क्षतजन्य विसर्प२५८
साध्यासाध्य२५८
नाडी२५९
आठ प्रकार के नाडी ब्रण२५९
स्तन्यनिदान२५९
जिनमें स्तन रोग नहीं होते२५९
स्तन्य२५९
प्रवृत्ति के कारण२६०
विषयपृष्ठ
स्तन्य वायु से दूषित होने पर सम्प्राप्ति२६०
वातादिजन्य पांचों स्तन रोगों के लक्षण२६१
एकादशोऽध्यायः ✓
ग्रन्थि, अबुर्द, गलगण्ड अपची निदान की व्याख्या२६१
ग्रन्थि के लक्षण ✓२६१
वात, पित्तजन्य ग्रन्थि२६१
मेदोग्रन्थि२६१
शिराजन्य ग्रन्थि२६१
अपचीरोग की सम्प्राप्ति२६२
अबुर्द ✓२६२
अबुर्द के लक्षण२६२
मांसजन्य अबुर्द२६२
द्विरबुर्द अधबुर्द असाध्य२६२
न पकने के कारण२६३
गलगण्ड सम्प्राप्ति२६३
वात, कफ, मेदजन्य गलगण्ड२६३
असाध्यता२६४
गलगण्ड का स्वरूप२६४
द्रादशोऽध्यायः
वृद्धि, उपदंश तथा श्लीपद निदान२६४
वृद्धिरोग के सात प्रकार ✓२६४
पूर्वरूप ✓२६५
लक्षण ✓२६५
उपदंश के लक्षण२६६
उपदंश के पाँच प्रकार२६६
श्लीपद के लक्षण२६६
त्रयोदशोऽध्यायः
क्षुद्ररोगों के निदान की व्याख्या संक्षेप में ४४ क्षुद्र रोगों के नाम तथा पृथक् पृथक् लक्षण२६७
चतुर्दशोऽध्यायः
शूकदोष निदानव्याख्या२७१
१८ प्रकार के शूक दोषजन्य रोग तथा उनके पृथक् पृथक् लक्षण२७२ २७३
विषयपृष्ठ
पञ्चदशोऽध्यायः ✓
भग्गनिदान व्याख्या२७४
भग्ग रोग के कारण२७४
सन्धिपुक्त भग्ग के ६ प्रकार२७४
लक्षण२७४
विशेष लक्षण२७४
सामान्य लक्षण२७४
पांच प्रकार की अस्थियां२७५
षोडशोऽध्यायः
मुख रोग निदानव्याख्या२७५
६५ प्रकार के मुखरोग सात स्थानों में उत्पन्न होते हैं२७५
ओष्ठ रोग२७५
वायु, पित्त, कफ, सन्निपात, रक्त, मांस, मेद, अभिघात के कारण ओष्ठरोग२७५
दन्तमूल में स्थित १५ रोग तथा उनके लक्षण२७५
जिह्वागत रोग२७६
वायु, पित्त, कफ, अलास, उपजिह्वाका के कारण जिह्वागत रोग२७६
तालुजन्य नौ रोग और उनके लक्षण२७६
कण्ठगत सत्रह रोग और उनके लक्षण२७६
सर्वसररोग के ४ प्रकार तथा उनके लक्षण२८०
शारीरस्थान
प्रथमोऽध्यायः
सर्वभूतचित्तानामक शरीर की व्याख्या२८१
अव्यक्त निरूपण२८२
२४ तत्त्वों की व्याख्या२८३
ज्ञान तथा कर्मेन्द्रियों के विषय२८५
आठ प्रकृतियाँ तथा १६ विकार२८५
चौबीस तत्त्वों का वर्ग अचेतन२८६
प्रकृति तथा पुरुष के साधर्म्य तथा वैधर्म्य की व्याख्या२८६

१२

सुश्रुतसंहिता

विषय पृष्ठ

पुरुष भी सत्व, रज, तमोमय कई आचार्य का मत है २८६

मनुष्य इंद्रियों द्वारा निश्चित इंद्रिय के अर्थ का ही ग्रहण करता है २८६

शरीर, आत्मा तथा मन के संयोग से जो गुण उत्पन्न होते हैं उनका वर्णन २८७

मन के सात्विक आदि गुण द्वितीयोऽध्यायः

शुक्र और शोणित का स्वरूप २८७

दूषितशुक्र २८७

क्षीणवीर्य के लक्षण २८७

साध्य तथा असाध्य २८८

दूषित आर्तव २८८

चिकित्सा २८८

शुद्ध शुक्र की परीक्षा २८९

आर्तवशुद्धि की चिकित्सा २८९

शुद्ध आर्तव की परीक्षा २९०

रक्तप्रदर २९०

संतान के उपयुक्त स्त्री पुरुष २९१

ऋतुकाल के समय स्त्री का कर्तव्य २९१

सहवास के पहले पुरुष तथा स्त्री का कर्तव्य २९२

उत्तम तथा निन्दित तिथियां २९२

ऋतुमती स्त्री के साथ सहवास के दोष २९३

गर्भस्थित होने पर वैद्य का कर्तव्य २९४

वर्णों की उत्पत्ति का कारण २९५

नपुंसक के लक्षण २९६

पापजन्मगर्भ आदि का वर्णन २९६

तृतीयोऽध्यायः

गर्भावकान्ति नामक अध्याय की व्याख्या २९७

शुक्र-आर्तव स्वरूप २९७

गर्भावतरणप्रक्रिया २९७

तृतीयोऽध्यायः

गर्भावकान्ति अध्याय की व्याख्या २९७

विषय पृष्ठ

शुक्र और आर्तव का सौम्याग्नेय स्वरूप २९७

मैथुन तथा शुक्रार्तव संयोग २९७

आत्मा के पर्याय तथा शुक्रार्तव के संयोग के समयप्रवेश २९७

गर्भ में पुरुष, स्त्री, नपुंसक होने के कारण २९८

ऋतुमती के लक्षण २९८

ऋतुकाल के पश्चात् योनीकी स्थिति २९८

आर्तव स्वरूप और उसके खवण की युक्ति २९८

आर्तव का प्रारम्भ और अन्त, समविषम दिन और सभागम का फल २९८

गर्भधारण करते ही स्त्री लक्षण २९८

गर्भिणी के लक्षण २९८

गर्भिणी को त्यागने योग्य प्रथम मास से लेकर चतुर्थ मास तक गर्भ का स्वरूप २९९

गर्भवती स्त्री की इच्छा पूर्ण करने का फल ३००

गर्भवती की इच्छा पूर्ति न करने से दोष ३००

गर्भवती की जो इच्छा होती रहती है उखी स्वभाववाली संतान उत्पन्न होती है ३००

पांचवें छठे, सातवें, आठवें महीनों के गर्भ का स्वरूप ३०१

आठवें महीने में बालक उत्पन्न होने से जीता नहीं ३०२

प्रसवकाल की मर्यादा ३०२

गर्भ पोषणक्रम ३०२

गर्भवृद्धि में अंगोत्पत्ति के मतमतान्तर और धन्वन्तरि का मत ३०२

मातापितादि से उत्पन्न होने वाले शरीर का लक्षण ३०२

गर्भ के स्त्री पुनपुंसक शरीर लक्षण ३०३

अंग प्रत्यंग के निर्माणमें गुण-अवगुण धर्म, अधर्म के कारण ३०३

विषय पृष्ठ

चतुर्थोऽध्यायः

गर्भव्याकरण नामक अध्याय शरीर के ११ प्राण सात त्वचाओं का निरूपण सात कलायें तथा लक्षण पुरुष में शुक्र प्रबुत्त होने का मार्ग ३०६

गर्भिणी में अनार्तव का हेतु ३०७

गर्भ के यकृतादि अंगों की उत्पत्ति की कल्पना ३०७

हृदय का स्वरूप ३०७

निद्रा का स्वरूप और प्रकार स्वप्नदर्शन का कारण ३०९

इन्द्रियों की विकलता के कारण आत्मा का सोया हुआ मालूम होना ३०९

दिन में सोने का योग्य काल और किन के लिये दिन में सोना ठीक है, उसके दोष रात्रि जागरणदोष ३१०

उचित प्रमाण की नींद से १०० वर्ष जीता है ३११

नींद न आने के कारण तथा चिकित्सा ३११

निद्रा के अतियोग में तन्त्रा, जम्भाई, कलम, आलस्य ग्लानि, गारव ३१२

गर्भ का शरीर कैसे बढ़ता है दृष्टि और रोमकूप कभी नहीं बढ़ते ३१२

नख और केश सदा बढ़ते हैं ३१३

सात प्रकार की प्रकृतियाँ प्रकृति की उत्पत्ति का हेतु ३१३

वात प्रकृति लक्षण ३१३

पित्तप्रकृति लक्षण ३१३

कफ प्रकृति लक्षण ३१४

पार्थिव तथा आकाश प्रकृति ३१४

सत्त्वादि गुणभेद से प्रकृति ३१४

राजस प्रकृति ३१५

तामस प्रकृति ३१५

विषणानुक्रमणिका

१३

विषयपृष्ठविषयपृष्ठविषयपृष्ठ
पञ्चमोऽध्यायःममों की लम्बाई चौड़ाई३३०दोषयुक्त शेषरक्त की चिकित्सा ✓
शरीर संख्या व्याकरणमर्म स्थान को बचाकरसंशमन से३४०
व्याख्या३१६शस्त्रकर्म३३०बलवान् व्यक्ति के रक्त निकालने
शरीर नाम कितने कहते हैं३१६अमर्म आदि स्थानों के छेदन-भेदनका परिमाण३४०
शरीर के अंग प्रत्यंग३१६से मृत्यु नहीं होती३३२भिन्न २ रोगों में सिरावेष का ✓
आशय, आंत, खोल३१६सद्यः प्राणहर ममों पर आघातपरिमाण३४१
कण्डरार्य, जालकों, कूर्च३१८लगने से इन्द्रिय विषयदूषितरू में वेधन हुई सिराएँ३४१
बड़ीमांस रज्जु, सेवनी, अस्थिकायोंज्ञान नहीं३३२दूषित सिराओं का विवरण३४१
के संघात सीमान्त३१८ममों पर आघात पहुँचने से प्रायःसिराओं का वेधन यत्न पूर्वक३४१
अस्थियों की संख्या३१६विकलता (मृत्यु) अवश्यसिरावेष रोग जल्दी शान्त
सन्धियों के दो प्रकार३२०होती है३३३होते हैं३४१
सन्धियों की संख्या३२०सप्तमोऽध्यायःशल्यतंत्र में आधी चिकित्सा
स्नायु३२१सिरा वर्ण विभक्ति शरीर३३३सिरावेष है३४१
पेशियाँ तथा उनका आकार३२२सात सौ शिराएँ स्वरूप३३३सिरावेष आदि के लिये त्याज्य
प्रत्यक्ष तथा शस्त्र दोनों ही ज्ञाननाभि, प्राण और सिराओंबातें३४२
बुद्धि के कारण हैं३२३का सम्बन्ध३३३दूषित रक्त को निकालने का ✓
आत्मा को कैसे देखा जाता है३२४मूल सिरा और दोषवह सिराओंतरीका३४२
षष्ठोऽध्यायः ✓की संख्या३३४नवमोऽध्यायः
मर्म निर्देश शरीर कावातवह सिराओं का प्राकृतधमनी व्याकरण शरीर की
व्याख्यान३२४कार्य३३४व्याख्या३४३
मर्म के १०७ प्रकार ✓३२४वातपित्तकफ सिराओं का रंग३३५धमनी की २४ संख्या३४३
टांग पेट और छाती, पीठ, बाहु,अवेध्य सिराएँ३३५ऊपर को जानेवाली धमनियाँ३४३
जनु से ऊपर के ममे३२४अष्टमोऽध्यायःनीचे की ओर जानेवाली
मांसमर्म, सिरामर्म, स्नायुमर्म, ✓सिराव्येष विधि शरीर की ✓धमनियाँ३४५
अस्थिमर्म, सन्धिमर्म३२४व्याख्या३३७तिर्यगगत धमनियाँ३४७
मर्म के पाँच भेद ✓३२५किन अवस्थाओं में सिरावेष ✓खोलों के मूल में बुद्ध होने से
प्राणहर मर्म ✓३२५न करे३३८उत्पन्न लक्षण३४८
मर्म का लक्षण ✓३२५निषिद्ध रोगियों में सिरावेषदशमोऽध्यायः
शरीर का पालन करनेवालीके प्रयोजन३३८गर्भिणी व्याकरण शरीर का
चार प्रकार की सिराएँ३२६सिरावेष विधि ✓३३८व्याख्यान३४६
ममों की परीक्षा कर शल्य ✓सिरावेष का अयोग्य काल ✓३३८गर्भिणी के प्रथम दिन से
निकालना चाहिये३२७सिरावेष के लिये यन्त्रविधि३३८कर्तव्य३४६
प्राणहर ममों के मारने की ✓प्रदेश विशेष से शस्त्र कागर्भिणी को मासक्रम से सेवने
कालविधि३२७प्रमाण३३६योग्य३४६
टांग के ममों का व्याख्यान३२८सिरावेष ऋतुभेद से कालभेद ✓३४०नवम मास में सूतिका ग्रह
उदर और छाती के ममों कामुनिद्ध सिरा लक्षण३४०प्रवेश३५०
व्याख्यान३२६सिरावेष से पहले दूषितप्रसव के स्पष्ट लक्षण३५०
पृष्ठ के ममों का व्याख्यान३२६रक्त का निकालना३४०प्रसव को जानकर करने
जनु के ऊपर के ममों काक्षीण व्यक्ति के सिरावेष कायोग्य उपचार३५०
व्याख्यान३३०समय३४०प्रतिलोम को अनुलोम करना३५१

१४

सुश्रुतसंहिता

विषयपृष्ठ
गर्भ के योनि में रुकने पर
धूपन३५२
प्रसव होर पर शिशु के उपचार३५२
प्रसव के ३-४ दिन बाद दूध का आना३५२
पहले ३-४ दिन में बच्चे को क्या पिलाना३५३
स्तिका के उपचार३५३
प्रसूता के मिथ्या आचार आदि से उत्पन्न रोग३५४
अपरा के बाहर न आने से दोष और चिकित्सा३५५
प्रसूता में मल्ल लक्षण तथा उनकी चिकित्सा३५६
बालक के उपचार३५६
दसवें दिन बालक का नाम-कारण३५६
धात्री के लक्षण३५६
बच्चे को कैसा दूध नहीं देना चाहिये३५६
दूध को बढ़ाने के उपाय३५६
दूध की परीक्षा३५६
धात्री के दूषित स्तन का हेतु३५७
अनजान बच्चे के रोग को जानने का उपाय३५७
उन रोगों की चिकित्सा३५८
बालक को नीरोग तथा उसमें बल आदि के उपाय३५८
बालक को कैसे उठाना-बिठाना चाहिये३६०
माता का दूध पर्याप्त मात्रा के अभाव में देने योग्य दूध३६०
बालक की ग्रहों से रक्षा३६०
ग्रहों से आक्रान्त शिशु के सामान्य लक्षण३६१
बालक का विद्याध्ययन३६१
छोटी आयु की कन्या में गर्भाधान नहीं करना चाहिये३६२
गर्भाधान के अयोग्य ली पुरुष३६२
विषयपृष्ठ
गर्भिणी के उपद्रवों की चिकित्सा३६२
प्रत्येक मान में देनेवाली औषधियाँ३६३
शारीर अध्याय के कोष्ठक३६५-३७८
चिकित्सास्थान
प्रथमोऽध्यायः
द्विभ्रणीय चिकित्सा का व्याख्यान३७६
ग्रहों के दो प्रकार३७६
आगन्तुज ब्रण में कर्म ही
विशेष प्रयोजन३८०
दोष के उपप्लवभेद से ब्रणभेद३८०
ब्रण के २ प्रकार के लक्षण३८०
वातजन्य ब्रण३८०
ब्रण के साठ उपक्रम३८१
ब्रण के अवस्थाभेद से करने योग्य उपचार३८१
अपतर्पण का निरूपण३८२
किनको उपवास लंघन न कराना चाहिये३८२
आलेपन विषय३८२
आलेपन का फल३८२
परिषेक का फल तथा प्रयोग३८२
अभ्यंग का फल३८२
स्वेदन३८३
विस्लापन तथा प्रयोग३८३
उपनाह३८३
पाचन तथा प्रयोग३८३
स्लावण३८३
स्नेहपान, वमन, विरेचन३८३
छेदन, भेदन, दारण, लेखन, ऐषण३८४
शल्यकर्म, व्यधन-स्लावण३८४
सीना और सन्धान३८४
पीडन, रक्त-स्थापन, निर्वापण३८४
उत्कारिका शोधन कषाय, शोधन वर्ति३८५
विषयपृष्ठ
घृत सिद्ध करने के शोधन३८५
तैल से शोधन३८५
जो ब्रण तैल से शुद्ध न हों उनमें रसक्रिया बरतें३८५
शोधनीय चूर्ण प्रयोग३८६
रोपण-कषाय, रोपण-वर्ति३८६
रोपण-कल्ल रोपण-सर्पि, रोपण तैल, रोपण रसक्रिया, रोपण-चूर्ण३८६
शोधन रोपण विधि मंत्र की भाँति गुणों को दोषों के अनुसार मिलाकर बरते३८६
धूपन प्रयोग३८७
उत्सादन, अवसादन३८७
कोमल उपचार दारण कर्म३८७
क्षार क्रिया३८८
अनिकर्म, कृष्णकर्म, पाण्डुकर्म३८८
ग्रहों पर प्रतिसारण३८८
पुनः बाल उगने के उपाय३८९
बालनाशक उपाय३८९
वस्ति योग्य ब्रण३८९
उत्तर वस्ति योग्य ब्रण३८९
ब्रण-पर पट्टी बाँधने का कारण३८९
पत्र का उपयोग३८९
ब्रण से क्रमियों को निकालना३९०
शिरोविरेचन विषय नस्य विषय३९०
शोधन तथा रोपण के लिये शीतल कवल३९०
धूमपान विषय३९०
घृत विषय३९०
यंत्र विषय३९१
ब्रणरोगियों को उष्ण और अग्निदीपक आहार३९१
ब्रणरोगी की राक्षसों से रक्षा३९१
ब्रण की संक्षेप से मूलाधिष्ठान लक्षण चिकित्सा३९१
अप्राप्त औषध में उपपत्ति के अनुसार चिकित्सा३९१
ब्रणरोगी के उपद्रव बहुत प्रकार के हैं३९१

विषयानुक्रमणिका

१५

विषयपृष्ठ
द्वितीयोऽध्यायः ✓
सद्योन्न चिकित्सा व्याख्यान३६२
भिन्न भिन्न प्रकार के ब्रणों के लक्षण३६२
आगन्तु ब्रण के छ प्रकार ✓३६२
छिन्न, भिन्न, कोष्ठ, कोष्ठ भेद के सामान्य लक्षण३६२
विशेष लक्षण३६२
विद्ध, क्षत, पिच्छित, घृष्ट लक्षण३६२
छिन्न भिन्न आदि चारों की चिकित्सा३६३
पिच्छित तथा घृष्ट की चिकित्सा३६३
छिन्न ब्रणों की चिकित्सा३६३
कान की विशेष चिकित्सा३६३
तिरस्त्र प्रहारों के कारण चौड़ा ब्रण होने की चिकित्सा३६४
पीठ में ब्रण की चिकित्सा३६४
कटी हुई शाखा में रोपण क्रिया३६४
ब्रण रोपण के लिये चन्दनादि तैल३६५
दूसरा चन्दनादि तैल३६५
नेत्र में भिन्न ब्रण की चिकित्सा३६५
सब नेत्राभिधातों में बकरी के घी का प्रयोग३६५
पेट में से भेद की वर्त्ति निकलने की चिकित्सा३६५
कोष्ठगत शल्य लक्षण३६६
कोष्ठगत असाध्य ब्रण३६६
कोष्ठ के फट जाने पर रक्त को पीना३६६
कोष्ठ के फट जाने पर भी जो जीता है३६६
अन्तभेद चिकित्सा३६६
रोपण के लिये तैल३६६
जिस पुरुष के अण्ड बाहर आ गये हों उसकी चिकित्सा३६७
घिर के ब्रण की चिकित्सा३६७
विषयपृष्ठ
शरीर के अन्य भाग के ब्रण की चिकित्सा३६७
तैल का प्रयोग३६७
तालीशादि तैल३६७
क्षत तथा पिच्छित ब्रण चिकित्सा३६७
घृष्ट ब्रण की चिकित्सा३६७
मर्म स्थानों पर चोट लगने से चिकित्सा३६७
रोगी को खदा मृदु, शरीर को देखकर घी या तैल देना चाहिये३६७
सद्यःक्षत ब्रणवाले को तेल से परिषेक करे३६७
दूषित सद्यःक्षत ब्रणों में तैल३६७
दूषित ब्रणों में वमन विरेचन३६८
द्रवन्ती आदि तैल३६८
कल्क३६८
छः ही सबसे श्रेष्ठ हैं३६८
चतुर्थोऽध्यायः
भग्गचिकित्सा का व्याख्यान३६९
भग्ग रोग किनमें कठिनाई से अच्छा होता है३६९
भग्ग रोगी को न सेवन करने योग्य३६९
भग्ग रोगी को देने योग्य लेप३६९
मृदुओं को देखकर पट्टी बाँधनी३६९
भग्ग में साधारण बन्ध ठीक है३६९
परिषेचन में कषाय३६९
दोष और काल की विवेचनाकर३६९
भग्ग में पीने योग्य दूध४००
ब्रण वाले भग्गों में घी और मधु४००
मुखसाध्य भग्ग४००
सन्धि को हट जाने का समय४००
शरीर की सब प्रकार की सन्धियों को ठीक बिठाना चाहिये४००
नखसन्धि, भग्ग की चिकित्सा४००
अकुली, " "४००
पैर के तल्लुए, " "४००
जंघा और ऊरू, " "४००
विषयपृष्ठ
ऊर्वस्थि, भग्ग की चिकित्सा४००
कटि, के " "४००
पशु काओं, " "४००
अंससन्धि " "४०१
कूर्परसन्धि " "४०१
जानु-गुल्फ, " "४०१
हथेली, " "४०१
अक्षक अस्थि के भग्ग की चिकित्सा४०१
बाहुभग्ग ग्रीवा, हनुसन्धि ग्रीवा, दांत, नासा, कर्ण, शिर जंघा और ऊरू श्रोणी, घृष्ट अंस, वक्षस्थल, अक्षक के भग्ग होने पर४०२
स्नेहन तथा स्वेदन४०२
शिरोबस्ति तथा अनुवासन बस्ति भग्ग के लिये स्वस्थ करने-वाला तैल४०२
भग्ग पकना नहीं चाहिये४०२
चतुर्थोऽध्यायः
वातव्याधि चिकित्सा का व्याख्यान४०३
षड धरण४०३
वायु के पक्षाशय में होने पर४०३
वायु प्रकोप में स्नेहन, स्वेदन रक्तमोक्षण आदि४०३
वायु के स्नायु-सन्धि और अस्थि में आने पर४०३
अस्थि में वायु के भरजाने पर४०३
वायु के शुक में आने पर४०४
सर्वांगगत वायु में कफ, पित्त से मिली वायुको रक्त से आबूत वायु में४०४
वात रोगियों को देने योग्य४०४
सार्वण४०४
जो अङ्ग संकुचित या जड़ बन गये हों४०४
स्कन्ध, वक्ष, त्रिक और मन्धा-गत वायु४०४
वात रोगियों के सेवनीय४०४
तिल्व घृत४०४

१६

सुश्रुतसंहिता

विषयपृष्ठविषयपृष्ठविषयपृष्ठ
अणुतैल४०५वातकफजन्य अशों की चिकित्साअष्टमोऽध्यायः ✓
शतपाक तैल४०५अग्नि और क्षार से४१४भगन्दरों की चिकित्सा का
स्नेहलवण४०६पित्तरक्तजन्य अशों की मृदुव्याख्यान४२१
कल्याण लवण४०६क्षार से४१४पांच प्रकार के भगन्दर४२१
पंचमोऽध्यायःअशों को जलाने की विधि४१४अपक्ष पिडिका वाली भगन्दरकी
महावातव्याधि चिकित्सा काअर्श रोगी को खाने के लिये४१४११ उपक्रमों से चिकित्सा४२२
व्याख्यान४०६अशों को जलाने के बादविशेष चिकित्सा४२२
वातरक्त के दो भेद४०६स्नेहकर्म४१४शतपोनक में व्रण को कभी चौड़ा
वातरक्त के कारण तथाक्षारकर्म, अग्निकर्म आदि बहुतन करे४२२
पूर्वरूप४०६सावधानी से करना चाहिये४१४डरपोक में शतपोनक कष्ट साध्य है४२२
वातरक्त किनको होता है४०६अर्शयंत्र का प्रमाण४१५स्वेद विधि४२२
वात प्रबल वातरक्त में लेप४०६अशों के लिये लेप४१५उध्मृीव चिकित्सा४२३
पित्त प्रबल वातरक्त में लेप४०६न दीखनेवाले अशों के लिये४१५परिखाविक भगन्दर चिकित्सा४२३
कफ प्रबल वातरक्त में लेप४०८दशमूलादि काथ४१५बच्चे में भगन्दर के लिये४२३
सब प्रकार के वातरक्त में४०८पिप्पल्यादि काथ४१६गतिव्रणों को नष्ट करने के
वातरक्त की तीव्र वेदना केभल्लातकविधि४१६लिये वर्ति४२३
लिये काथ४०८द्वितीय विधि४१७आगन्तुज भगन्दर४२४
वातरक्त में संवाहन४०८दोष की प्रधानता को देखकरवेदना नाश के उपाय४२४
अपतन्त्रक रोगी की चिकित्सा४०८घृत अवलेह आदि देने चाहिये४१७भगन्दर के शोधन कार्य में
पक्षाघात रोगीकी चिकित्सा४०९सप्तमोऽध्यायः ✓उत्तम द्रव्य४२४
मन्यास्तम्भ में चिकित्सा४१०अश्मरी चिकित्सा का व्याख्यान४१८व्रण के शोधन में हितकारी४२४
अपतर्पण रोगी की वातकफअश्मरी रोग के पूर्वरूपों मेंभगन्दर शामक तैल४२४
नाशक चिकित्सा करे४१०स्नेहन आदि४१८अन्य कई प्रकारके तैल४२५
अर्दित रोगीकी वातव्याधिवातजन्य अश्मरी को नष्ट करनेनवमोऽध्यायः
चिकित्सा के अनुसारवाला घृत४१८कुष्ठ चिकित्साव्याख्यान४२५
चिकित्सा४१०कुश आदि के कल्क से सिद्धस्वर्ग रोग के कारण४२५
किन में सिरावेध न करे४११किया घृत४१८स्वर्ग रोगवाला व्यक्ति४२५
कर्णशूल में४११वरुणादिगण के कल्क से सिद्धपथ्य४२५
तूनी, प्रतूनी में४११किया बकरी का घृत४१८पूर्वरूप में वमन, विरेचन४२५
आध्यान में४११शर्करा नाशक कई चूर्ण४१८असाध्य कुष्ठ४२६
अछीला और प्रत्यछीला में४१२अश्मरी, गुल्म, शर्करा को नष्टसर्व प्रथम वमन आदि संशोधन
हिंवादिचूर्ण४१२करने वाला क्षार४१८देकर स्नेहपान विधि से
ऊरुस्तम्भ चिकित्सा४१२शर्करा नाशक क्षार४१९चिकित्सा४२६
गुग्गुल आदि४१२अश्मरी में शस्त्रकर्म४१९महातिकक घृत४२६
षष्ठोऽध्यायः ✓किसकी पथरी नहीं निकलनीतिकक घृत४२६
अशों की चिकित्सा काचाहिये४२०सात-सिद्ध लेप४२६
व्याख्यान४१३मृत्तमार्ग का शोधन४२०ददु और शिवत्रों के लिये
चार प्रकारकी अशों कीशस्त्रकर्म के समय आठ अशोंविशेष योग४२७
चिकित्सा४१३को बचाये४२१छाले उत्पन्न करना४२७
अशों पर क्षार प्रयोग४१३छाछों के फूटने पर लेप४२७

विषयानुक्रमणिका

१७

विषयपृष्ठ
क्षेत्र नष्ट करने के कई उपाय४२८
किलास नाश का उपाय४२८
नीलघृत४२८
महानील घृत४२८
कुष्ठरोगी के लिये वसन
विरेचन अवश्य४२९
कुष्ठरोग के लिये सिद्ध किया
पुरातन घृत कुष्ठ नाशक४२९
स्नान में क्वाथ४३०
नीम का क्वाथ४३०
कुष्ठ में क्रमि नाश के लिये४३०
वज्रक तैल४३०
महावज्रक तैल४३०
लाक्षादि तैल४३१
दोषों के शांत होने पर स्नान
क्वाथ तथा पीने के लिये४३१
दोष का प्रकोप न हो ऐसे
उपाय४३१
सम्पूर्ण रूप में वरता खैर कुष्ठ को
शक्ति भर नष्ट कर देता है४३१
दशमोऽध्यायः
महाकुष्ठ चिकित्सा व्याख्यान४३१
मन्थकल्प४३२
अरिष्टों का वर्णन४३२
आसवों का वर्णन४३२
सुरा का वर्णन४३२
लेहों का वर्णन४३२
चूर्ण किया४३३
अयस्कृतिका वर्णन४३३
खदिर विधान४३४
गिलोय का क्वाथ४३४
काले तिलादि का योग४३५
एकादशोऽध्यायः
प्रमेह चिकित्सा की व्याख्या४३५
दो प्रकार का प्रमेह४३५
रुध के लिये संस्कृत किया४३५
रक्त पुरुष के लिये अपतर्पणवाली
किया४३५
सब प्रकार के प्रमेही को
विषयपृष्ठ
त्यागने योग्य४३६
सब प्रकार के प्रमेही को खाने योग्य४३६
स्निग्ध प्रमेह रोगी के लिये४३६
पांच योग सब प्रमेहों के लिये४३६
विशेषरूप से वर्णन४३६
बड़े ऐश्वर्य वाले के लिये४३७
गरीब के लिये४३८
द्वादशोऽध्यायः
प्रमेह पिडका चिकित्सा व्याख्यान४३८
साध्य पिडकायें४३९
प्रमेह रोगी की प्रारम्भ में ही चिकित्सा४३९
धान्वन्तर घृत४३९
तीक्ष्ण विरेचन४४०
स्वेद कभी भी न देना चाहिये४४०
प्रमेहियों में दोष ऊपर को नहीं जाते४४०
अपक्व तथा पक्व पिडकाओं की चिकित्सा४४०
लेह सब प्रमेहों के नाश के लिये४४०
नवायस४४०
लोहारिष्ट४४०
त्रयोदशोऽध्यायः
मधुमेह चिकित्साका व्याख्यान४४१
शिलाजतु रंगादि छ में से किसी के मिला रहता है
जो शिलाजतु लौह से उत्पन्न होता है
रंगादि छ में से शिलाजतु उत्तरोत्तर श्रेष्ठ होता है
सब प्रकार के शिलाजतु४४१
शिलाजतु सब रोगों को नष्ट करता है४४१
शिलाजतु और माक्षिक सेवन करनेवाला कपोत और कुलत्थ को छोड़ दे४४१
तुवरक फल का तैल४४१
विषयपृष्ठ
चतुर्दशोऽध्यायः
उदररोग की चिकित्सा का व्याख्यान४४२
बद्धगुदोदर और परिखावी असार्ध शेष कष्ट साध्य४४२
उदररोगी को खाने योग्य४४३
वातोदररोगी के लिये विदारीगन्धादि४४४
पित्तोदररोगी को काकोल्थादि४४४
कफोदररोगी को पिप्पल्यादि४४४
दृष्योदररोगी के लिये घृत४४५
इसमें सामान्ययोग४४५
कोष्ठ के क्रमियों को नाश करने के लिये४४५
आनाहवर्ति किया४४६
प्लीहोदररोगी के लिये४४६
घट्टपलक घृत४४६
प्लीहा की शांति के लिये४४६
बद्धगुद उदर तथा परिखावि उदर के लिये४४६
पञ्चदशोऽध्यायः
दकोदर रोगी के लिये४४७
मृदुगर्भ चिकित्साव्याख्यान४४७
मृदुगर्भ को निकालना महाकठिन४४८
मृदु गति आठ प्रकार की होती है
गर्भ के जीवित रहने पर
अपरा पातन की औषधियों का प्रयोग४४९
अन्य उपाय
पिप्पली आदि का प्रयोग४५०
बला तैल
तिलों को बला क्वाथ से भावित कर तैल निकालना४५०
शतपाकी तैल
बला तैल के समान तैल४५१
षोडशोऽध्यायः
विद्रधि की चिकित्सा का व्याख्यान४५१

१६

विषय

पच साध्य बिद्रधियां

वातजन्यविद्रषि

पित्तजविद्रधि

करंजादिघत

कफजन्यविद्रषि में

रक्तजन्य ओर आगन्व॒ज

विद्रधिर्या

कृफजन्य अन्तः विद्रधि

पक्र विद्रधि की चिकिस्छा

मज्जाजन्यविद्रषि सप्रदओोऽध्यायः विसरष-नाडी-स्तन रोग

चिकित्सा ६ साध्य तथा असाध्य विप

वातजन्यविसप

पित्तजन्यविसपं मे केप

गोयांदिघत

कृफजन्य विखप के लिये अजगन्धा

आदि्छेप

वरुणादिगण का प्रयोग

वरेण को शोघन करनेवाला

तेल ` पित्तजन्य नादी =

कोष्टस्थित नाडी को नष्ट

करने का घत

कफजन्य नाडी में

हाल्यजन्य नाडी में

कृश दुं पुरष की नाडी

सब वर्तयां नाड्यां में

बरतनी चाहिये

दुध क विक्त होने पर

उसका शोघन

स्तन विद्रधि

ग्रन्थि, अपची अदु द्‌, गक्ग्ण्ड ।

। चिकित्षा का व्याख्यान

४५

2

सुश्रतसं हितां

पुष | विषय

४५१ | पित्तजन्य म्रन्थि मे

४५१ | कफजन्य ग्रन्थि मं

५१ | जो ग्रन्थि उपरोक्त चिकित्षा

से शातन दहो उसे चीरकर

निकाल दं

मांस कन्दी के लि

मे दोजन्यग्रन्थि में

जीमूतक आदि से सिद्ध घुत

ममंस्थान से रहित स्थानों मे

अपक्त म्रथिरयों के विषय में

इन्द्रवस्तिमम

अपंचियों क निड्त्ति के यि

रोपण काल में

कर्कार चूर्णं आदि पित्ताबुदमें कफाबुद में

अन्द्‌ पर ल्ेपादि ` मेदो द स्वेदन आदिः

बातजन्य गण्ड मे स्वेद

कफजन्य गण्ड मं स्वेद आदि

४५४

४५४

४५४

४५४

४५४

$प्र ४

क न च ४५४

मेदोजन्य गलगण्ड में ४११ स्नेहन आदि

४१५

४५५

५२ का व्याख्यान `

बृद्धिरोग

वातब्रद्धि मे -

पित्तजन्य इद्धि में

फफजन्य बृद्धि भ

मेदजन्य ब्द्धि्मे ..

. | मूत्रजन्यव्रद्धिमे

-साध्यउपदंशोर्मे

वातजन्य उपदंश में

वैत्तिकं उपदंश मे

५५६

४५७ ४१७

| प्रकारे उपद्श् के ल्थि चूण

गर्रण्डरोग मे चिकट आदि `

एकोनविज्ञोऽध्यायः

चरद्धिः उपदंश, श्टीपद, चिकित्सा

अत्रबदिको छोड बाकी-छ ~ =:

--3 ४६२ - ४६३

२४६३

९२

~ ~

ः = < | < 4 ४६४ ४६४

४: कफजन्य उपदंश मँ ~ ˆ - : ४६४

| उपद्् चिक्त्ा सब : 1 ४६५ ६

पृष्ठ

४५८

४६८

४५६

४५६

४५६

४५६

४६०

४६०

४६१

४६१

४६१

४६१

४६१

४६२१

४६२ ~ ४६२

23

४६२

४६२

४६२

४६२

-जवुमणि आदि ्

न्यच्छ, व्यंग ओर नीलिका

-चिषश्ड प्रकशमं.

गुद्श्रशम -4

एकविंशतितमोऽध्यायः |

शक्रदोष चिकिस्वा का व्याख्यान . ४५

अष्टील्कामे ` -

विषय

उपद॑शों मँ रोपण के स्यि तेख तरणजन्य विषपं के.ख्यि चूं

रक्त जन्य ओर सन्निपातजन्य

उपदश

सन्निपातजन्य उपदंश में विशेष

चिकित्सा

वातजन्यश्लोपद मे स्नेहन आदि

कफजन्य श्लोपद्‌ में

पित्तजन्य श्लोपद्‌ में

पानीयक्षार

काकादनी आदिमे सिद

किथा तेख

त्रिफला क्राथ मिलाया क्षार

विंशतितमोऽध्यायः

लुद्ररोग चिकित्साका व्याख्यान

अपक्व अजगल्लिका मं

स्वेद तथा लेप

पित्तजन्य विसपुः

चिप्परोग~;“

पकी विदारिका को चीरना

शकरा दकी चिकित्सा

पाददारी मे स्नेहन आदि

अलसरोगण म~~

इन्द्रलुक्त मं

अरूषिका में

दाङ्णकःरोग मं मसूरिका मे


युवान पिड़काओं मे

पद्मिनी कटक रोगमं.

परिवर्तिकामं

वल्मीकमं ._

अहिपूतना रोग मं

सषपी मं व्रण रोपकः तेल

वि्ष॑य |

ग्रथित को निरन्तर नाडी स्वेद

अछ्जी को जोक लगाकर

मृदित को वला ते से

संमूढ पिडका में

अवमन्यमें

उत्तमा में

शतपोनक, रक्तजन्य मं

द्रा विञ्चतितमोऽध्यायः

मुखरोग चिकित्सा व्यास्यान

खाध्य ओष्ठ प्रकोपं की

चिकित्सा

दन्तमूल मेँ होनेवाल रोगों की

चिकित्सा

द्न्तवेष्टमें

उपकुशरोग में

शिरोविरेचन

दन्त नाडी को सामान्य

नस्य मेँ बरतने के ल्यि सिद्ध तैल

चिकित्सा

जिहागत साध्य रोगों की

चिकित्सा

ं ताह के रोगोंकी चिकित्सा

कण्ठ के रोगों की चिकित्सा । स्नेहिक धूम सवंसरमे ` उत्तम है

सअसाध्यमुखरोग

पष्ठ

४७०

४७०9

४७०

४७०9

४७१

४७१

४७१

४७१

४७१

४७९१

४७२९

४७९

, ४७२

४७२ ।

४७२९

४७३

४७४

` ४७४

४७४

४७१

त्रयोविशतितमोऽध्यायः `

शोफं की चिकित्साका

व्याख्यान

अवयव मे उत्पन्न शोफ छ

` प्रकारका दै सवसर शोथ पाच प्रकारका दहै श्वयथु शोथ

` वातजन्य शोथ

.. आमाशय मे स्थित दोष ऊपर के

भाम मे.शोय उसन्न करता ह . सामान्य्‌ चिकित्सा

फ को नष्ट करने के छ्यि

ष्याज्च 2,

४७

४७५

४७५

४७१

` ४७६

४७६ .

, ४७७

४७७.

विषय

सिु.रश्व्‌ र्‌ मनुष्य ध त नी ५ ~= 4 ¢> = र > क 99 क च क) य्‌ + ~ ~ = 4 भ्यः नि कि न्क + = क 9 , क क ^ # = ् क ऋ" ^, ~ र # ६

पृषु

चतुविशतितमोऽभ्यायः

अनागताबाधा प्रतिषेध अध्याय का

व्याख्यान ४७८

आरोग्य चाहनेवाले को एतिदिन

क्या करना चाहिये ४७८

प्रथम दातुन करना ४७८

जिह्वा साफ करने के छ्यि मुख

ग्रह्नाङक्न ४७८

आंखों मेँ आंजन क्गाना ४७६

पान खाना उत्तमदहै ४७६

शिर पर ते क्गाना ४७६

शिर पर लगने के ल्यितैल ४७६

कधी का करना ४७६

कानों मे ते डालना ४७६

स्नेह का अभ्यंप ४७६

सम्पूणं अंगों का परिषेक ४७६

स्नेह का अभ्यंग जहां नहीं करना

चाहिये ४८9

व्यायाम के संबंध में २

उबटन लगना ४८१

उद्घषण ओर उद्वतन ४८१

स्नान ४८१

पूखों कौ माला तथा

सुन्द्र्‌ बख्र ४८१

मुख पर ठेप करने से ४८२

ओखां मे काजल ठ्गना ४८२

आहार ' ४८२

पैरों का धोना तथा तैर मल्ना ४८२

जूते का पहनना ४८२

शिर पर पगड़ी आदि पहनना ४८२

छाते का धारण करना ४८२

हाथमे दण्डेका धारण करना ४८२

आराम करना 2८

मुसाफरी ४८२

सुखदायक शय्या पर सोना ठरे

संबाहन (चापी करना) ४८३

वायुसेवन्‌ ४८३

मनुष्य के त्यागने योग्य -४८३-४८१

श 9 । 4 क

विषय पृष

जो २ दोष ऊुपित होते हं ४८५

मेथुन मे अयोग्य तथा

योग्य स्री ४८ पंचर्विशतितमोऽध्यायः £

मिश्रक चिकित्सा का व्याख्यान ४८७

परिपोट ४८७

स्नेहदादि उपचार धटे

पठित रोग को नष्ट करने के स्यि तैक ` ४८टं बार घने, पंघराङे तथा कालत बनाने का तैक ४८८

मुख पर अभ्यंग करने के ल्य

सिद्ध धुत ४८८

राजाओंके योग्य छेष ४६०

षडबिशतितमोऽध्यायः, `

क्षीणव्रलीय वाजीकरण चिकित्सा

व्य सख्यान्‌ ४६९०

वाजीक्रण योग किनके ल्यं उत्तम ४६१ वाजोकरण के तीन प्रकार ४६१ क्खीबता का वणन ४६१

भ्रष्ठ वाजीकर विधि ४६२ वाजीकर अनेक योग ४६२-४६३

सप्रविशतितसोऽभ्यायः

सर्वोपघातशमनीय अध्याय का

व्याख्षान्‌ ४६३

वय स्थिर रहने का उपाय ४६३ विंडंग-तण्डुर चूणं ४६४

रक्त पित्तजन्य रोगां मे गम्भीरी कल्य ४६५

बल की चाहवाछरे के ल्यं

४ह१्‌ `

ओषधियां ४६५ .

वाराही कन्द मू का चूण ४६१.

ओंखों के तेज के छियं

अष्टाविरतितमोऽध्यायः

मेषायुष्कामीय रसायन चिक्रित्वा ` व्याख्यान

मेधा ओर आयु की कामनावाले

के छियि चण

मेघावी के ल्यि मण्डूकपणी

२०

सुश्रुतसंहिता

विषय

मेधावी के लिए ब्राह्मी आदि का योग ४६७-४६८

आयुर्वर्षक मंत्र और औषध के साथ एक वर्ष में फल देने वाली रसायन ४६८

पाप दौर्भाग्य नष्ट करने के लिये रसायन ४६८

वचा चूर्ण आदि योग ४६८

मधु का योग ४६८

एकोत्तत्रिंशत्तमोऽध्यायः

स्वभावव्याधि प्रतिषेधनीय रसायन का व्याख्यान ४६६

सोम का विधान ४६६

चौवीस नाम के सोम ४६६

सोम सेवन विधि ५००-५०१

सोम के पत्ते आदि कैसे होते हैं ५०१

सोम कहाँ होता है ५०२

त्रिंशत्तमोऽध्यायः

निवृत्तसन्तापीय अध्याय का व्याख्यान ५०२

रसायन के सेवन से देवताओं का आनन्द ५०२

सात पुरुष रसायन को सेवन न करें और सात ही कारणों से रसायन गुण नहीं करते ५०३

औषधी (सोम के सहस्र) का व्याख्यान ५०३

औषधियों की प्रथक २ पहचान इन सातों औषधियों को उखाड़ने के मन्त्र ५०४

सात औषधियों को दूँढने के स्थान ५०५

एकत्रिंशत्तमोऽध्यायः

स्नेहोपयोगिक चिकित्सा का व्याख्यान ५०५

स्नेह की उत्पत्ति स्थान दो प्रकार का है ५०५

स्थायर स्नेहों का वर्णन ५०५

कषाय स्नेह पाकविधि ५०६

विषय

पल कुडव आदि का परिमाण स्नेहपाकविधि ५०७

स्नेहपान विधि ५०७

घृतपान, तैल, वसा, मज्जा के योग ५०७

पित्तविकार, वायुरोग और कफ की अधिकता में घी कैसे लेना चाहिए ५०७

तिरसठ प्रकार के रसों से घी का सेवन ५०७

केवल स्नेहपान उत्तम है ५०८

ऋतुओं में स्नेहपान का समय स्नेहपान के पीछे प्यास लगने पर गरम पानी स्नेह की मात्रा जीर्ण होने पर किनके लिये उत्तम है स्नेह के जीर्ण होने पर क्या करना चाहिये स्नेह के लिये घृत स्नेहपान का निषेध स्नेहन के अयोग में सम्यग स्निग्ध के लक्षण अतिसिग्ध के लक्षण स्नेह तथा रूक्षण स्नेह के नित्य सेवन का फल

द्वान्त्रिंशत्तमोऽध्यायः

स्वेदावचारणीय चिकित्सा का व्याख्यान ५१०

स्वेद चार प्रकार का है तापस्वेद, उष्मास्वेद, उपनाह स्वेद, द्रवस्वेद ५११

निरग्नि और साग्नि स्वेद ५१२

नस्य, वसित और शोधन के पहले स्वाद देना चाहिए बिना स्नेहन किया शरीर स्वेद से नष्ट हो जायगा छिपे हुए दोष भी स्वेद पर बाहर निकल आते हैं भली प्रकार दिया स्वेद से जड़ बनी सन्धियाँ क्रियाशील बन जाती हैं ५१३

विषय

किनको स्वेद नहीं देना चाहिये ५१३

त्रयखिण्णत्तमोऽध्यायः

वमन-विरेचन साध्य उपद्रव चिकित्सा व्याख्यान ५१४

दोषों के लिये सिद्धान्त दोषों को निकालने के लिये वमन और विरेचन ५१४

वमन विरेचन की विधि वमन भली प्रकार हुआ जानने के लक्षण ५१४

भली प्रकार वमन हो जाने के बाद क्या देना चाहिए वमन करनेवाले व्यक्ति को जो दोष नहीं होते वमन द्वारा कफ शोधन वमन का निषेध ऊर्ध्ववायु का लक्षण वमन के अयोग्य पुरुषों को वमन देने से रोग कष्ट साध्य अपवाद वमन के योग्य विरेचन कित्ते देना चाहिए विरेचन से पहले लघु भोजन कोष्ठ तीन प्रकार का है विरेचन पीने पर मल को न रोके विरेचन में मूत्र, मल आदि क्रम से आते हैं भली प्रकार विरेचन न होने पर दोष भली प्रकार विरेचन के लक्षण ठीक विरेचन न होने पर पेया न पिलाये विरेचन से पित्तजन्य दोषों का नाश विरेचन के योग्य अयोग्य युक्त विरेचन स्वभाव से दोषों को अघोषार्ग से निकालता है मृदु कोष्ठवाले व्यक्ति में अतितीक्ष्ण विरेचन दोषों को भली प्रकार नहीं निकालता ५१८

विषयानुक्रमणिका

२१

विषयपृष्ठविषयपृष्ठविषयपृष्ठ
प्रातः पी हुई औषध प्रशस्त है५१८शुद्ध रक्त और अशुद्ध रक्त की परीक्षा५२२अयोगजन्य हानियों को चिकित्सा५३०
दुर्बल मनुष्य के दोषों को थोड़ा २ करके बाहर निकाले५१८अन्न के शेष रहने पर निर्बल शरीर आदि के अति-तीक्ष्ण उष्ण अतिलवण आदि को पीने पर५२२सप्तत्रिंशत्तमोऽध्यायः अनुवासन उत्तर बस्ति चिकित्सा व्याख्यान५३१
पके हुए दोषों की उपेक्षा करना ठीक नहीं५१८कूरकोष्ठ अतिलवण या अतिसिन्धु पुरुष में बरती हुई औषध५२३अनुवासन कब देना चाहिये बिना शोधन किये मनुष्य को स्नेहबस्ति नहीं देनी चाहिये५३१
मन्दगनि और कूर कोष्ठवाले के लिये अतिशय स्नेहगान पर स्निग्ध विरेचन नहीं पीना५१८जो मूर्खता से औषध के वेग को रोकता है जिस पुरुष के दोष ऊपर या नीचे प्रवृत्त हुये हों५२३अर्श, ग्रहणी रोग आदि वायुजन्य रोग को नष्ट करने का योग५३१
स्नेहसात्प्य व्यक्ति के लिये कोमल प्रकृतिवाले को थोड़ी हानि करनेवाली औषध५१८पञ्चत्रिंशत्तमोऽध्यायः नेत्रबस्ति प्रमाणप्रविभाग चिकित्सा का व्याख्यान५२४वात रोगियों में अनुवासन रूप से बरतनेवाला तैल५३१
स्नेहन, स्वेदन के बिना संशोधन५१८स्नेहादि कर्मों में बस्ति मुख्य किन रोगों में बस्ति बरतनी चाहिये५२४बस्ति में देने योग्य अनेक प्रकार के तैल५३१-५३३
स्नेहन स्वेदन से चलायमान दोष वमन विरेचन द्वापा जाते हैं५१९बस्ति के भिन्न २ परिमाण बस्ति के विषय में बस्ति के दो प्रकार कौन किसमें देनी चाहिये वायु के वेग को बस्ति ही सहन करती है५२५भली प्रकार निरुद्ध होने पर विविध तैल अनुवासन के लिये५३३
चतुर्त्रिंशत्तमोऽध्यायः वमन विरेचन व्यापत् चिकित्सा का व्याख्यान५१९बस्ति के दोष५२५रात्रि में बस्ति का प्रयोग न करे५३४
वमन विरेचन की व्यापत्ति १५ प्रकार की५१९अतिशय जोर से अथवा धीरे से दवाई बस्ति का दोष और उसको ठीक करने के उपाय५२५अपवाद अनुवासन लेने का काल जिसको अनुवासन देना हो५३४
भली प्रकार वमन न होने से तीक्ष्ण वमन देना चाहिये५१९अतिस्निग्ध में रुक्षबस्ति तथा रुक्ष में स्निग्ध५२६भली प्रकार अनुवासन के लक्षण५३४
अशुद्ध आमाशयवाले तथा प्रचुर कफवाले को विरेचन ठीक न होने पर तुरन्त अतिशय तीक्ष्ण विरेचन देना चाहिये५१९पट्त्रिंशत्तमोऽध्यायः नेत्रबस्ति व्यापत् चिकित्सा नेत्र के हिल जाने से या घूम जाने से बस्ति के मोटा या छोटे होने से दोष५२६१९ बस्तियाँ शुक्रगत रोगों को भली प्रकार अच्छा करती हैं५३६
भली प्रकार विरेचन होने पर लक्षण देखकर वमन कराये५१९अतिशय जोर से अथवा धीरे से दवाई बस्ति का दोष और उसको ठीक करने के उपाय५२६१८ निरुद्ध और १८ बस्तियाँ को पालनेवाला मनुष्य बड़ा बलवान् होता है५३६
किस किस अवस्था में अतितोष्ण विरेचन देना चाहिये वायु की अधिकता में अतिशय स्नेह देकर स्वेद कराके फिर शोधन देवे५२०अतिस्निग्ध में रुक्षबस्ति तथा रुक्ष में स्निग्ध५२६स्नेह बस्ति और निरुद्ध एक साथ सेवन न करे५३६
अति मात्रा में स्नेह और स्वेदन करने पर वमन के अतियोग पर विरेचन के अतियोग पर५२०किस प्रकार की बस्ति दोष करती है५३०बहुत वायुवाले व्यक्ति को प्रतिदिन स्नेह बस्ति स्नेह बस्ति जन्य हानियाँ उत्तर बस्ति की व्याख्या कौनसी बस्ति अच्छी है बस्ति के शोधन के लिये मात्रा उत्तर बस्ति के वापिस न आने पर५३७

२२

सुश्रुतसंहिता

विषयपृष्ठविषयपृष्ठविषयपृष्ठ
बस्ति में जलन होने पर५३६ग्राहीबस्ति५४५नस्य का समय५५३
उत्तर बस्ति किन रोगों को नष्ट करती है५३६बन्ध्या स्त्रियों के लिये बस्तियाँ५४५नस्य के पूर्व५५३
अष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायःमाधुवैतलिक बस्तियाँ५४६स्नेह की मात्रा आठ बिन्दु५५४
निरुहक्रम चिकित्सा व्याख्यान५४०युक्तस्थ, दोषहर बस्ति, सिद्धनस्य में त्याज्य५५४
अनुवासन दिये हुये व्यक्ति कोबस्ति आदि५४६नस्य के योग, अतियोग अयोग के लक्षण५५४
निरुह बस्ति तथा उसे देने का प्रकार५४०एकोत्तचत्वारिंशत्तमोऽध्यायःशिरो विरेचन स्नेह की मात्रा५५४
बस्ति देने के लक्षण उत्पन्न होने पर निरुह बस्ति बन्द कर देवे५४०आतुरोपद्रव चिकित्सा का व्या० स्नेहपान, वमन विरेचन आदि लिये कायागनिमंद हो जाती तीनमाप यवागू५४७प्रयोग की दृष्टि से नस्य के तीन लक्षण५५४
कोमल प्रकृतिवालों को अधिक मात्रा में बस्ति न देवे५४०कफपित्त की अधिकतावाले के लिये तर्पणादि विधि५४७सर्पदष्ट, मूर्च्छित पुरुषों के लिये५५५
भली प्रकार निरुह हुआ जानने के लक्षण५४१रोगी एक एक अनुवासन बस्ति लेकर तीन दिन तक परहेज करे५४८कोमल प्रकृति स्त्रियों के सिर को शोधन के लिये५५५
भली प्रकार निरुह होने के पश्चात् कर्म५४२व्रण रोगी, आदि गिद्धी के कच्चे वर्तन के समान है५४८नस्य के लिये अयोग्य५५५
आस्थापन और स्नेह बस्ति से रोगी को शान्ति५४२क्रोध करने पर कुपित हुआ पित्त, दाह प्यास आदि करता है५४८अतिमात्रा, अतिशीत आदि से हानियाँ५५५
निरुह देने के दिन वायु के कोप का भय५४२चत्वारिंशत्तमोऽध्यायःहानियों की चिकित्सा कैसे५५५
एक मुहूर्त प्रतीक्षा करने पर निरुह बस्ति के बाहर न आने पर५४२धूमनस्य कवलग्रह चिकित्सा का व्याख्यान५५५प्रतिमर्श नस्य का उपयोग५५५
विपरीत गतिमान् वायु से दोष भोजन करने पर आस्थापन नहीं देना चाहिये५४२धूम पाँच प्रकार का है प्रायोगिक धूम के लिये वर्ति वमन करानेवाले द्रव्यों को वामनीय धूम में बरते५५०१४ समय५५६
अवस्थानुसार निरुह देना चाहिये५४२धूमनेत्र को बनाने के लिये धूम पीने के प्रकार५५०भित्र २ समय में लिये नस्य के गुण५५६
निरुह में देने योग्य५४२धूम पीने का समय५५०कवल ग्रहण की विधि५५६
स्वस्थावस्था में क्वाथ आदि का भाग५४२स्नेहिक धूम स्नेह एवं उपलेंप से वायु को शमन करता है५५०गण्डूष का लक्षण५५७
कल्पना विधि५४२धूमनेत्र को बनाने के लिये धूम पीने के प्रकार५५०कवल में शुद्धि के लक्षण५५७
बारह प्रसृतवाले निरुह५४३धूम पीने का समय५५०तिल आदि का कवल जले हुये मुल के दाह को नष्ट करता है५५७
पृथक् रूप से बस्तियाँ५४३-५४६स्नेहिक धूम स्नेह एवं उपलेंप से वायु को शमन करता है५५०औषध का बुद्धि पूर्वक विभाग करके चार रूपों में प्रतिसारण५५७
शोधनबस्तियाँ५४५धूम के गुण५५०
लेखनबस्तियाँ५४५धूमपान के तीन योग्य५५०
बुँहणबस्तियाँ५४५धूमपान में कितने कितने घूँट और कैसे लेने चाहिये५५०
बाजीकरबस्तियाँ५४५नस्य की विधि५५०
पिच्छाबस्ति५४५नस्य के पाँच प्रकार५५०
किन रोगों को ठीक करने के लिये नस्य लेना ठीक है५५३

कल्पस्थान

प्रथमोऽध्यायः

अन्नगान रक्षा कल्प का व्याख्यान५५८
वैद्य निरन्तर राजा की विष से रक्षा करे५५८
राजा को कभी किसी का विश्वास नहीं करना चाहिये
वैद्य की योगता५५८
रसोई कैसे हो५५६
रसोई का अधिकारी वैद्य गुणों

विषयानुक्रमणिका

२३

विषयपृष्ठ
से युक्त मनुष्य हो५५६
भन्य कैसे हों५५६
रसोई में काम करनेवाले सब वैद्य के अधीन हों५५६
विषदाता की पहचान५५६
कभी २ सज्जन पुरुष भी असाधुओं जैसी चेष्टा कर लेते हैं५६०
विष देने के साधन५६१
विषैले भोजन की परीक्षा में पशु पक्षियों का उपयोग५६०
विषैले अन्न के परोसने पर बाण के ऊपर जाने से हृदय आदि में दोष५६०
हाथों में लगा विषैला अन्न५६०
विषैला अन्न खाने से विकार५६१
अमाशय में गया विष५६१
पक्वाशय में पहुँचा विष५६१
दूध, मधु, पानी आदि तरल द्रव्यों में विष से विकार५६१
शाक, दाल, अन्न आदि में विष के विकार५६१
दातुन में विषका संचार होने से५६१
विषैला अम्यंग५६१
कंधी आदि के विष से युक्त होने पर दोष तथा उसका उपाय५६१
शिर, मुख, हाथी घोड़े ( आदि की पीठ पर ) विष लगाने से विकार तथा चिकित्सा५६२
नस्थ और धूम में विष होने से विकार तथा चिकित्सा५६२
विषले पुष्पों का विकार और चिकित्सा५६२
कान के तैल के विषैला होने पर विषैले अंजन से५६२
विषैले, जूते, खड़ाऊँ, आभूषण आदि के विकार तथा चिकित्सा५६२
वैद्य राजा को हर प्रकार से विष से बचाये५६३
विषयपृष्ठ
राजा सदा विषन्न द्रव्यों के साथ भन्य और भोजनों का सेवन करे५६३
द्वितीयोऽध्यायः
स्थावर विष विज्ञानीय अध्याय का व्याख्यान५६३
स्थावर और जंगम भेद से विष के दो प्रकार५६३
दस स्थावर विषके अधिष्ठान आठमूल विष, पांच पत्र विष, १२ फलविष, ५ पुष्प विष, ७ त्वक सार, ३ शीर विष, २ घातु विष, १३ कन्द विष५६३
सब मिलाकर ५५ स्थावर विष५६४
अवान्तर भेद५६४
भिन्न २ विषों के लक्षण५६६
तीक्ष्ण कन्दों का विस्तार५६५
विष के दसगुण५६५
दूषीविष संज्ञा५६५
दूषीविषके लक्षण५६५
विष नानाप्रकार के
रोगोत्पत्तिकारण५६६
स्थावर विष के लक्षण५६६
चिकित्सा५६६
अजेय घृत५६६
दूषीविषारि नाम का अगद५६७
तृतीयोऽध्यायः
जंगम विषविज्ञानीय कल्प का व्याख्यान५६७
जंगमविष के १६ स्थानों का विस्तार५६७
विष से दूषित जल और उसे दूर करने के उपाय५६८
विष से दूषित भूमि५६६
घास भूसा एवं भोजन गेहूँ आदि के विष से दूषित हो जाने पर उनकी चिकित्सा५६६
धूम या वायु के विष से युक्त होने पर५६६
विषयपृष्ठ
विष की उत्पत्ति५६६
विष में प्रायः सब गुण तीक्ष्ण होते हैं५६६
विष सॉप के सारे शरीर में फैला रहता है५७०
विषों में शीतल परिवेक, कीटों का विष मन्द होने से स्वेद दे सकते हैं५७१
विष से मरे प्राणी का मांस नहीं खाना चाहिये५७१
विषपान के लक्षण५७१
सभी विष उष्ण उपचार से दुगुने बढ़ते हैं५७१
असाध्य के लक्षण५७२
चतुर्थोऽध्यायः
सर्वदृष्टविज्ञानीय कल्प का व्याख्यान५७२
दंष्ट्रा विषवाले पृथ्वी के सॉप ८० प्रकार के हैं५७२
उनके पांच प्रकार के भेद तथा आकार दृष्टि से तीन प्रकार५७२
अतिशय क्रोधी सॉप काटते हैं और उनका काटना तीन प्रकार का है सर्पाङ्गभिद्य५७३
सॉपों के भिन्न २ विह्न आकार५७३
सॉपों के भी ब्राह्मण क्षत्रिय आदि चार वर्ण५७३
दर्वाँकर वायु को मण्डलि पित्त को राजिमान् कफ को कुपित करते हैं५७३
तीनों के धूमने का काल५७३
तीनों की अवस्था जो मृत्यु का कारण होती है५७४
डरनेवाले सॉप अत्यविष के होते हैं५७४
पुरुष, स्त्री तथा नपुंसक जाति सब सॉपों के दृष्ट लक्षणों के समान्य रूप५७६
भिन्न २ सॉपों के काटने से शरीर पर प्रभाव५७६