भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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लगता है, इसका स्थान मध्य एशिया में मानते हैं। जब कि हम लोग स्वर्ग-त्रिविष्टप को वर्तमान तिब्बत कहते हैं। इसलिये उत्तरकुश-वर्तमान तिब्बत के पास का ध्यान शान पर्वत ही हो तो इसमें कोई आपत्ति नहीं।

इन सब से अधिक वर्तमान सुश्रुत में राम-कृष्ण का नाम भी आता है। राम और कृष्ण इस देशवासियों के पूज्य हैं। उनका सुश्रुत में नाम कथन होना—इसको ब्राह्मण काल का सिद्ध करने में प्रबल युक्ति है। यथा—

“महेन्द्ररामकृष्णानां ब्राह्मणानां गवामपि। तपसा तेजसा वाऽपि प्रशाम्यध्वं शिवाय वै ॥ सु० चि० अ० ३०।२७

राम, कृष्ण का नाम होना, उत्तरकुश कथन, विशिखा, भिल्लुसंघाटी शब्दों का आना, ब्रह्मभोज आदि बातों का वर्णन—सुश्रुत संहिता को ब्राह्मण काल का सिद्ध करने में पर्याप्त है। साथ ही इसका संस्कृत्ता नागार्जुन-बौद्ध हो, इसमें सन्देह उत्पन्न करता है। बौद्ध संस्कृत्ता-बौद्धों के लिये एक भी प्रतिपादक पंक्ति या उसकी झलक किसी रूप में न देवे, यह मुश्किल है, खासकर जब हम देखते हैं, कि अहिंसा के कारण हमारा शल्यशास्त्र (सर्जरी) पर्याप्त अधोगति में उतरा है, उसमें शल्यशास्त्र के इस प्रधान ग्रंथ का संस्कृत्ता बौद्ध हो, इसके मानने में सन्देह रहता है। यदि संस्कृत्ता नागार्जुन है तो वह बौद्ध नहीं था, और यदि बौद्ध नागार्जुन के सिवाय दूसरा कोई नागार्जुन नहीं मिलता तो इस सुश्रुत का प्रतिसंस्कृत्ता नागार्जुन नहीं है, कोई दूसरा होगा।

इसलिये डल्हन के वचन पर आँखें बन्द करके बैठने में सन्देह रहता है।

वर्तमान सुश्रुत में चरक संहिता के वाक्य बहुत से एक जैसे ही आते हैं। यथा—

सुश्रुत में

(१) मुद्गान्मसुरांश्रणकान् कुलथान् समकुष्ठकान् सु० चि० अ० ३६।१५०

(२) गुरुकावस्थिरावूरु न स्वाविव च मन्यते ॥

(३) गोधूमवेणुयवानुपयुञ्जति।

(४) मधु मधुरमामलकरसेन हरिद्रायुतं,

(५) स्थितं दशाहत्रयमेतदञ्जनम् कृष्णोरगास्यै कुशसंप्रवेष्टिते।

तन्मालतीकोरकसैनधवायुतं

सदाऽञ्जनं स्यात् तिमिरेऽथ रागिणे ॥

(६) अहोरात्रे सततकौ द्वौ कालावनुवर्त्तते।

अन्येद्युष्कस्त्वहोरात्रादेककालं प्रवर्त्तते ॥

(७) मिथ्याचारेण यः स्त्रीणां प्रदुष्टेनार्त्तवेन च।

जायन्ते बीजदोषान्च देवान्च श्रृणुताः पुष्क ॥

उ० अ० ३८।५

(८) वातिकं बस्तिमिश्रापि पैत्तिकं तु विरेचनैः।

कफजं वमनैर्ध्यानपस्मारमुपाचरेत् ॥

(९) आनद्यते यस्य विघ्न्यते च प्रकिलद्यते शुष्यति

चापि नासा। न वेत्ति यो गन्धरसांश्च जन्तुः जुष्टं व्यवस्ये- तमपीनसेन ॥ सु० अ० २२।६

चरक में

(१) मुद्गान्मसुरांश्रणकान् कुलथान् समकुष्ठकान्। चरक० चि० अ० ३।१६

(२) अन्यनेयौ हि संमग्नावूरुपादौ च मन्यते ॥

(३) देयास्तथा वेणुयवा यवानां कल्पेन गोधूममयाश्च मद्याः ॥

(४) क्षौद्रेण युक्तामयवा हरिद्रां पिबेद् रसेनामलकीफ- लानाम्।

(५) वदने कृष्णसर्पस्य निहितं भासमञ्जनम्।

ततस्तस्मात्समुद्भूत्य सुशुष्कं चूर्णयैद् बुधः ॥

सुमनःकोरकैः शुष्कैरधीशैः सैन्यवेन च।

एतन्नेत्राञ्जनं कार्यं तिमिरन्मनुत्तमम् ॥

(६) अहोरात्रे सततकौ द्वौ कालावनुवर्त्तते ॥

चि० अ० ३।६३

(७) मिथ्याचारेण ताः स्त्रीणां प्रदुष्टेनार्त्तवेन च।

जायन्ते बीजदोषान्च देवान्च श्रृणु ताः पुष्क ॥

चि० अ० १३०

(८) वातिकं बस्तिभृषिष्ठैः पैत्तां प्रायो विरेचनैः।

शलैष्मिकं वमनप्रायैरपस्मारमुपाचरेत् ॥

(९) आनद्यते यस्य विघ्न्यते च प्रकिलद्यते धूप्यति

चापि नासा। न वेत्ति यो गन्धरसांश्च जन्तुः जुष्टं व्यवस्येतमपीनसेन ॥ चरक चि० अ० २६।११४

अत्रिदेव

१ ‘पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थांयामसंज्ञायाम्’ पाणिनि के इस सूत्र को व्याख्या में ‘उत्तराः कुशरः’ यह उदाहरण है। इससे स्पष्ट है कि पाणिनि से पूर्व उत्तरकुश शब्द प्रसिद्ध था।