सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ
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विषयानुक्रमणिका
५
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| पूर्णरूप में हितकारी द्रव्य | ८० |
| प्राणियों का पथ्य-आहार | ८० |
| विहार | ८० |
| अन्य द्रव्य संयोग के आहार | |
| विषवत् अतिकारी हो जाते हैं | ८० |
| अग्नि आदि पदार्थों को देखकर | |
| एकान्त अहित पदार्थों का भी | |
| उपयोग करें | ८० |
| अन्यसंयोगरूपी अहितकारी | |
| द्रव्य | ८० |
| कर्मविरुद्धद्रव्य | ८१ |
| मानविरुद्ध द्रव्य | ८१ |
| रस, वीर्य और विपाक में विरुद्ध | |
| द्रव्य | ८१ |
| कोई द्रव्य दोष का प्रकोपक और | |
| कोई द्रव्य दोष की शान्ति | |
| करता है | ८१ |
| रस आदि धातुओं में विकार | |
| कैसे होता है | ८२ |
| चिकित्सासूत्र | ८२ |
| किन अवस्थाओं में विरुद्ध भोजन | |
| निष्फल हो जाता है | ८२ |
| दिशा के योग से वायु की हित् | |
| कारिता और अहित कारिता | ८३ |
| एकविंशतितमोऽध्यायः | |
| व्रण प्रश्न नामक अध्याय की | |
| व्याख्या | ८३ |
| शरीर की उत्पत्ति में कारण | ८३ |
| निरुक्ति | ८३ |
| दोषों के स्थान | ८४ |
| इनके पांचविभाग | ८४ |
| पित्त के अतिरिक्त क्या कोई | |
| और अग्नि शरीर में है | ८४ |
| शरीर में पित्त के कार्य | ८४ |
| पित्त के लक्षण | ८५ |
| कफ के स्थान | ८५ |
| कफ के गुण | ८५ |
| दोषों के प्रकोपक कारण | ८६ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| दोषों का प्रसार | ८६ |
| रोग की उपलब्धि | ८८ |
| व्रण शब्द की निरुक्ति | ८६ |
| द्वविंशतितमोऽध्यायः | |
| व्रणस्त्रावविज्ञानीय अध्याय की | |
| व्याख्या | ९० |
| व्रण के आठ अधिष्ठान | ९० |
| त्वचा में स्थित व्रण सुख | |
| साध्य है | ९० |
| व्रण की चार आकृतियाँ | ९० |
| दुष्ट व्रण के लक्षण | ९० |
| सब प्रकार के स्त्राव | ९१ |
| वायु के कारण | ९१ |
| असाध्य स्त्राव | ९१ |
| सब व्रणों की वेदना | ९१ |
| पैतिक व्रणों के लक्षण | ९१ |
| कफजन्य व्रण के लक्षण | ९२ |
| व्रण के रङ्ग | ९२ |
| त्रयोविंशतितमोऽध्यायः | |
| कृत्याकृत्य नामक अध्याय की | |
| व्याख्या | ९२ |
| अतिशय सुखसाध्यव्रण | ९३ |
| कृच्छ्र साध्य व्रण | ९३ |
| व्रण जो सुखपूर्वक रोहण हो जाते हैं | ९३ |
| साध्य के भेद कृच्छ्रसाध्य व्रण | ९३ |
| याप्य व्रण | ९३ |
| याप्य का लक्षण | ९३ |
| असाध्य रोग | ९३ |
| शुद्धव्रण के लक्षण | ९४ |
| रोहण होते हुये व्रण के लक्षण | ९४ |
| सम्यग् रुद्ध के लक्षण | ९४ |
| चतुर्विंशतितमोऽध्यायः | |
| व्यापिसमुद्देशीय नामक अध्याय की | |
| व्याख्या | ९५ |
| रोग दो प्रकार के हैं | ९५ |
| तीन प्रकार का दुःख | ९५ |
| सात प्रकार की व्याधियाँ | ९५ |
| दुष्ट शोणित बलजाता | ९५ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| प्रहार शक्ति से उत्पन्न आगन्तु- | |
| जरोग | ९५ |
| कालवृल प्रवृत्ता | ९५ |
| रसादि धातुओं के विकार | ९६ |
| वात आदि दोषों का ज्वर आदि | |
| रोगों के साथ सम्बन्ध सदा बना | |
| रहता है अथवा नहीं | ९७ |
| पञ्चविंशतितमोऽध्यायः | |
| अष्टविध शस्त्रकर्मोपध्याय की | |
| व्याख्या | ९७ |
| छेदन करने योग्य रोग | ९७ |
| भेदन करने योग्य रोग | ९८ |
| लेखन करने योग्य रोग | ९८ |
| वेधन करने योग्य रोग | ९८ |
| शलाका द्वारा एषण करने | |
| योग्य | ९८ |
| स्त्रावण करने योग्य रोग | ९८ |
| सीने योग्य रोग | ९८ |
| किन अवस्थाओं में सीना नहीं | |
| चाहिये | ९९ |
| संशोधन करने योग्य | ९९ |
| सीने की विधि | ९९ |
| सीने के चार प्रकार | ९९ |
| सूई के भेद | ९९ |
| सीने के पश्चात् कर्म | ९९ |
| आठ प्रकार के शस्त्र कर्म में चार | |
| प्रकार की व्यापद है | ९९ |
| किस वैद्य का परित्याग करना | |
| चाहिये | १०० |
| शस्त्र के अतियोग से होनेवाले | |
| लक्षण | १०० |
| सर्म्पविद्धशिशा आदि के | |
| लक्षण | १०० |
| स्नायु के विद्ध होने पर | १०० |
| सन्धि के विद्ध होने पर | १०० |
| अस्थि के विद्ध होने पर | १०० |
| बिरादि सर्म्प के विद्ध होने पर | १०१ |