सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ
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सुश्रुतसंहिता
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| वैद्य को रोगी की रक्षा कैसे करनी चाहिये और उसका फल | १०१ |
| षड्विंशतितमोऽध्यायः | |
| प्रनष्टशल्यविज्ञानीय अध्याय की व्याख्या | १०१ |
| शल्य के प्रकार | १०१ |
| शारीरिक शल्य | १०१ |
| शल्य के प्रसिद्ध भेद | १०१ |
| छोटे बड़े शल्यों की पाँच प्रकार की गति | १०२ |
| शल्य का लक्षण | १०२ |
| वात आदि दोषों से अदूषित | १०२ |
| त्वचा में शल्य छिप जाने पर | १०२ |
| सामान्य विज्ञानीय उपाय | १०३ |
| निःशल्य के लक्षण | १०३ |
| अस्थि रूप शल्य | १०४ |
सप्तविंशतितमोऽध्यायः
| शल्योपनयनीय अध्याय की व्याख्या | १०४ |
|---|---|
| शल्य के दो प्रकार | १०४ |
| अनवबद्ध शल्य को निकालने के १५ उपाय | १०४ |
| सब प्रकार के शल्य निकालने की दो विधियाँ | १०५ |
| अर्वाचीन शल्य को निकालने का उपाय | १०५ |
| पराचीन शल्य निकालने का उपाय | १०५ |
| उत्तुषित मुखवाले शल्य को निकालने का उपाय | १०५ |
| कुखि, वक्ष आदि के शल्य को निकालने का उपाय | १०५ |
| शल्य को निकालने के पश्चात् कर्म | १०५ |
| हृदय के समीप शल्य निकालने का उपाय | १०६ |
| अस्थि छिद्र में प्रविष्ट को निकालने के उपाय | १०६ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| कर्णवाले शल्य को निकालने का उपाय | १०६ |
| लाख आदि वस्तु के गले में फँस जाने से उसे निकालने का उपाय | १०७ |
| मछली का शल्य आदि निकालने का उपाय | १०७ |
| पानी में डूबे हुए मनुष्य के पेट में से जल निकालना | १०७ |
| भोजन का प्राप्त गले में फँस जाने से निकालने का उपाय | १०७ |
| गला घोटने पर | १०७ |
| अष्टविंशतितमोऽध्यायः | |
| विपरीत व्रण विज्ञानीय अध्याय | १०८ |
| रिष्टलक्षण मृत्यु को बता देता है | १०८ |
| किन अवस्थाओं में रिष्टलक्षण नहीं पता चलते | १०८ |
| रिष्टलक्षणों के निवारण के उपाय | १०८ |
| प्राकृतिक गन्ध | १०८ |
| वैकृतगन्ध | १०८ |
| किन व्रणों का परित्याग करना चाहिये | १०८ |
| शब्द वैकृत | १०९ |
| स्पर्श वैकृत | १०९ |
| आकृति विशेष वैकृत | १०९ |
| उपद्रव | १०९ |
एकौनत्रिंशत्तमोऽध्यायः
| विपरीताविपरीत-दूत-शकुन-स्वप्न निदर्शनीय नामक अध्याय की व्याख्या | १०९ |
|---|---|
| वैद्य की मानसिक चेष्टाओं से रोगी के शुभ अशुभ भाव पता लग जाते हैं | १०९ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| निन्दित दूत के लक्षण | ११० |
| चेष्टायेँ | ११० |
| वेला | ११० |
| नक्षत्र | ११० |
| तिथि | ११० |
| शुभ-अशुभ शकुन | १११ |
| शुभ तथा निन्दित वायु | १११ |
| वैद्य को इनकी निश्चित रूप से परीक्षा करनी चाहिये | १११ |
| स्वप्न | ११३ |
| विफल स्वप्न | ११३ |
| उत्तरतंत्र में पढ़े हुये रोगों के लिये अन्य स्वप्न | ११४ |
| अशुभ स्वप्न में चिकित्सा | ११४ |
| शुभ स्वप्न | ११४ |
त्रिंशत्तमोऽध्यायः
| पंचेन्द्रियार्थ विप्रतिपत्ति नामक अध्याय की व्याख्या | ११४ |
|---|---|
| अरिष्ट के लक्षण | ११५ |
| न बचनेवाले रोगी के लक्षण | ११५ |
एकत्रिंशत्तमोऽध्यायः
| छाया विप्रतिपत्ति अध्याय की व्याख्या | ११६ |
|---|---|
| निश्चयात्मक मरनेवालों के लक्षण | ११६ |
| मृत्यु के कारण | ११७ |
द्वान्त्रिंशत्तमोऽध्यायः
| स्वभाव विप्रतिपत्ति नामक अध्याय की व्याख्या | ११८ |
|---|
| प्रकृति से प्रसिद्ध-शरीर के एक भाग में स्थित अवयवों का दूसरे रूप में परिवर्तित होना मृत्यु के लिये होता है | ११८ |
|---|---|
| असाध्य के लक्षण | ११८ |
त्रयत्रिंशत्तमोऽध्यायः
अवार्णीय नामक अध्याय की | ---|---