स्वप्नदोष चिकित्सा
Swapnadosh Chikitsa
स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: Brahmacharya Sangrah · वैदिक पुस्तकालय (उद्गम)
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स्वप्रदाष का चिकित्सा
इसमें वीर्य आना ही बन्द होजायेगा फिर स्वप्रदोष कैसे होगा? आपकी इच्छा के बिना वीर्य का एक बिन्दु भी शरीर से बाहर नहीं निकलसकता। फिर कैसा स्वप्रदोष और प्रमेहरोग? किन्तु यह निरन्तर दीर्घकाल तक श्रद्धापूर्वक अभ्यास करने से होगा। मैं यह कई बार लिखचुका हूँ।
आप इसे दूसरी प्रकार से भलीभाँति समझ जायेंगे। जब आप लघुशंका (पेशब) करने जावों और मूत्र-त्याग (पेशब) करते समय बीच में ही नाभि के नीचे के भाग मूलेन्द्रिय को खींचो तो गुदाइन्द्रिय और मूत्रेन्द्रिय भी एकसाथ खिंचेंगी और इससे मूत्र निकलना एकदम बन्द होजायेगा और जब तक आप इसे ढीला न छोड़ेंगे एक बूंद भी मूत्र बाहर नहीं निकलसकता। यह अनुभव आप करके देखलें या जब कुछ मास तक आप प्राणायाम का अभ्यास करलेंगे और आपको मूलाधार खींचे रहने का अभ्यास पक्का होजायेगा तब आप देखेंगे कि स्वप्नों और स्वप्रदोषों की संख्या स्वयं घटती चलीजायेगी। रात्रि में ऐसी अवस्था भी आयेगी कि आपको स्वप्रदोष होने का अवसर आयेगा तो अर्धनिद्रा में आप मूलाधार को खींच लोगे और आपकी आँखें खुलजायेंगी। आप स्वप्रदोष से बच जावोंगे। आपकी विजय होगी। यदि सोने से पूर्व खालीपेट ही यह प्राणायाम कियाजाय तो शीघ्र लाभ होगा। आपकी विजय और हार आपके अभ्यास पर है। जब कम से कम एक वर्ष तक आप अभ्यास करलें तो आगे का प्राणायाम मुझ से पत्र द्वारा वा मिलकर पूछलें। इस प्राणायाम की जितनी प्रशंसा करें थोड़ी है, सब ऋषियों और विशेषतया पूज्यपाद महर्षि दयानन्द की कृपा है जो ऐसी विद्या इस गिरे हुए संसार को मिली है। इस प्राणायाम के अभ्यास से जहां स्वप्रदोषादिरोग दूर होंगे वहां शरीर में वीर्यवृद्धि को प्राप्त होकर स्थिर बल, पराक्रम और जितेन्द्रियता की प्राप्ति होगी। सब शास्त्र और विद्याओं को थोड़े ही काल में समझकर विद्यार्थी उपस्थित करलेगा। इसका अभ्यास सब युवकों, विद्यार्थियों तथा ब्रह्मचर्यप्रेमियों (स्त्री तथा पुरुषों) को करना चाहिये। इससे मन और इन्द्रियों के सब दोष क्षीण और दूर होजाते हैं और मनुष्य इनको अपने वश में करलेता है। यह वीर्यरक्षा का सर्वोत्तम साधन और परम औषध है।
३-यन्त्र-चिकित्सा
स्वप्रदोष क्षीण और दूर करने के लिये एक यन्त्र भी तैयार किया जाता है। एक लोहे वा पीतल से स्पर्शिंगवाला छल्ला बनता है। जिसके अन्दर स्पर्शिंग लगा होता है। इसके कुछ ऊपर बाहर की ओर चारों ओर छले में ही काटे लगे रहते हैं। स्पर्शिंगवाला छल्ला छोटा बड़ा होसकता है। स्वप्रदोष का रोगी इसे मूत्रेन्द्रिय में पहनकर सोजाता है। जब स्वप्रदोष से पूर्व उत्तेजना होती है, तो काटे मूत्रेन्द्रिय में चुभने से आँखें खुलजाती हैं और स्वप्रदोष से बचजाता है। किन्तु इससे पूर्ण सफलता नहीं मिलती। कुछ लाभ होजाता है। यह किसी मिस्त्री से तैयार कराया जासकता है।