स्वप्नदोष चिकित्सा
Swapnadosh Chikitsa
स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: Brahmacharya Sangrah · वैदिक पुस्तकालय (उद्गम)
ओ३म्
@vaidicbooks
स्वप्नदोष चिकित्सा
( पृष्ठ ४३५-४४८ )
वैदिक पुस्तकालय
A black and white portrait of a man with a full beard and mustache, wearing a light-colored traditional Indian garment. He is looking directly at the camera with a neutral expression.
लेखक :
स्वामी ओमानन्द सरस्वती
A circular logo with a blue border. Inside the circle, there is a depiction of a deity, likely Lord Venkateswara, standing on a pedestal. The text 'वैदिक पुस्तकालय' is written in a circular path around the central image.
A circular logo with a blue border. Inside the circle, there is a depiction of a deity, likely Lord Venkateswara, standing on a pedestal. The text 'वैदिक पुस्तकालय' is written in a circular path around the central image.
ओङ्कार
स्वप्रदोष और उसकी चिकित्सा
“इन्द्रियाँ और संस्कार के दोष से अविद्या उत्पन्न होती हैं”
वैदिक पुस्तकालय
-ब्रह्मि दयानन्द
स्वप्रदोष क्या है?
अर्थनिद्रा में मनुष्य अनेक प्रकार के स्वप्न देखता है। जैसे संस्कार और विचार होते हैं, वैसे ही रात्रि में स्वप्न आते हैं। हमारे माता-पिता आदि पूर्वजों ने हमारे उत्पन्न करने के लिये कोई तैयारी नहीं की। लगभग सभी गृहस्थ कामवासना में अन्धे होकर व्यभिचार करते हैं। इसी पाप के फलस्वरूप हमारी उत्पत्ति होती है। यों कहिए हम विषयभोगों के कीड़े मकोड़े अपने पूर्वजों के गन्दे संस्कारों का भार सिर पर लादकर गर्भ से बाहर आते हैं और पैदा होने के पीछे न हमें ब्रह्मचर्य की शिक्षा मिलती है और न ही हमारे पालन-पोषण में स्वास्थ्य के नियमों का ध्यान रखा जाता है। सबके पेट उष्ण, उत्तेजक व वीर्यनाशक पदार्थों से टूंस-टूसंकर भर दिएजाते हैं। हम चरित्रहीन नीच साथियों के साल खुलेरूप से खेलते-कूदते हैं। हमें कोई रोकने-टोकनेवाला नहीं होता।
ब्रह्मचर्य का कौनसा नियम है जिसको हमारे देश के बालक गिन-गिनकर जानबूझकर प्रतिदिन तोड़ते न हों। इस कारण जानबूझकर जागृत-अवस्था में तथा विन जाने स्वप्न-अवस्था में वीर्यनाश करते हैं। नींद में गन्दे स्वप्न आकर वा विना स्वप्रदोष भी वीर्यपात (वीर्य का निकल जाना) स्वप्रदोष कहलाता है। यह भयङ्कर रोग है, हजारों में एकाध सौभाग्यशाली युवक वा विद्यार्थी होगा जो इससे बचा हुआ हो, आज सारा संसार इससे दुःखी है। यह सब हमारे पापों का ही फल है, इसलिए विना इच्छा के भी होता रहता है। कई बार तो मनुष्य इसको दूर करने के लिये घोर पुरुषार्थ और यत्न करता है और यह फिर भी होजाता है। कितने ही ब्रह्मचर्यप्रेमी युवक और विद्यार्थी इसी रोग के कारण महादुःखी और निराश दिखाई देते हैं। कितने ही स्वप्रदोष के रोगियों के पत्र मेरे पास आते रहते हैं। एक विद्यार्थी के एक पत्र का कुछ भाग नीचे देता हूँ-
हमारे विद्यालय में आपने ब्रह्मचर्य के बारे में व्याख्यान दिया। आपकी बातों का मेरे ऊपर काफी असर पड़ा। मैंने भी कुछ प्रतिज्ञायें कीं। किन्तु आज तक मैं अपनी प्रतिज्ञा में पास नहीं हुआ। जिसने मुझे पास नहीं होने दिया वह चीज मेरे वीर्य का बाहर निकल जाना है। मैंने इसको रोकने के लिये हजार कोशिश की, किन्तु सब फेल हुई। एक वैद्य ने मुझे कई प्रकार की दवाई दी किन्तु कोई असर
( ४३८ )
स्वप्रदोष की चिकित्सा
महीँ हुआ। बहुत दिन तक आसन और प्राणायाम किये। किन्तु अपनी प्रतिज्ञा में असफल हुआ। मैं सन्ध्या और हवन भी काफ़ी करता हूँ और मन को भी काफ़ी शुद्ध किया। जब मैं जागता हूँ तो मन ठीक रहता है किन्तु स्वप्न में खराब होजाता है। कई बार तो वीर्य निकल जाता है, तो मरने को जी चाहता है। श्रीमान् जी आपका अहसान मेरे से कभी भूला नहीं जासकता यदि आप मुझको इस बीमारी से बचा दें। श्रीमान् जी की बड़ी कृपा होगी।
इस रोग को दूर करने के उपायों पर कभी विस्तारपूर्वक लिखा जावेगा। किन्तु अब तो संक्षेप से लिखने के लिये विवश हूँ। जिन कारणों और भूलों से स्वप्रदोष का भयंकर रोग आ चिपटता है, उनको दूर करदो, यह स्वयं भाग जायेगा। इसको लोग जितना भयंकर समझते हैं यह उतना भयानक नहीं। कुछ उपाय तथा नियम हैं। यदि इनका सावधानी से पालन किया जाये तो जीवनभर कभी भी स्वप्रदोष नहीं होसकता। हमने इन्हें कितने ही युवकों और विद्यार्थियों पर बार-बार अनुभव किया वा आजमाया है, जिसने जितनी सावधानी और तत्परता से इन नियमों का पालन किया उसको उतनी ही सफलता मिली। कई बार तो छोटी-छोटी भूलों से ही युवकों को स्वप्रदोष होता रहता है।
इस रोग को दूर करने के उपाय और चिकित्सा:-
१. दुष्टविचारों का परित्याग
मनुष्य का मन चित्र खींचनेवाले कैमरे के समान है। जो भी वस्तु चित्र खींचते समय कैमरे के सामने आता है उसी का चित्र खिंच जाता है। यही अवस्था मन की है। जैसी बातें मनुष्य कानों से सुनता तथा मुख से कहता और जैसे कार्य आँखों से देखता वा अन्य इन्द्रियों वा शरीर से करता है, वैसे ही चित्र हमारा मनरूपी कैमरा खींचता रहता है। हमारी प्रत्येक क्रिया व विचार की छाप हमारे मन पर लगती रहती है। जैसे फोटोग्राफर अनेक प्रकार के चित्रों की प्लेट्स (छापें) एकत्रित (इकट्ठी) करता है, उसी प्रकार मनुष्य भी जैसे-जैसे कार्य करता रहता है वैसी-वैसी प्लेट्स (चित्र) हमारा मन भी संग्रह करता रहता है और हमें पता भी नहीं चलता। जब हमारा मन जागृत वा स्वप्न-अवस्था में कार्यरहित (खाली) रहता है तो फिर उन्हीं संग्रह किए हुए चित्रों की देख पड़ताल करता है। हम सारे दिन अशूल (गन्दे) विचारों में डूबे रहते हैं। अतः हमें स्वप्न भी गन्दे ही आते हैं। जागते हुए मुख से कहा वा कानों से सुना हुआ एक अशूल (गन्दा) शब्द भी अनेक अपवित्र संस्कारों की याद दिलाता है और हमारे नाश का कारण बनता है।
प्रियपाठक! नुझे क्षमा करें। मैं पूछता हूँ कि क्या कभी आपको मूत्र (पेशाब) पीने व मल (पाखाना) खाने का स्वप्न भी आया है? आप सबका उत्तर यही होगा कि नहीं, कभी नहीं। कारण मूत्र पीने व मल खाने की वस्तु नहीं। इनके
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वैदिक पुस्तकालय
दुष्टविचारों का परित्याग
( ४३९ )
खाने पीने का विचार हमें दिन में भी कभी नहीं आता। हमें इनसे अत्यन्त घृणा है। इसी प्रकार जिन विचारों व कार्यों से हम दिन में घृणा करते हैं वा मन में स्थान नहीं देते उनके स्वप्न भी हमें रात्रि में नहीं आते। हम तो दिन में उपन्यास नाविल आदि गन्दी पुस्तकें पढ़ते हैं। नीच (गिरे हुये) साथियों के साथ मिलते-जुलते, खेलते-कूदते तथा खाली पड़े रहते हैं। इस प्रकार दिन में पर्याप्त गन्दी सामग्री हमारे मन को स्वप्न अवस्था के लिये मिल जाती है। जो गन्दे स्वप्नों वा स्वप्नदोष से बचना चाहता है उसे चाहिये कि दिन में सावधान रहे। बुरे विचारों को मन में न आने दे तो रात को स्वयं बचा रहेगा। जो दिन में गन्दे विचारों का स्वागत करते हैं, सोते समय भी वे विचार उनके मन को घेर लेते हैं। जैसे आपके घर पर यदि कोई अतिथि (बटेऊ) आता है और आप उसका यथायोग्य भोजन आदि से आदर सत्कार करते हैं तो उसकी आपके यहां आने की फिर भी इच्छा होती है। यदि आप उसका तिरस्कार निरादर कर दें वा उसके लिये अपना द्वार बन्द कर दें तो वह फिर कभी भी न आयेगा। इसी प्रकार जिन विचारों का हम स्वागत वा आदर करते हैं, वे बार-बार हमारे मन में आते हैं। यदि हम गन्दे विचारों का तिरस्कार तथा इनसे घृणा करें तो ये हमारे पास आना छोड़ देंगे। यदि कोई गन्दा विचार आये, उसे धिक्कार दो। उत्साहपूर्वक कहो ओ! गन्दे विचार दूर भाग। हमारा द्वार तेरे लिये बन्द है। इस प्रकार अभ्यास करने से हमारा मन जागते समय गड़दों में नहीं गिरने पायेगा। इससे हम स्वप्नावस्था में भी बचे रहेंगे। दुष्टविचार हमारे सबसे बड़े और भयंकर शत्रु हैं।
यदि हमारे शरीर पर कोई शत्रु कुल्हाड़े, तलवार आदि किसी शस्त्र का प्रहार वा वार करे तो क्या निकलेगा, रक्त (खून)। किन्तु एक युवक जो आज अखण्ड ब्रह्मचारी है, वह कुछ दिन वा एकाध मास कुसङ्ग में रहजाये, गन्दी बातें कहे सुने वा देखे तो उसका मन गन्दे विचारों का स्थान बन जायेगा। मन व शरीर में उष्णता (गर्मी) और उत्तेजना पैदा होगी, दुष्टविचार उसके सारे शरीर को मथ वा बिलो डालेंगे। जो वीर्य सारे शरीर में रमा हुआ था, जिसका शरीर से बाहर बिलो डालेंगे। जो वीर्य सारे शरीर में रमा हुआ था, जिसका शरीर से बाहर निकलना एक मास पूर्व असम्भव था, आज वह गन्दे विचारों की उष्णता से अनायास ही शरीर से बाहर निकलने लगता है। वीर्य की अधोगति होजाती है। वीर्य पतला पड़ जाता है और नीचे की ओर बहने लगता है। जैसे दूध को बिलोने से घी बाहर (ऊपर) आजाता है, उसी प्रकार दुष्टविचारों का प्रहार (चोट) तलवार आदि शास्त्रों से भी अधिक घातक तथा भयङ्कर है, जो एक सदाचारी युवक के ब्रह्मचर्य को भी नष्ट कर डालता है। वीर्य के लिये शुद्ध और पवित्र विचारों से बढ़कर कोई सहायक नहीं। जागृत अवस्था में जिन्हें हम विचार कहते हैं, वे सोते हुए स्वप्न का रूप धारण करते हैं। दिन में गन्दे विचारों से काम-अग्नि भड़क उठती है। उसके फलस्वरूप रात को स्वप्नदोष होकर ही रहता है।
इसलिये दिन में कोई भी कार्य ऐसा न करो जिससे आपके मन में कोई
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स्वप्रदोष की चिकित्सा
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गन्दा विचार उत्पन्न हो वा कामुकता के विचार आर्यें। भय, चिन्ता, क्रोध और शोक आदि के विचार भी स्वप्रदोष के कारण हैं। अपने विचारों को सदा दूर रखो, मन में भी निर्बलता न आने दो, काम, क्रोध आदि के विचार मनुष्य शरीर में उत्तेजना और उष्णता उत्पन्न करते हैं और उसका परिणाम वीर्यनाश है। जब उत्तेजना होती है, तो सब स्यायुतन्तुओं में तनाव उत्पन्न होता है, काम-तन्तु उत्तेजित होजाते हैं। मूत्रेन्द्रिय में रक्त (खून) उतर आता है और इसका आकार लम्बाई, मोटाई बढ़जाती है। इस प्रकार की उत्तेजना काम क्रोध तथा चिन्ता आदि के विचारों और स्वप्नों से उत्पन्न होती है। यह उत्तेजना चाहे जागृतावस्था में हो वा स्वप्नावस्था में हो, वीर्यनाश तथा स्वप्रदोष का कारण ही बनती है। उत्तेजना होने के पीछे ही स्वप्न आता है। वा स्वप्न के पीछे उत्तेजना होती है। निष्कर्ष यह है—चाहे स्वप्न पहले हो वा उत्तेजना पहले हो, बिना उत्तेजना के स्वप्रदोष वा वीर्यनाश नहीं होता। काम, क्रोध, भय और चिन्ता आदि के विचार उत्तेजना के (जनक) कारण हैं। ऐसे विचार को उत्पन्न न होने देना ही स्वप्रदोष की सबसे भारी औषध है। भय शोक तथा चिन्ता आदि को अपने पास न फटकने दो। सदैव प्रसन्न (खुश) रहो। मन में निर्बलता न आने दो।
स्वप्रदोष हानिकारक तथा बुरा है। किन्तु स्वप्रदोषों ॐ देखकर चिन्ता करना व घबराना इससे भी बुरा है, चिन्ता करने से इनकी संख्या घटती नहीं, बढ़ जाती है। इसलिये युवको! घबराओ नहीं। स्वप्रदोष की चिन्ता करना इसे पुनः बुलाना है। यदि एक खिलाड़ी किसी साम्मुख्य (मैच) में दौड़ लगाता हुआ गिरजाय तो क्या उसे वहां पड़े रहकर रोने लग जाना चाहिये? नहीं, वहां बैठकर रोना अपना समय खोना है। जो उसी समय उठकर भागने लगता है मानो वह गिरा ही नहीं। प्रिययुवक! तू बार-बार क्या यदि हजार बार गिरचुका है तो भी घबरा नहीं। यह मत समझ कि सदा गिरा ही रहेगा। चिन्ता छोड़। घबराना कायर और हिजड़े का काम है। तू ब्रह्मचारी है। ईश्वर पर विश्वास कर, वह हमारे सत्कर्मों में सहायक है। “अजैष्माद्य-मैं आज जीतूंगा”-इस भावना को दृढ़ कर, रोने धोने से कुछ नहीं बनता। तू प्रभु का अमृतपुत्र है। उसने यह वीर्य जो तेरे शरीर का सार व अमूल्य रत्न है, मल-मूत्र के समान बाहर निकालने के लिये नहीं बनाया। यह सञ्जीवनी शक्ति तेरे शरीर का अंग है। यदि तू भूल न करे तो यह कभी बाहर नहीं निकल सकता।
वह परमेश्वर निराशों की आशा है। उसे किसी अवस्था में मत भूल। जिस प्रकार प्रातःकाल का किया हुआ भोजन हमें सायंकाल तक कार्य करने की शक्ति देता है और सायंकाल का भोजन रातभर के लिये शक्ति प्रदान करता है, उसी प्रकार प्रातःकाल का किया हुआ सन्ध्या-भजन व ईश्वर-चिन्तन सायंकाल तक बुरे विचारों तथा पापों से बचाता है और सायंकाल की हुई ईश्वर-उपासना रात्रिभर पापों और गन्दे विचारों तथा स्वप्नों से बचाती है। जिस प्रकार हम अपने माता-पिता के
कुछ भयंकर भ्रम और उनका निवारण
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सन्मुख चोरी, व्यभिचार आदि पापकर्म नहीं करते, उसी प्रकार पिताओं के पिता और माताओं की माता ओ३म् है, जो सब कुछ देखता है और हमारे कर्मों का फल सुख-दुःख के रूप में देता है। उससे छुपकर हम कुछ भी नहीं कर सकते। चाहे हम उसे देख न सकें किन्तु वह बार-बार हमें सचेत करता है। जब हमारे मन में पाप की भावना आती है, वह हमें अन्दर से बार-बार टोकता है। हम यह अनुभव भी करते हैं। किन्तु उसकी चेतावनी को अनसुनी कर देते हैं। जब हम अपने सच्चे रक्षक की भी नहीं सुनते तो वह भी हमें भूलजाता है। वह किसी कुकर्मी का साथी नहीं। इसलिये उस अदृश्य शक्ति को कभी मत भूलो। सोते समय भी परमरक्षक ओ३म् का (शिवसंकल्प के छः वेदमन्त्रों द्वारा) स्मरण करते-करते सोजावो। वह स्वप्न में भी तुम्हारी रक्षा करेगा। वह स्वप्रदोष की एक अचूक औषधि है। यदि मन में उसे परमपिता परमात्मा की आज्ञा का कि “पापो नृषद्वरो जनः” आलसी मनुष्य पापी होता है, ध्यान रखो और मन व शरीर से दिनभर इतना कार्य करलो कि वह पूर्णतया थकजाये, जिससे रात्रि में इतनी गाढ़ी निद्रा आये कि मन को स्वप्न देखने का अवसर ही न मिले, तो सर्वथा स्वप्रदोष से बचजावोगे। यथार्थ स्वप्ररहित निद्रा ही तो निद्रा है। यदि हमारी नींद बीच में टूट जाती है तो हमें स्वप्न आते हैं तो यह दशा हमारे आलस्य और प्रमाद को प्रकट करती है। ब्रह्मचारी को स्वप्ररहित एक अटूट निद्रा चाहिये।
ध्यान दें
निद्रा (शयन) आदि के विषय में मेरी ‘जीवनसंदेश’ अथवा ‘ब्रह्मर्चामृत’ नाम की पुस्तिका को ध्यानपूर्वक पढ़ो। जो इससे पूर्व पृथक् प्रकाशित हो चुकी है। इसी प्रकार शौच, स्नान, व्यायाम, भोजन आदि ब्रह्मचर्य के नियमों पर पर्याप्त प्रकाश उसी पुस्तिका में डाला है। उन्हें पुनः लिखना व्यर्थ है। वहीं बार-बार पढ़ो और उनका आचरण करो। ब्रह्मचर्य के सभी नियमों का पालन किए बिना स्वप्रदोषादि रोगों से छुटकारा मिलना असम्भव है।
कुछ भयंकर भ्रम और उनका निवारण
जिन युवकों को मास में अनेक बार स्वप्रदोष हो जाता है, वे इसे दूर करने का यत्न भी करते हैं किन्तु वे जब वीर्यरक्षा में सफल नहीं होते तो यह विचार उन्हें बार-बार तङ्ग करता है कि वीर्य ने तो शरीर में रहना नहीं। इसे तो नष्ट होना ही है। फिर क्यों न इससे विषयभोग (मैथुन) व्यभिचार का आनन्द ले लिया जाये। यह बड़ा भयंकर तथा विनाशकारी भ्रम है। स्वप्न-विज्ञान के वेत्ता लिखते हैं कि बड़े से बड़ा स्वप्न पांच सैकिंड में समाप्त हो जाता है। स्वप्रदोष होते समय अधिक से अधिक पांच सैकिंड ही लगते हैं किन्तु सब प्रकार के अन्य प्राकृतिक मैथुनों वा व्यभिचार में पर्याप्त समय लगता है—यही अनुभवी लेखक लिखते हैं। निष्कर्ष यह
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स्वप्रदोष की चिकित्सा
है कि स्वप्रदोष में तो वह वीर्य जो हजम होने (पचने) से बच जाता है अर्थात् शरीर का अंग नहीं बनता, नष्ट होता वा बाहर निकलता है। किन्तु विषयभोग वा मैथुन से एक भयंकर धक्का सारे शरीर पर लगता है। जो वीर्य शरीर का अंग बन चुका होता है वह पिण्डल-पिण्डलकर पतला होकर निकलता है और स्वप्रदोष की अपेक्षा अधिक मात्रा में निकलता है। मैथुन से स्वप्रदोष की अपेक्षा बहुत अधिक भयंकर हानि होती है। मैथुन से तो स्वप्रदोषों की संख्या और बढ़ जाती है और प्रमेहादि भयङ्कर रोग उत्पन्न होजाते हैं जो मृत्यु का कारण बन जाते हैं। अतः इस भयानक भ्रम में फँस विनाश के गढ़े में पड़कर मृत्यु को न बुलाओ और मैथुनों से सर्वथा दूर रहो।
कई मूर्ख डाक्टर यह कहते हैं कि स्वप्रदोषादि के द्वारा वीर्य का निकल जाना स्वाभाविक है और इससे कोई हानि नहीं होती। यह अत्यन्त मिथ्याकल्पना है। वीर्य की दो गति हैं—(१) अधोगति (नीचे को जाना), (२) ऊर्ध्वगति (ऊपर को जाना)। जिस प्रकार शरीर को रस रक्त आदि अन्य छः धातुवें धारण करती हैं और शरीर का अंग बनजाती हैं, कभी बिना निकाले बाहर नहीं निकलतीं। इसी प्रकार वीर्य जैसा अमूल्य तत्त्व, जो सब धातुओं का सार है, जिसमें आश्चर्यनक शक्ति है, वह मनुष्य की इच्छा और भूल किये बिना बाहर नहीं निकल सकता। वीर्य का शरीर से स्वयं बाहर निकलना तो दूर की बात है, किन्तु (रोग के आतुरिक) मल-मूत्र भी तो बिना इच्छा के बाहर नहीं निकलता। अतः स्वप्रदोष जिसमें अनजाने वीर्य निकलता है, सर्वथा अस्वाभाविक वा रुग्णावस्था है। पूर्ण युवावस्था में शरीर में वीर्य की उत्पत्ति पर्याप्तमात्रा में होती है। जब आरम्भ में कभी-कभी स्वप्रदोष द्वारा शरीर से वीर्य निकलता है तो उससे हानि वा बुरा प्रभाव दिखाई नहीं देता। नया उत्पन्न होनेवाला वीर्य इस थोड़ीसी हानि की पूर्ति कर देता है। मूर्ख मनुष्य यह समझने लगता है—मुझे कोई हानि नहीं हुई। वीर्य के एक बिन्दु का नाश भी हानिकारक है और मृत्यु की ओर लेजानावाला है। जो बालक धार्मिक माता-पिता की सन्तान है आरम्भ से जिसे सदाचार की शिक्षा दीजाती है। सदा सत्सङ्ग तथा अच्छे साथियों के साथ रहता है, शुद्ध और सात्विक भोजन करता है, व्यायाम प्राणायामादि ब्रह्मचर्य के सभी नियमों का पालन करता है, वह सौ वर्ष वा इससे भी अधिक जब तक वह जीवित रहता है, उसे कभी भी स्वप्रदोष नहीं होगा। उसका वीर्य उसके शरीर के अन्दर ही खप जाता है। अर्थात् शारीरिक बल व शक्ति का रूप धारण करता है। उसके वीर्य की सदा ऊर्ध्वगति रहती है। जिस प्रकार जलते हुए दीपक का तैल वर्तिका (बत्ती) के सहारे ऊपर चढ़कर प्रकाश के रूप में बदल जाता है, उसी प्रकार शुद्ध आहार व्यवहार, व्यायाम और प्राणायाम द्वारा यह शरीर का अङ्ग बनकर बल व शक्ति का रूप धारण करता है। अथवा विचाराग्नि में जलकर मस्तिष्क व बुद्धि का रूप धारण करता है और विद्या के
ऊर्ध्वरेता होने की प्राचीनविद्या
( ४४३ )
भण्डार को भरदेता है। निष्कर्ष यह है कि वीर्य शरीर में शक्ति के रूप में रहता है। वीर्य के रूप में नहीं। इसलिए प्राचीनकाल में विद्यार्थी वीर्य की रक्षा करके शारीरिक और मानसिक उन्नति करते थे। अनेक ऋषि महर्षि लोग तो ऊर्ध्वरेता होते थे। अर्थात् आयुभर अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करते थे।
ऊर्ध्वरेता होने की प्राचीनविद्या
ऊर्ध्वरेता होने की एक विशेष विद्या थी। जिससे वीर्य की गति सदा के लिये ऊर्ध्व होजाती थी। उसी विद्या की कुछ झलक व रूपरेखा आदर्श ब्रह्मचारी महर्षि दयानन्द के ग्रन्थों में मिलती है। अनेक वर्ष इसकी खोज तथा अनुभव मैं भी करता रहा हूँ। इसका अनुभव मेरे अनेक ब्रह्मचर्यप्रेमी साथियों ने किया व कराया है। जिसने इसका अनुभव किया उसने ही इसकी मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की। जो इसका दीर्घकाल तक श्रद्धापूर्वक और निरन्तर सेवन करेगा वह निश्चयपूर्वक ऊर्ध्वरेता होजायेगा। उसकी इच्छा के बिना वीर्य का एक बिन्दु भी उसके शरीर से बाहर नहीं निकल सकता। उस विधि का कुछ भाग ब्रह्मचर्यप्रेमियों के लाभार्थ नीचे देता हूँ।
वैदिक पुस्तकालय
यह एक प्राणायाम की विधि है। इसके केवल पढ़नेमात्र से कार्य नहीं चलेगा। ब्रह्मचर्य के अन्य नियमों का पालन करते हुए इस प्राणायाम का प्रतिदिन अभ्यास करना है। आजकल कुसंग तथा कुसंस्कारों के कारण बालक हस्तमैथुन, गुदा-मैथुन, पशु-मैथुन आदि कुटेवों (बुरी आदतों) और पापों में फंसकर बार-बार वीर्य का नाश करते हैं। इससे वीर्य की अधोगति होती है और वह बिना इच्छा के भी स्वप्रदोष आदि के द्वारा बाहर निकलता रहता है, ऐसे बालक सत्संग व स्वाध्याय से हस्तमैथुन आदि कुटेवों को छोड़ देते हैं और वीर्यरक्षा के यत्न करते हैं। किन्तु उनकी इच्छा के विरुद्ध स्वप्रदोष आदि के द्वारा वीर्य निकलता रहता है तो बड़े दुःखी रहते हैं। ऐसे ही गृहस्थ के नाम पर घरेलू व्यवहार करनेवाले नामधारी गृहस्थियों की दुर्दशा होती है। यहां तक कि कितने ही युवक तो हस्तमैथुनादि अप्राकृतिक मैथुनों और स्वप्रदोषादि रोगों से नपुंसक बनजाते हैं। जब एक बालक वा युवक बार-बार कुचेष्टायें वा व्यवहार से वीर्य नष्ट करता है तो उसके शरीर में कई बार उत्तेजना होने से एक भयानक धक्का शरीर को लगता है। कामाग्नि से सारा शरीर जलने लगता है। शरीर के अन्दर जमा और रमा हुआ वीर्य पिंघलने लगता है। जैसे शीत में जमा हुआ घूत अग्नि पर रखने से पिंघलकर पतला होजाता है और पात्र (बर्तन) में छेद होने से बाहर निकल जाता है, इसी प्रकार छोटे-छोटे बालकों में भी छोटीसी आयु में कामाग्नि जल उठती है और उनका वीर्य पतला होकर नीचे बहने लगता है और नाभि के नीचे मलाशय मूत्राशय के समीप जो वीर्य का कोष (खजाना) है उसमें ठहरने लगता है और वीर्य से वीर्यकोष भरजाता है। यह वीर्य
( ४४४ )
स्वप्रदोष की चिकित्सा
फिर लौटकर शरीर में ऊपर को नहीं जाता और स्वप्रदोषादि के द्वारा बाहर निकल जाता है। इसी प्रकार वीर्य का कोष बार-बार भरता और खाली होता रहता है। वह वीर्य जो शरीर का राजा है जिसे शरीर का अङ्ग बनना था, जो २५ वर्ष की आयु से पहले कभी भी वा आयुभर शरीर से बाहर नहीं निकल सकता था तथा जो ऊर्ध्वगति होकर शरीर और मस्तिष्क की शक्ति का रूप धारण करता, आज इच्छा के विरुद्ध शरीर का सार अमृतरूपी वीर्य मूत्र के समान बुरी तरह टपक-टपककर निकल रहा ह। ऐसी अवस्था में बालक और युवक धाड़ मारकर रोते और चिल्लाते हैं।
उनके आंसू पोंछने के लिये यह ऊर्ध्वरेता होने का गुसरहस्य कर्तव्यभावना से लिख रहा हूँ। इसमें शुक्राशय (वीर्य के खजाने) में पड़ा हुआ वीर्य फिर ऊपर को जाने लगेगा, जैसे कि दीपक का तैल जाता है। यह ऋषियों की गुप्तविद्या है। जो आज लाखों रुपये खर्च करने पर नहीं मिलती। कितने ही ब्रह्मचर्य के दीवाने इसकी खोज करने में रात दिन एक कर देते हैं, भयङ्कर से भयङ्कर पर्वतों की गुफाओं और कन्दराओं को छान मारते हैं तब जाकर इसका भेद मिलता है। इसलिये इसको पढ़कर व्यर्थ न समझ लेना, इसका श्रद्धापूर्वक अभ्यास करो। इससे स्वप्रदोषादि रोगों से अवश्य ही पिण्ड छूट जायेगा और वीर्यरक्षा में सफल होजावोगे।
२. प्राणायामविधि
पहले सिद्ध आसन से बैठजाओ। उसकी विधि इस प्रकार है। बायें पैर की एड़ी अण्डकोष और गुदा इन्द्रिय के बीच में जो स्थान है उस पर लगाओ। यह वह स्थान है जहां से वीर्यवाहक नाड़ियां जाती हैं। इन ही में से गुजरकर वीर्य बाहर निकल जाता है। इसलिए पैर की एड़ी को इन नाड़ियों पर दबाकर लगाना चाहिये। दायें पैर की एड़ी मूत्र इन्द्रिय के ऊपर जहां बाल उगते हैं, लगाओ। दोनों पैरों के गट्टे मिले हुए हों। दोनों पैरों के घुटने भूमि पर लगे हुए हों। शिर ग्रीवा (गर्दन), मेरुदण्ड (रीढ़ की हड्डी) सब समरेखा में (सीधी) रहनी चाहिए। एक कपड़े की छोटी गद्दी बनाकर गुदा के नीचे रखलो। जिससे वीर्यवाहक नाड़ियों पर अधिक बल (जोर) पड़े। दोनों हाथों को तानकर दोनों घुटनों पर रखो। शरीर सारा खिंचा हुआ होना चाहिये। छाती तनी हुई तथा आगे को उभरी हुई हो। ठोडी का झुकाव थोड़ासा छाती की ओर हो। केवल लंगोट लगाकर आसन में बैठो तो अच्छा रहेगा। यदि केवलमात्र इस सिद्धासन का ही अभ्यास किया जाये तो यह भी वीर्यरक्षार्थ तथा स्वप्रदोष को दूर करने में अत्यन्त हितकर है।
प्राणायाम करने से पूर्व यदि बायां स्वर चलता हो तो अच्छा है। जिधर से वायु आता हो उधर मुख रखो। जैसे अत्यन्त वेग से वमन (कै) होता है और अन्न जल बाहर निकल जाता है, वैसे ही प्राण (श्वास) को बल से बाहर फेंकदो। एक ही बार, निरन्तर एक श्वास में, सारी वायु बाहर निकल जाय। झटके दे देकर नहीं।
प्राणायामविधि
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श्वास निकलने से पूर्व नाभि के नीचे से मूल इन्द्रिय का ऊपर संकोच करो (खींचो)। पहिले हृदय का वायु बल से बाहर निकालो। फिर ऊपर के फेफड़े का श्वास निकालकर खाली करना चाहिये। फिर उदर (पेट) को खाली करना। किन्तु ध्यान रखो—सारा प्राण एक श्वास में ही बाहर निकलजाये। श्वास तोड़-तोड़कर कभी न निकालो। श्वास को लम्बा करके तथा निरन्तर गति देते हुए एक ही बार बाहर निकालदो। जब श्वास सारा हृदय, फेफड़ों और उदरादि का बाहर निकलजाये तो उदर (पेट) को अन्दर की ओर खींचे रहो। श्वास को यथाशक्ति बाहर ही रोको। जब घबराहट जो तब धीरे-धीरे भीतर वायु को लेलो। किन्तु अन्दर नहीं रोको। यह एक प्राणायाम हुआ।
फिर उसी प्रकार दूसरा प्राणायाम, फिर बाहर निकालकर बाहर ही रोककर करो। इसी प्रकार तीन प्राणायाम करो। अन्दर नहीं रोको। पहिले बाह्यकुम्भक (बाहर रोकने) का ही अभ्यास करो। बाह्यविषय वा बाह्यकुम्भक का अभ्यास कम से कम एक वर्ष तक करना चाहिये। यही पहला प्राणायाम है। जब तक यह सिद्ध न होजाय तब तक दूसरा प्राणायाम (आभ्यन्तर) जो अन्दर रोकने का है (इसे आभ्यन्तर कुम्भक कहते हैं नहीं करना चाहिये। लोग अन्दर और बाहर रोकना दोनों एक साथ आरम्भ करदेते हैं। इसलिए लाभ तथा उन्नति नहीं होती। जब पहिले प्राणायाम में सफलता मिलजाये तब दूसरे का अभ्यास करना चाहिये। एक मास तक तीन प्राणायाम प्रातःकाल करो और तीन प्राणायाम सायंकाल करो। फिर शनैः-शनैः प्रतिमास संख्या बढ़ातेजाओ। यदि गोदुग्ध, घृत वा अन्य पौष्टिकभोजन पर्याप्त खाने को मिले तो दोनों समय अभ्यास करना चाहिये और संख्या बढ़ाते-बढ़ाते इक्कीस (२१) प्राणायाम तक करसकते हैं। पौष्टिकभोजन का अभाव (कमी) हो तो धीरे-धीरे संख्या बढ़ाओ। कभी शक्ति से अधिक न करो, न ही नाक पकड़कर अधिक देर बलात् (जबरदस्ती) रोकने का यत्न करो। इस प्राणायाम में आरम्भ से लेकर अन्त तक एक विशेषक्रिया का ध्यान रखना तथा अभ्यास करना है। श्वास निकलने से पूर्व नाभि के नीचे जो मूलाधार को खींचा था, उसे खींचे ही रखना है। ढीला नहीं छोड़ना और इसे खींचे रखने का तो अभ्यास करना है। जितनी देर वा जितने भी प्राणायाम करो मूलाधार को खींचे ही रखना। पहिले-पहिले कुछ कठिनाई वा कष्ट प्रतीत होगा, किन्तु कुछ दिन के अभ्यास से ठीक हो जावेगा। मूलाधार खींचते समय मन से नाभि के नीचे ध्यान करें कि हम अपने वीर्य को ऊपर खींच रहे हैं। सारे प्राणायाम में यह ही ध्यान करते रहो।
कुछ दिन के अभ्यास से वीर्य ऊपर को यथार्थ में खिंचने तथा जाने लगेगा और जब आप निरन्तर अभ्यास करते-करते इक्कीस (२१) प्राणायाम तक पहुंच जायेंगे तो वीर्य की गति पूर्णतया ऊर्ध्व होजायेगी। वीर्य ऊपर को मस्तिष्क की ओर बहने लगेगा। आप ऊर्ध्वरैता होजायेंगे। आपका वीर्यकोष खाली होजायेगा और
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स्वप्रदाष का चिकित्सा
इसमें वीर्य आना ही बन्द होजायेगा फिर स्वप्रदोष कैसे होगा? आपकी इच्छा के बिना वीर्य का एक बिन्दु भी शरीर से बाहर नहीं निकलसकता। फिर कैसा स्वप्रदोष और प्रमेहरोग? किन्तु यह निरन्तर दीर्घकाल तक श्रद्धापूर्वक अभ्यास करने से होगा। मैं यह कई बार लिखचुका हूँ।
आप इसे दूसरी प्रकार से भलीभाँति समझ जायेंगे। जब आप लघुशंका (पेशब) करने जावों और मूत्र-त्याग (पेशब) करते समय बीच में ही नाभि के नीचे के भाग मूलेन्द्रिय को खींचो तो गुदाइन्द्रिय और मूत्रेन्द्रिय भी एकसाथ खिंचेंगी और इससे मूत्र निकलना एकदम बन्द होजायेगा और जब तक आप इसे ढीला न छोड़ेंगे एक बूंद भी मूत्र बाहर नहीं निकलसकता। यह अनुभव आप करके देखलें या जब कुछ मास तक आप प्राणायाम का अभ्यास करलेंगे और आपको मूलाधार खींचे रहने का अभ्यास पक्का होजायेगा तब आप देखेंगे कि स्वप्नों और स्वप्रदोषों की संख्या स्वयं घटती चलीजायेगी। रात्रि में ऐसी अवस्था भी आयेगी कि आपको स्वप्रदोष होने का अवसर आयेगा तो अर्धनिद्रा में आप मूलाधार को खींच लोगे और आपकी आँखें खुलजायेंगी। आप स्वप्रदोष से बच जावोंगे। आपकी विजय होगी। यदि सोने से पूर्व खालीपेट ही यह प्राणायाम कियाजाय तो शीघ्र लाभ होगा। आपकी विजय और हार आपके अभ्यास पर है। जब कम से कम एक वर्ष तक आप अभ्यास करलें तो आगे का प्राणायाम मुझ से पत्र द्वारा वा मिलकर पूछलें। इस प्राणायाम की जितनी प्रशंसा करें थोड़ी है, सब ऋषियों और विशेषतया पूज्यपाद महर्षि दयानन्द की कृपा है जो ऐसी विद्या इस गिरे हुए संसार को मिली है। इस प्राणायाम के अभ्यास से जहां स्वप्रदोषादिरोग दूर होंगे वहां शरीर में वीर्यवृद्धि को प्राप्त होकर स्थिर बल, पराक्रम और जितेन्द्रियता की प्राप्ति होगी। सब शास्त्र और विद्याओं को थोड़े ही काल में समझकर विद्यार्थी उपस्थित करलेगा। इसका अभ्यास सब युवकों, विद्यार्थियों तथा ब्रह्मचर्यप्रेमियों (स्त्री तथा पुरुषों) को करना चाहिये। इससे मन और इन्द्रियों के सब दोष क्षीण और दूर होजाते हैं और मनुष्य इनको अपने वश में करलेता है। यह वीर्यरक्षा का सर्वोत्तम साधन और परम औषध है।
३-यन्त्र-चिकित्सा
स्वप्रदोष क्षीण और दूर करने के लिये एक यन्त्र भी तैयार किया जाता है। एक लोहे वा पीतल से स्पर्शिंगवाला छल्ला बनता है। जिसके अन्दर स्पर्शिंग लगा होता है। इसके कुछ ऊपर बाहर की ओर चारों ओर छले में ही काटे लगे रहते हैं। स्पर्शिंगवाला छल्ला छोटा बड़ा होसकता है। स्वप्रदोष का रोगी इसे मूत्रेन्द्रिय में पहनकर सोजाता है। जब स्वप्रदोष से पूर्व उत्तेजना होती है, तो काटे मूत्रेन्द्रिय में चुभने से आँखें खुलजाती हैं और स्वप्रदोष से बचजाता है। किन्तु इससे पूर्ण सफलता नहीं मिलती। कुछ लाभ होजाता है। यह किसी मिस्त्री से तैयार कराया जासकता है।
औषध चिकित्सा
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४-जल-चिकित्सा
स्वप्दोष से बचने के लिए प्रतिदिन दोनों समय शीतलजल से स्नान करो। प्रतिदिन सोते समय भी स्नान से बड़ा लाभ होता है।
स्नान के समय नाभि के नीचे शीतलजल की खूब देर तक धार डालो। साथ ही प्रतिदिन जब-जब शौच या लघुशंका करने जावो तो शीतलजल का एक बड़ा पात्र साथ लेजाओ और मूत्रेन्द्रिय के अगले भाग पर छिद्र के ऊपर बारीक धार पांच मिनट तक डालो। यह मूत्रेन्द्रियस्नान सोने से पूर्व भी करो। अण्डकोष और मूत्रेन्द्रिय के आसपास के भागों को भी धोडालो। इससे मसाने में ठण्डक रहेगी। सोने से पूर्व हाथ-पैर, शिर ग्रीवा (गर्दन) धोडालो। इन सब क्रियाओं के करने से ५० प्रतिशत स्वप्रदोष की संख्या घटजाती है। बहुतों का स्वप्नदोष तो सर्वथा इससे ही दूर होगया है।
५-मलाशय और मूत्राशय की शुद्धता
सोने से पूर्व अधिक खाने-पीने से मलाशय तथा मूत्राशय भरजाते हैं और मल-मूत्र का दबाव वीर्यकोष पर पड़ता है। जिससे स्वप्दोष होजाता है। 'एकभुक्त रोगमुक्त' होता है। अतः स्वप्रदोष के रोगी को एक समय भोजन करना चाहिये वा सोने से तीन या चार घण्टे पूर्व थोड़ीसी मात्रा में ताजा गोदुग्ध लेले वा हल्कासा भोजन करे। सोते समय खाली पेट हो। कई युवकों वा बालकों को सोते समय दूध वा जल पीने से ही स्वप्रदोष होने लगता है। अतः सोने से तीन चार घण्टे पूर्व खाना पीना बन्द करदेना चाहिये। बहुत बार तो स्वप्रदोष पेट के भारी होने से तथा खाने-पीने की छोटी-छोटी भूलों से ही होता रहता है। अजीर्ण (कब्ज) कभी न होने दो। अजीर्ण दूर करने के लिये आसन-व्यायाम प्रतिदिन करो। मल-मूत्र के वेग को कभी न रोको। रात्रि को आँख खुलने पर लघुशंका अवश्य करलो। आलस्य न करो। प्रातःकाल ३ व ४ बजे के बीच में उठकर मल-मूत्र का त्याग करो। उस समय सोते रहने से मल-मूत्र से मलाशय और मूत्राशय भरेहुये रहते हैं। उनका वीर्यकोष पर दबाव पड़ने से त्रैर्यनाश होजाता है। मलत्याग (शौच) करने का स्वभाव दोनों समय का बनाओ। पेट में मल पड़े रहने से भी स्वप्रदोष होजाता है।
६-औषध-चिकित्सा
(१) जिनको अजीर्ण रहता है वे चार-छः छटांक त्रिफले को कपड़े में छानकर एक छटांक गोघृत वा बादामरोगन में भिगो और चार छटांक खांड मिलाकर रखलें। रात को यह एक तोला औषध थोडेसे (नाममात्र) गर्मदूध वा ताजेजल के साथ सेवन करें। इससे अजीर्ण तथा प्रमेह भी दूर होता है। कफप्रकृतिवालों के लिये रामबाण है।
(२) सितावर एक छटांक, असगन्ध नागोरी एक छटांक, विधारा के बीज
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स्वप्रदोष की चिकित्सा
एक छटांक (लकड़ी नहीं केवल बीज ही लेने हैं), इन सबको बारीक पीसकर कपड़छान कर लो। इसमें तीन छटांक खांड वा मिसरी मिला लो। यह सबके लिये अत्यन्त आवश्यक है। स्वप्रदोष को यह औषध अवश्यमेव दूर करती है। कितने ही अच्छे-अच्छे वैद्यों ने इसे हजारों बार अनुभव किया है। यह औषध ऐसे युवकों के लिये जो स्कूल वा कालेज आदि में पढ़ते हों वा अविवाहित हों, बहुत ही लाभदायक सिद्ध होता है। किन्तु इतना ध्यान रखना चाहिये यदि स्वप्रदोष का रोगी शरीर से बलवान् है और साथ ही ब्रह्मचारी है जिसके शरीर में वीर्य पर्याप्तमात्रा में है, ऐसे युवक वा विद्यार्थी को स्वप्रदोष वीर्य की अधिकता के कारण हो तो उसे ताजेजल के साथ ही दो वा तीन माशे से अधिक नहीं दें। किन्तु जो रोगी अपने हाथों अपना सर्वनाश कर चुका हो और इसी प्रकार की गुदामैथुनादि कुटेवों के कारण इस स्वप्रदोष को खरीदा हो, उसे पहिले तो सब बुराइयाँ छोड़ देनी चाहिए। फिर वह इस औषध को तीन माशे से छः माशे तक दोनों समय ताजा धारोष्ण गोदुग्ध (ताजा निकले हुए गाय के दूध) के साथ प्रयोग करे। इससे स्वप्रदोष ही दूर नहीं होता इससे शरीर में वीर्य की वृद्धि पर्याप्तमात्रा में होती है। वीर्य गाढ़ा हो जाता है। खूब बल और शक्ति बढ़ती है। यह औषध रामबाण है।
(३) आयुर्वेदिक फार्मसी, गुरुकुल झज्जर ने स्वप्रदोषचिकित्सा के लिये स्वप्रदोषामृत नामक औषध का निर्माण किया है। अनेक रोगियों पर हमने प्रयोग करके देखा है, वह स्वप्रदोष के रोगियों को अत्यन्त लाभदायक सिद्ध हुई है।
७-शीर्षासन तथा व्यायाम
व्यायाम किये बिना वीर्य-रक्षा असम्भव है। व्यायाम से वीर्य शरीर का अङ्ग बन जाता है। स्वप्रदोषादि विकार बहुत कुछ व्यायाम से ही दूर होजाते हैं। व्यायाम में शीर्षासन तो स्वप्रदोष तथा प्रमेह की अच्छूक औषध है। शीर्षासन दस सैकिंड से आरम्भ करके शनैः-शनैः प्रतिदिन बढ़ाये। बढ़ाते समय अपनी शक्ति और भोजन का ध्यान रखें। यह अनुभवसिद्ध है जब शीर्षासन का १० वा १५ मिनट तक अभ्यास होजाता है तो स्वप्रदोष तथा वीर्यसम्बन्धी सभी रोग दूर भाग जाते हैं। स्वास्थ्य आदर्श तथा मुख तेजस्वी होजाता है। बुद्धि और मस्तिष्क की शक्ति की वृद्धि होती है। शीर्षासन सब व्यायामों से पूर्व करो तथा दोनों समय (शौच से पीछे) शिर के नीचे कपड़े की गद्दी रखकर करो। इसकी पूरी विधि किसी पुस्तक में देख लो।
यह लेख संक्षेप से लिखा है, तदर्थ सचेत रहें। किन्तु जो साधन स्वप्रदोष को दूर करने के लिये लिखे हैं वे सुने-सुनाये नहीं अपितु अनेक रोगियों पर अनुभव कियेगये हैं। आप स्वयं परीक्षण करके देखोगे तो सारी आयु ऋषियों के गुण गाते-गाते नहीं थकोगे। यदि कुछ भी विद्यार्थियों वा युवकों ने इस लेख से लाभ उठाया तो मैं अपने को कृतार्थ समझूंगा।
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A circular logo with a blue outer ring and a white inner ring. Inside the inner ring is a circular image of a deity, likely Saraswati, holding a veena and a mridanga. The text 'वैदिक पुस्तकालय' is written in yellow Devanagari script along the top and bottom inner edges of the blue ring.
An illustration of three wooden blocks stacked vertically, representing the three Vedas. The top block is labeled '॥ यजुर्वेद ॥', the middle block is labeled '॥ सामवेद ॥', and the bottom block is labeled '॥ अथर्ववेद ॥'. The background is a fiery red and orange, suggesting a sacred or intense atmosphere.