भारतकोश
स्वप्नदोष चिकित्सा

स्वप्नदोष चिकित्सा

Swapnadosh Chikitsa

स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: Brahmacharya Sangrah · वैदिक पुस्तकालय (उद्गम)

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स्वप्रदोष की चिकित्सा

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गन्दा विचार उत्पन्न हो वा कामुकता के विचार आर्यें। भय, चिन्ता, क्रोध और शोक आदि के विचार भी स्वप्रदोष के कारण हैं। अपने विचारों को सदा दूर रखो, मन में भी निर्बलता न आने दो, काम, क्रोध आदि के विचार मनुष्य शरीर में उत्तेजना और उष्णता उत्पन्न करते हैं और उसका परिणाम वीर्यनाश है। जब उत्तेजना होती है, तो सब स्यायुतन्तुओं में तनाव उत्पन्न होता है, काम-तन्तु उत्तेजित होजाते हैं। मूत्रेन्द्रिय में रक्त (खून) उतर आता है और इसका आकार लम्बाई, मोटाई बढ़जाती है। इस प्रकार की उत्तेजना काम क्रोध तथा चिन्ता आदि के विचारों और स्वप्नों से उत्पन्न होती है। यह उत्तेजना चाहे जागृतावस्था में हो वा स्वप्नावस्था में हो, वीर्यनाश तथा स्वप्रदोष का कारण ही बनती है। उत्तेजना होने के पीछे ही स्वप्न आता है। वा स्वप्न के पीछे उत्तेजना होती है। निष्कर्ष यह है—चाहे स्वप्न पहले हो वा उत्तेजना पहले हो, बिना उत्तेजना के स्वप्रदोष वा वीर्यनाश नहीं होता। काम, क्रोध, भय और चिन्ता आदि के विचार उत्तेजना के (जनक) कारण हैं। ऐसे विचार को उत्पन्न न होने देना ही स्वप्रदोष की सबसे भारी औषध है। भय शोक तथा चिन्ता आदि को अपने पास न फटकने दो। सदैव प्रसन्न (खुश) रहो। मन में निर्बलता न आने दो।

स्वप्रदोष हानिकारक तथा बुरा है। किन्तु स्वप्रदोषों ॐ देखकर चिन्ता करना व घबराना इससे भी बुरा है, चिन्ता करने से इनकी संख्या घटती नहीं, बढ़ जाती है। इसलिये युवको! घबराओ नहीं। स्वप्रदोष की चिन्ता करना इसे पुनः बुलाना है। यदि एक खिलाड़ी किसी साम्मुख्य (मैच) में दौड़ लगाता हुआ गिरजाय तो क्या उसे वहां पड़े रहकर रोने लग जाना चाहिये? नहीं, वहां बैठकर रोना अपना समय खोना है। जो उसी समय उठकर भागने लगता है मानो वह गिरा ही नहीं। प्रिययुवक! तू बार-बार क्या यदि हजार बार गिरचुका है तो भी घबरा नहीं। यह मत समझ कि सदा गिरा ही रहेगा। चिन्ता छोड़। घबराना कायर और हिजड़े का काम है। तू ब्रह्मचारी है। ईश्वर पर विश्वास कर, वह हमारे सत्कर्मों में सहायक है। “अजैष्माद्य-मैं आज जीतूंगा”-इस भावना को दृढ़ कर, रोने धोने से कुछ नहीं बनता। तू प्रभु का अमृतपुत्र है। उसने यह वीर्य जो तेरे शरीर का सार व अमूल्य रत्न है, मल-मूत्र के समान बाहर निकालने के लिये नहीं बनाया। यह सञ्जीवनी शक्ति तेरे शरीर का अंग है। यदि तू भूल न करे तो यह कभी बाहर नहीं निकल सकता।

वह परमेश्वर निराशों की आशा है। उसे किसी अवस्था में मत भूल। जिस प्रकार प्रातःकाल का किया हुआ भोजन हमें सायंकाल तक कार्य करने की शक्ति देता है और सायंकाल का भोजन रातभर के लिये शक्ति प्रदान करता है, उसी प्रकार प्रातःकाल का किया हुआ सन्ध्या-भजन व ईश्वर-चिन्तन सायंकाल तक बुरे विचारों तथा पापों से बचाता है और सायंकाल की हुई ईश्वर-उपासना रात्रिभर पापों और गन्दे विचारों तथा स्वप्नों से बचाती है। जिस प्रकार हम अपने माता-पिता के