भारतकोश
स्वप्नदोष चिकित्सा

स्वप्नदोष चिकित्सा

Swapnadosh Chikitsa

स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: Brahmacharya Sangrah · वैदिक पुस्तकालय (उद्गम)

DevanagariHindipublished14 पृष्ठ

पृष्ठ 8, कुल 14 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 8

ऊर्ध्वरेता होने की प्राचीनविद्या

( ४४३ )

भण्डार को भरदेता है। निष्कर्ष यह है कि वीर्य शरीर में शक्ति के रूप में रहता है। वीर्य के रूप में नहीं। इसलिए प्राचीनकाल में विद्यार्थी वीर्य की रक्षा करके शारीरिक और मानसिक उन्नति करते थे। अनेक ऋषि महर्षि लोग तो ऊर्ध्वरेता होते थे। अर्थात् आयुभर अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करते थे।

ऊर्ध्वरेता होने की प्राचीनविद्या

ऊर्ध्वरेता होने की एक विशेष विद्या थी। जिससे वीर्य की गति सदा के लिये ऊर्ध्व होजाती थी। उसी विद्या की कुछ झलक व रूपरेखा आदर्श ब्रह्मचारी महर्षि दयानन्द के ग्रन्थों में मिलती है। अनेक वर्ष इसकी खोज तथा अनुभव मैं भी करता रहा हूँ। इसका अनुभव मेरे अनेक ब्रह्मचर्यप्रेमी साथियों ने किया व कराया है। जिसने इसका अनुभव किया उसने ही इसकी मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की। जो इसका दीर्घकाल तक श्रद्धापूर्वक और निरन्तर सेवन करेगा वह निश्चयपूर्वक ऊर्ध्वरेता होजायेगा। उसकी इच्छा के बिना वीर्य का एक बिन्दु भी उसके शरीर से बाहर नहीं निकल सकता। उस विधि का कुछ भाग ब्रह्मचर्यप्रेमियों के लाभार्थ नीचे देता हूँ।

वैदिक पुस्तकालय

यह एक प्राणायाम की विधि है। इसके केवल पढ़नेमात्र से कार्य नहीं चलेगा। ब्रह्मचर्य के अन्य नियमों का पालन करते हुए इस प्राणायाम का प्रतिदिन अभ्यास करना है। आजकल कुसंग तथा कुसंस्कारों के कारण बालक हस्तमैथुन, गुदा-मैथुन, पशु-मैथुन आदि कुटेवों (बुरी आदतों) और पापों में फंसकर बार-बार वीर्य का नाश करते हैं। इससे वीर्य की अधोगति होती है और वह बिना इच्छा के भी स्वप्रदोष आदि के द्वारा बाहर निकलता रहता है, ऐसे बालक सत्संग व स्वाध्याय से हस्तमैथुन आदि कुटेवों को छोड़ देते हैं और वीर्यरक्षा के यत्न करते हैं। किन्तु उनकी इच्छा के विरुद्ध स्वप्रदोष आदि के द्वारा वीर्य निकलता रहता है तो बड़े दुःखी रहते हैं। ऐसे ही गृहस्थ के नाम पर घरेलू व्यवहार करनेवाले नामधारी गृहस्थियों की दुर्दशा होती है। यहां तक कि कितने ही युवक तो हस्तमैथुनादि अप्राकृतिक मैथुनों और स्वप्रदोषादि रोगों से नपुंसक बनजाते हैं। जब एक बालक वा युवक बार-बार कुचेष्टायें वा व्यवहार से वीर्य नष्ट करता है तो उसके शरीर में कई बार उत्तेजना होने से एक भयानक धक्का शरीर को लगता है। कामाग्नि से सारा शरीर जलने लगता है। शरीर के अन्दर जमा और रमा हुआ वीर्य पिंघलने लगता है। जैसे शीत में जमा हुआ घूत अग्नि पर रखने से पिंघलकर पतला होजाता है और पात्र (बर्तन) में छेद होने से बाहर निकल जाता है, इसी प्रकार छोटे-छोटे बालकों में भी छोटीसी आयु में कामाग्नि जल उठती है और उनका वीर्य पतला होकर नीचे बहने लगता है और नाभि के नीचे मलाशय मूत्राशय के समीप जो वीर्य का कोष (खजाना) है उसमें ठहरने लगता है और वीर्य से वीर्यकोष भरजाता है। यह वीर्य