भारतकोश
स्वप्नदोष चिकित्सा

स्वप्नदोष चिकित्सा

Swapnadosh Chikitsa

स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: Brahmacharya Sangrah · वैदिक पुस्तकालय (उद्गम)

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स्वप्रदोष की चिकित्सा

महीँ हुआ। बहुत दिन तक आसन और प्राणायाम किये। किन्तु अपनी प्रतिज्ञा में असफल हुआ। मैं सन्ध्या और हवन भी काफ़ी करता हूँ और मन को भी काफ़ी शुद्ध किया। जब मैं जागता हूँ तो मन ठीक रहता है किन्तु स्वप्न में खराब होजाता है। कई बार तो वीर्य निकल जाता है, तो मरने को जी चाहता है। श्रीमान् जी आपका अहसान मेरे से कभी भूला नहीं जासकता यदि आप मुझको इस बीमारी से बचा दें। श्रीमान् जी की बड़ी कृपा होगी।

इस रोग को दूर करने के उपायों पर कभी विस्तारपूर्वक लिखा जावेगा। किन्तु अब तो संक्षेप से लिखने के लिये विवश हूँ। जिन कारणों और भूलों से स्वप्रदोष का भयंकर रोग आ चिपटता है, उनको दूर करदो, यह स्वयं भाग जायेगा। इसको लोग जितना भयंकर समझते हैं यह उतना भयानक नहीं। कुछ उपाय तथा नियम हैं। यदि इनका सावधानी से पालन किया जाये तो जीवनभर कभी भी स्वप्रदोष नहीं होसकता। हमने इन्हें कितने ही युवकों और विद्यार्थियों पर बार-बार अनुभव किया वा आजमाया है, जिसने जितनी सावधानी और तत्परता से इन नियमों का पालन किया उसको उतनी ही सफलता मिली। कई बार तो छोटी-छोटी भूलों से ही युवकों को स्वप्रदोष होता रहता है।

इस रोग को दूर करने के उपाय और चिकित्सा:-

१. दुष्टविचारों का परित्याग

मनुष्य का मन चित्र खींचनेवाले कैमरे के समान है। जो भी वस्तु चित्र खींचते समय कैमरे के सामने आता है उसी का चित्र खिंच जाता है। यही अवस्था मन की है। जैसी बातें मनुष्य कानों से सुनता तथा मुख से कहता और जैसे कार्य आँखों से देखता वा अन्य इन्द्रियों वा शरीर से करता है, वैसे ही चित्र हमारा मनरूपी कैमरा खींचता रहता है। हमारी प्रत्येक क्रिया व विचार की छाप हमारे मन पर लगती रहती है। जैसे फोटोग्राफर अनेक प्रकार के चित्रों की प्लेट्स (छापें) एकत्रित (इकट्ठी) करता है, उसी प्रकार मनुष्य भी जैसे-जैसे कार्य करता रहता है वैसी-वैसी प्लेट्स (चित्र) हमारा मन भी संग्रह करता रहता है और हमें पता भी नहीं चलता। जब हमारा मन जागृत वा स्वप्न-अवस्था में कार्यरहित (खाली) रहता है तो फिर उन्हीं संग्रह किए हुए चित्रों की देख पड़ताल करता है। हम सारे दिन अशूल (गन्दे) विचारों में डूबे रहते हैं। अतः हमें स्वप्न भी गन्दे ही आते हैं। जागते हुए मुख से कहा वा कानों से सुना हुआ एक अशूल (गन्दा) शब्द भी अनेक अपवित्र संस्कारों की याद दिलाता है और हमारे नाश का कारण बनता है।

प्रियपाठक! नुझे क्षमा करें। मैं पूछता हूँ कि क्या कभी आपको मूत्र (पेशाब) पीने व मल (पाखाना) खाने का स्वप्न भी आया है? आप सबका उत्तर यही होगा कि नहीं, कभी नहीं। कारण मूत्र पीने व मल खाने की वस्तु नहीं। इनके

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