तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 194, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें१८८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ व्यक्तिः । एवं पूर्वस्याः पूर्वस्या | अभिव्यक्ति होती है । इस प्रकार भूमेरुत्तरस्यामुत्तरस्यां भूमौ | पूर्व-पूर्व भूमिकी अपेक्षा आगे-आगे- प्रसादविशेषतः शतगुणेनानन्दो- | की भूमिमें प्रसादकी विशेषता होने- त्कर्ष उपपद्यते । | से सौ-सौ गुने आनन्दका उत्कर्ष | होना सम्भव ही है । प्रथमं त्वकामहताग्रहणं मनु- | [ आगेके सब वाक्योंके साथ | रहनेवाला ] 'श्रोत्रियस्य चाकामह- ष्यविषयभोगकामानभिहतस्य | तस्य' यह वाक्य पहले [ मानुष | आनन्दके साथ ] इसलिये ग्रहण श्रोत्रियस्य मनुष्यानन्दाच्छत- | नहीं किया गया कि विषय-भोग | और कामनाओंसे व्याकुल न रहने- गुणेनानन्दोत्कर्षो मनुष्यगन्धर्वेण | वाले श्रोत्रियके आनन्दका उत्कर्ष | मानुष आनन्दकी अपेक्षा सौ गुना | अर्थात् मनुष्यगन्धर्वके आनन्दके तुल्यो वक्तव्य इत्येवमर्थम् । | तुल्य बतलाना है । श्रुतिमें 'साधु- | युवा' और 'अध्यायक' ये दो विशेषण साधुयुवाध्यायक इति श्रोत्रिय- | [ सार्वभौम राजाका ] श्रोत्रियत्व | और निष्पापत्व प्रदर्शित करनेके त्वावृजिनत्वे गृह्येते । ते ह्यवि- | लिये ग्रहण किये जाते हैं । इन्हें | आगे भी सबके साथ समानभावसे शिष्टे सर्वत्र । अकामहतत्वं तु | समझना चाहिये । विषयके उत्कर्ष | और अपकर्षसे सुखका भी उत्कर्ष | और अपकर्ष होता है [ किन्तु विषयोत्कर्षापकर्षतः सुखोत्कर्षा- | कामनारहित पुरुषके लिये सुखका | उत्कर्ष या अपकर्ष हुआ नहीं पकर्षाय विशेष्यते । अतोऽकाम- | करता ] इसीलिये अकामहतत्वकी | विशेषता है । और इसीसे | 'अकामहत' पद ग्रहण किया गया हतग्रहणम्, तद्विशेषतः शतगुण- | है । अतः उससे विशिष्ट पुरुषके CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri