तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 193, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८७
सर्वा वित्तस्य वित्तेनोपभोगसाध- | उपभोगके साधनसे तथा लौकिक नेन दृष्टार्थेनादृष्टार्थेन च कर्म- | और पारलौकिक कर्मके साधनसे साधनेन संपन्ना पूर्णा राजा | सम्पन्न सम्पूर्ण पृथिवी हो—अर्थात् पृथिवीपतिरित्यर्थः । तस्य च य | जो राजा यानी पृथिवीपति हो; आनन्दः स एको मानुषो मनु- | उसका जो आनन्द है वह एक ष्याणां प्रकृष्ट एक आनन्दः । | मानुष आनन्द यानी मनुष्योंका एक प्रकृष्ट आनन्द है। ते ये शतं मानुषा आनन्दाः | ऐसे जो सौ मानुष आनन्द हैं स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः। | वही मनुष्य-गन्धर्वोंका एक आनन्द मानुषानन्दाच्छतगुणेनोत्कृष्टो | है। मानुष आनन्दसे मनुष्य-गन्धर्वों- मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दो भवति । | का आनन्द सौ गुना उत्कृष्ट होता मनुष्याः सन्तः कर्मविद्याविशेषा- | है। जो पहले मनुष्य होकर फिर द्वन्धर्वत्वं प्राप्ता मनुष्यगन्धर्वाः । | कर्म और उपासनाकी विशेषतासे ते ह्यन्तर्धानादिशक्तिसंपन्नाः | गन्धर्वत्वको प्राप्त हुए हैं वे मनुष्य- सूक्ष्मकार्यकरणाः । तस्मात्प्रति- | गन्धर्व कहलाते हैं। वे अन्तर्धानादि- घाताल्पत्वं तेषां द्वन्द्वप्रतिघात- | की शक्तिसे सम्पन्न तथा सूक्ष्म शरीर शक्तिसाधनसंपत्तिश्च । ततो- | और इन्द्रियोंसे युक्त होते हैं, इसलिये ऽप्रतिहन्यमानस्य प्रतीकारवतो | उन्हें [शीतोष्णादि द्वन्द्वोंका] थोड़ा मनुष्यगन्धर्वस्य स्याच्चित्तप्रसादः। | प्रतिघात होता है तथा वे तत्प्रसादविशेषात्सुखविशेषाभि- | द्वन्द्वोंका सामना करनेवाले सामर्थ्य | और साधनसे सम्पन्न होते हैं। | अतः उस शीतोष्णादि द्वन्द्वसे | प्रतिहत न होनेवाले तथा [उसका | आघात होनेपर] उसका प्रतीकार | करनेमें समर्थ मनुष्यगन्धर्वको चित्त- | प्रसाद प्राप्त होता है और उस | प्रसादविशेषसे उसके सुखविशेषकी
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