तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 192, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें१८६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
[संस्कृत-मूल/भाष्य] द्यते । स एवाविद्याकामकर्मोप- कर्षेण मनुष्यगन्धर्वाद्युत्तरोत्तर- भूमिष्वकामहतविद्वच्छ्रोत्रियप्र- त्यक्षो विभाव्यते शतगुणोत्तरो- त्तरोत्कर्षेण यावद्धिरण्यगर्भस्य ब्रह्मण आनन्द इति । निरस्ते त्वविद्याकृते विषयविषयिविभागे विद्यया स्वाभाविकः परिपूर्ण एक आनन्दोऽद्वैतो भवतीत्येत- मर्थं विभावयिष्यन्नाह । युवा प्रथमवयाः साधुयुवेति साधुश्चासौ युवा चेति यूनो विशेषणम् । युवाप्यसाधुर्भवति साधुरप्ययुवातो विशेषणं युवा स्यात्साधुयुवेति । अध्यापको- ऽधीतवेदः । आशिष्ठ आशास्तृ- तमः । द्रढिष्ठो दृढतमः । बलिष्ठो बलवत्तमः । एवमाध्यात्मिक- साधनसंपन्नः । तस्येयं पृथिव्युर्वी
[हिन्दी-अनुवाद] आनन्द हो जाता है । कामनाओंसे पराभूत न होनेवाले विद्वान् श्रोत्रिय- को प्रत्यक्ष अनुभव होनेवाला वह ब्रह्मानन्द ही मनुष्य-गन्धर्व आदि आगे-आगेकी भूमियोंमें हिरण्यगर्भ- पर्यन्त अविद्या, कामना और कर्मका ह्रास होनेसे उत्तरोत्तर सौ-सौ गुने उत्कर्षसे आविर्भूत होता है । तथा विद्याद्वारा अविद्याजनित विषय-विषयी- विभागके निवृत्त हो जानेपर वह स्वाभाविक परिपूर्ण एक और अद्वैत आनन्द हो जाता है--इसी अर्थको समझानेके लिये श्रुति कहती है- जो युवा अर्थात् पूर्ववयस्क, साधुयुवा अर्थात् जो साधु भी हो और युवा भी—इस प्रकार साधुयुवा शब्द 'युवा' का विशेषण है; लोकमें युवा भी असाधु हो सकता है और साधु भी अयुवा हो सकता है, इसीलिये 'जो युवा हो—साधुयुवा हो' इस प्रकार विशेषणरूपसे कहा है। तथा अध्यापक—वेद पढ़ा हुआ, आशिष्ठ—अत्यन्त आशावान्, द्रढिष्ठ—अत्यन्त दृढ और बलिष्ठ— अति बलवान् हो; इस प्रकार जो इन आध्यात्मिक साधनोंसे सम्पन्न हो; और उसीकी, यह धनसे अर्थात्
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri