तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 191, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८५
तस्यास्य ब्रह्मण आनन्दस्यैषा | उस इस ब्रह्मके आनन्दकी यह ब्रह्मानन्दा-लोचनम् मीमांसा विचारणा | मीमांसा—विचारणा है । उस भवति । किमान- | आनन्दकी क्या बात विचारणीय है, न्दस्य मीमांस्यमित्युच्यते । | इसपर कहते हैं—‘क्या वह किमानन्दो विषयविषयिसंबन्ध- | आनन्द लौकिक सुखकी भाँति जनितो लौकिकानन्दवदाहोस्चित् | विषय और विषयको ग्रहण करने- स्वाभाविक इत्येवमेषानन्दस्य | वालेके सम्बन्धसे होनेवाला है अथवा स्वाभाविक ही है ?’ इस प्रकार यही मीमांसा । | उस आनन्दकी मीमांसा है । तत्र लौकिक आनन्दो बाह्या- | उसमें जो लौकिक आनन्द बाह्य ध्यात्मिकसाधनसंपत्तिनिमित्त | और शारीरिक साधन-सम्पत्तिके कारण उत्कृष्ट गिना जाता है उत्कृष्टः । स य एष निर्दिश्यते | ब्रह्मानन्दके ज्ञानके लिये यहाँ ब्रह्मानन्दानुगमार्थम् । अनेन हि | उसीका निर्देश किया जाता है । प्रसिद्धेनानन्देन व्यावृत्तविषय- | इस प्रसिद्ध आनन्दके द्वारा ही जिसकी बुद्धि विषयोंसे हटी हुई बुद्धिगम्य आनन्दोऽनुगन्तुं | है उस ब्रह्मवेत्ताको अनुभव होनेवाले शक्यते । | आनन्दका ज्ञान हो सकता है । लौकिकोऽप्यानन्दो ब्रह्मानन्द- | लौकिक आनन्द भी ब्रह्मानन्दका स्यैव मात्रा अविद्या तिरस्क्रिय- | ही अंश है । अविद्यासे विज्ञानके माणे विज्ञान उत्कृष्यमाणायां | तिरस्कृत हो जानेपर और अविद्याका चाविद्यायां ब्रह्मादिभिः कर्म- | उत्कर्ष होनेपर प्राक्तन कर्मवश विषयादि साधनोंके सम्बन्धसे ब्रह्मा वशाद्यथाविज्ञानं विषयादिसा- | आदि जीवोंद्वारा अपने-अपने विज्ञाना- धनसंबन्धवशाच्च विभाव्यमानश्च | नुसार भावना किया जानेके कारण लोकेऽनवस्थितो लौकिकः संप- | ही वह लोकमें अस्थिर और लौकिक