तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 190, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें१८४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ वह अकामहत श्रोत्रियको भी प्राप्त है। कर्मदेव देवताओंके जो सौ आनन्द हैं वही देवताओंका एक आनन्द है और वह अकामहत श्रोत्रियको भी प्राप्त है। देवताओंके जो सौ आनन्द हैं वही इन्द्रका एक आनन्द है ॥ ३ ॥ तथा वह अकामहत श्रोत्रियको भी प्राप्त है। इन्द्रके जो सौ आनन्द हैं वही बृहस्पतिका एक आनन्द है और वह अकामहत श्रोत्रियको भी प्राप्त है। बृहस्पतिके जो सौ आनन्द हैं वही प्रजापतिका एक आनन्द है और वह अकामहत श्रोत्रियको भी प्राप्त है। प्रजापतिके जो सौ आनन्द हैं वही ब्रह्माका एक आनन्द है और वह अकामहत श्रोत्रियको भी प्राप्त है ॥ ४ ॥ भीषा भयेनास्माद्वातः पवते । इसकी भीति अर्थात् भयसे वायु चलता है, इसीकी भीतिसे सूर्य भीषोदेति सूर्यः ब्रह्मानुशासनम् उदित होता है और इसके भयसे भीषास्मादग्निश्चेन्द्रश्च ही अग्नि, इन्द्र तथा पाँचवाँ¹ मृत्यु मृत्युर्धावति पञ्चम इति । वाता- दौड़ता है । वायु आदि देवगण परमपूजनीय और स्वयं समर्थ होने- दयो हि महार्हाः स्वयमीश्वराः पर भी अत्यन्त श्रमसाध्य चलने सन्तः पवनादिकार्येष्वनायासबहु- आदिके कार्यमें नियमानुसार प्रवृत्त हो रहे हैं । यह बात उनका कोई लेषु नियताः प्रवर्तन्ते । तद्युक्तं शासक होनेपर ही सम्भव है । प्रशास्तरि सति; यस्मान्नियमेन क्योंकि उनकी नियमसे प्रवृत्ति होती है इसलिये उनके भयका कारण और तेषां प्रवर्तनम् । तस्मादस्ति भय- उनपर शासन करनेवाला ब्रह्म है । कारणं तेषां प्रशास्तृ ब्रह्म । जिस प्रकार राजाके भयसे सेवक लोग अपने-अपने कामोंमें लगे रहते यतस्ते भृत्या इव राज्ञोऽस्मा- हैं उसी प्रकार वे इस ब्रह्मके भयसे द्ब्रह्मणो भयेन प्रवर्तन्ते । तच्च प्रवृत्त होते हैं, वह उनके भयका भयकारणमानन्दं ब्रह्म । कारण ब्रह्म आनन्दस्वरूप है । १. पूर्वोक्त वायु आदिके क्रमसे गणना किये जानेपर पाँचवाँ होनेके कारण मृत्युको पाँचवाँ कहा है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri