तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८७
सर्वा वित्तस्य वित्तेनोपभोगसाध- | उपभोगके साधनसे तथा लौकिक नेन दृष्टार्थेनादृष्टार्थेन च कर्म- | और पारलौकिक कर्मके साधनसे साधनेन संपन्ना पूर्णा राजा | सम्पन्न सम्पूर्ण पृथिवी हो—अर्थात् पृथिवीपतिरित्यर्थः । तस्य च य | जो राजा यानी पृथिवीपति हो; आनन्दः स एको मानुषो मनु- | उसका जो आनन्द है वह एक ष्याणां प्रकृष्ट एक आनन्दः । | मानुष आनन्द यानी मनुष्योंका एक प्रकृष्ट आनन्द है। ते ये शतं मानुषा आनन्दाः | ऐसे जो सौ मानुष आनन्द हैं स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः। | वही मनुष्य-गन्धर्वोंका एक आनन्द मानुषानन्दाच्छतगुणेनोत्कृष्टो | है। मानुष आनन्दसे मनुष्य-गन्धर्वों- मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दो भवति । | का आनन्द सौ गुना उत्कृष्ट होता मनुष्याः सन्तः कर्मविद्याविशेषा- | है। जो पहले मनुष्य होकर फिर द्वन्धर्वत्वं प्राप्ता मनुष्यगन्धर्वाः । | कर्म और उपासनाकी विशेषतासे ते ह्यन्तर्धानादिशक्तिसंपन्नाः | गन्धर्वत्वको प्राप्त हुए हैं वे मनुष्य- सूक्ष्मकार्यकरणाः । तस्मात्प्रति- | गन्धर्व कहलाते हैं। वे अन्तर्धानादि- घाताल्पत्वं तेषां द्वन्द्वप्रतिघात- | की शक्तिसे सम्पन्न तथा सूक्ष्म शरीर शक्तिसाधनसंपत्तिश्च । ततो- | और इन्द्रियोंसे युक्त होते हैं, इसलिये ऽप्रतिहन्यमानस्य प्रतीकारवतो | उन्हें [शीतोष्णादि द्वन्द्वोंका] थोड़ा मनुष्यगन्धर्वस्य स्याच्चित्तप्रसादः। | प्रतिघात होता है तथा वे तत्प्रसादविशेषात्सुखविशेषाभि- | द्वन्द्वोंका सामना करनेवाले सामर्थ्य | और साधनसे सम्पन्न होते हैं। | अतः उस शीतोष्णादि द्वन्द्वसे | प्रतिहत न होनेवाले तथा [उसका | आघात होनेपर] उसका प्रतीकार | करनेमें समर्थ मनुष्यगन्धर्वको चित्त- | प्रसाद प्राप्त होता है और उस | प्रसादविशेषसे उसके सुखविशेषकी
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१८८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१८८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ व्यक्तिः । एवं पूर्वस्याः पूर्वस्या | अभिव्यक्ति होती है । इस प्रकार भूमेरुत्तरस्यामुत्तरस्यां भूमौ | पूर्व-पूर्व भूमिकी अपेक्षा आगे-आगे- प्रसादविशेषतः शतगुणेनानन्दो- | की भूमिमें प्रसादकी विशेषता होने- त्कर्ष उपपद्यते । | से सौ-सौ गुने आनन्दका उत्कर्ष | होना सम्भव ही है । प्रथमं त्वकामहताग्रहणं मनु- | [ आगेके सब वाक्योंके साथ | रहनेवाला ] 'श्रोत्रियस्य चाकामह- ष्यविषयभोगकामानभिहतस्य | तस्य' यह वाक्य पहले [ मानुष | आनन्दके साथ ] इसलिये ग्रहण श्रोत्रियस्य मनुष्यानन्दाच्छत- | नहीं किया गया कि विषय-भोग | और कामनाओंसे व्याकुल न रहने- गुणेनानन्दोत्कर्षो मनुष्यगन्धर्वेण | वाले श्रोत्रियके आनन्दका उत्कर्ष | मानुष आनन्दकी अपेक्षा सौ गुना | अर्थात् मनुष्यगन्धर्वके आनन्दके तुल्यो वक्तव्य इत्येवमर्थम् । | तुल्य बतलाना है । श्रुतिमें 'साधु- | युवा' और 'अध्यायक' ये दो विशेषण साधुयुवाध्यायक इति श्रोत्रिय- | [ सार्वभौम राजाका ] श्रोत्रियत्व | और निष्पापत्व प्रदर्शित करनेके त्वावृजिनत्वे गृह्येते । ते ह्यवि- | लिये ग्रहण किये जाते हैं । इन्हें | आगे भी सबके साथ समानभावसे शिष्टे सर्वत्र । अकामहतत्वं तु | समझना चाहिये । विषयके उत्कर्ष | और अपकर्षसे सुखका भी उत्कर्ष | और अपकर्ष होता है [ किन्तु विषयोत्कर्षापकर्षतः सुखोत्कर्षा- | कामनारहित पुरुषके लिये सुखका | उत्कर्ष या अपकर्ष हुआ नहीं पकर्षाय विशेष्यते । अतोऽकाम- | करता ] इसीलिये अकामहतत्वकी | विशेषता है । और इसीसे | 'अकामहत' पद ग्रहण किया गया हतग्रहणम्, तद्विशेषतः शतगुण- | है । अतः उससे विशिष्ट पुरुषके CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८९ सुखोत्कर्षोपलब्धेरकामहतत्वस्य | सुखका सौगुना उत्कर्ष देखा जाता | है; अतः अकामहतत्वको परमानन्द- परमानन्दप्राप्तिसाधनत्वविधाना- | की प्राप्तिका साधन बतलानेके लिये | 'अकामहत' विशेषण ग्रहण किया र्थम् । व्याख्यातमन्यत् । | है । और सबक़ी व्याख्या पहले की | जा चुकी है । देवगन्धर्वा जातित एव । | देवगन्धर्व—जो जन्मसे ही गन्धर्व चिरलोकलोकानामिति पितॄणां | हों 'चिरलोकलोकानाम्' ( चिरस्थायी विशेषणम् । चिरकालस्थायी | लोकमें रहनेवाले ) यह पितृगणका लोको येषां पितॄणां ते चिर- | विशेषण है । जिन पितृगणका लोकलोका इति । आजान इति | चिरस्थायी लोक है वे चिरलोक- देवलोकस्तस्मिन्नाजाने जाता आ- | लोक कहे जाते हैं । 'आजान' जानजा देवाः स्मार्तकर्मविशेषतो | देवलोकका नाम है, उस आजानमें देवस्थानेषु जाताः । | जो उत्पन्न हुए हैं वे देवगण | 'आजानज' हैं, जो कि स्मार्त्त कर्म- | विशेषके कारण देवस्थानमें उत्पन्न | हुए हैं । कर्मदेवा ये वैदिकेन कर्मणा- | जो केवल अग्निहोत्रादि वैदिक ग्निहोत्रादिना केवलेन देवान- | कर्मसे देवभावको प्राप्त हुए हैं वे पियन्ति । देवा इति त्रयस्त्रिंश- | 'कर्मदेव' कहलाते हैं । जो तैंतीस द्धविर्भुजः । इन्द्रस्तेषां स्वामी | देवगण यज्ञमें हविर्भाग लेनेवाले हैं तस्याचार्यो बृहस्पतिः । प्रजा- | वे ही यहाँ 'देव' शब्दसे कहे गये हैं । पतिर्विराट् । त्रैलोक्यशरीरो ब्रह्मा | उनका स्वामी इन्द्र है और इन्द्रका समष्टिव्यष्टिरूपः संसारमण्डल- | गुरु बृहस्पति है । 'प्रजापति' का व्यापी । | अर्थ विराट् है, तथा त्रैलोक्यशरीर- | धारी ब्रह्मा है जो समष्टि-व्यष्टिरूप | और समस्त संसारमण्डलमें व्याप्त है । यत्रैत आनन्दभेदा एकतां | जहाँ ये आनन्दके भेद एकताको | प्राप्त होते हैं [ अर्थात् एक गच्छन्ति धर्मश्च तन्निमित्तो ज्ञानं | ही गिने जाते हैं ] तथा जहाँ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
१९० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१९० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ च तद्विषयमकामहतत्वं च नि- | उससे होनेवाले धर्म एवं ज्ञान तथा | तद्विषयक अकामहतत्व सबसे बढ़े रतिशयं यत्र स एष हिरण्यगर्भो | हुए हैं वह यह हिरण्यगर्भ ही ब्रह्मा ब्रह्मा, तस्यैष आनन्दः श्रोत्रि- | है। उसका यह आनन्द श्रोत्रिय, | निष्पाप और अकामहत पुरुषद्वारा येणावृजिनेनाकामहतेन च सर्वतः | सर्वत्र प्रत्यक्ष उपलब्ध किया जाता | है। इससे यह जाना जाता है कि प्रत्यक्षमुपलभ्यते । तस्मादेतानि | [ निष्पापत्व, अकामहतत्व और | श्रोत्रियत्व ] ये तीन उसके साधन त्रीणि साधनानीत्यवगम्यते । | हैं। इनमें श्रोत्रियत्व और निष्पापत्व तत्र श्रोत्रियत्वावृजिनत्वे | तो नियत ( न्यूनाधिक न होनेवाले ) | धर्म हैं किन्तु अकामहतत्वका नियते अकामहतत्वं तूत्कृष्यत | उत्तरोत्तर उत्कर्ष होता है; इसलिये | यह प्रकृष्ट-साधनरूपसे जाना इति प्रकृष्टसाधनतावगम्यते । | जाता है। तस्याकामहतत्वप्रकर्षतश्चोपल- | उस अकामहतत्वके प्रकर्षसे भ्यमानः श्रोत्रियप्रत्यक्षो ब्रह्मण | उपलब्ध होनेवाला तथा श्रोत्रियको | प्रत्यक्ष अनुभव होनेवाला वह ब्रह्माका आनन्दो यस्य परमानन्दस्य | आनन्द जिस परमानन्दकी मात्रा मात्रैकदेशः । “एतस्यैवानन्द- | अर्थात् केवल एकदेशमात्र है, जैसा स्यान्यानि भूतानि मात्रामुप- | कि “इस आनन्दके लेशसे ही अन्य | प्राणी जीवित रहते हैं” इस अन्य जीवन्ति” ( बृ० उ० ४ । ३। | श्रुतिसे सिद्ध होता है, वह यह ३२ ) इति श्रुत्यन्तरात् । स एष | हिरण्यगर्भका आनन्द, जिस- | की मात्राएँ ( लेशमात्र आनन्द ) आनन्दो यस्य मात्राः समुद्राम्भस | समुद्रके जलकी बूँदोंके समान इव विप्रुषः प्रविभक्ता यत्रैकतां | विभक्त हो पुनः उसमें एकत्वको
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अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९१ गताः स एष परमानन्दः स्वा- | प्राप्त हुई हैं वही अद्वैतरूप होने- भाविकोऽद्वैतत्वादानन्दानन्दि- | से स्वाभाविक परमानन्द है । इसमें आनन्द और आनन्दीका अभेद नोश्चाविभागोऽत्र ॥ १-४ ॥ | है ॥ १-४ ॥ ब्रह्मात्मैक्य-दृष्टिका उपसंहार तदेतन्मीमांसाफलमुपसंह्रियते— | अब इस मीमांसाके फलका उपसंहार किया जाता है— स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः । स य एवंविद्वस्माल्लोकात्प्रेत्य । एतमन्नमयमात्मानमुपसंक्रामति । एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रामति । एतं मनोमयमात्मान- मुपसंक्रामति । एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसंक्रामति । एत- मानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति । तदप्येष श्लोको भवति ॥ ५ ॥ वह, जो कि इस पुरुष (पञ्चकोशात्मक देह) में है और जो यह आदित्यके अन्तर्गत है, एक है । वह, जो इस प्रकार जाननेवाला है, इस लोक (दृष्ट और अदृष्ट विषयसमूह) से निवृत्त होकर इस अन्नमय आत्माको प्राप्त होता है [अर्थात् विषयसमूहको अन्नमय कोशसे पृथक् नहीं देखता] । इसी प्रकार वह इस प्राणमय आत्माको प्राप्त होता है, इस मनोमय आत्माको प्राप्त होता है, इस विज्ञानमय आत्माको प्राप्त होता है एवं इस आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है । उसीके विषयमें यह श्लोक है ॥ ५ ॥ यो गुहायां निहितः परमे | जो आकाशसे लेकर अन्नमय कोशपर्यन्त कार्यकी रचना करके ब्रह्मात्मैक्योप- व्योम्न्याकाशादि- | उसमें अनुप्रविष्ट हुआ परमाकाशके संहारः कार्यं सृष्ट्वान्नमया- | भीतर बुद्धिरूप गुहामें स्थित है CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
१९२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
[मूल/भाष्य - वाम भाग] न्तं तदेवानुप्रविष्टः स य इति निर्दिश्यते । कोऽसौ ? अयं पुरुषे, यश्चासावादित्ये यः परमानन्दः श्रोत्रियप्रत्यक्षो निर्दिष्टो यस्यैक- देशं ब्रह्मादीनि भूतानि सुखा- र्हाण्युपजीवन्ति स यश्चासावा- दित्य इति निर्दिश्यते । स एको भिन्नप्रदेशस्थघटाकाशैकत्ववत् । ननु तन्निर्देशे स यश्चायं पुरुष इत्यविशेषतोऽध्यात्मं न युक्तो निर्देशः, यश्चायं दक्षिणे- ऽक्षन्निति तु युक्तः, प्रसिद्धत्वात् । न, पराधिकारात् । परो ह्यात्मात्राधिकृतोऽदृश्येऽनात्म्ये भीषास्माद्वातः पवते सैषानन्दस्य मीमांसेति । न ह्यकस्मादप्रकृतो
[अनुवाद - दक्षिण भाग] उसीका 'स यः' ( वह जो ) इन पदोंद्वारा निर्देश किया जाता है । वह कौन है ? जो इस पुरुषमें है और जो श्रोत्रियके लिये प्रत्यक्ष बतलाया हुआ परमानन्द आदित्यमें है; जिसके एक देशके आश्रयसे ही सुखके पात्रीभूत ब्रह्मा आदि जीव जीवन धारण करते हैं उसी आनन्द- को 'स यश्चासावादित्ये' इन पदों- द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है । भिन्न-प्रदेशस्थ घटाकाश और महाकाशके एकत्वके समान [ उन दोनों उपाधियोंमें स्थित ] वह आनन्द एक है । शङ्का—किन्तु उस आनन्दका निर्देश करनेमें 'वह जो इस पुरुषमें है' इस प्रकार सामान्यरूपसे अध्यात्म पुरुषका निर्देश करना उचित नहीं है, बल्कि 'जो इस दक्षिण नेत्रमें है' इस प्रकार कहना ही उचित है; क्योंकि ऐसा ही प्रसिद्ध है । समाधान--नहीं, क्योंकि यहाँपर आत्माका अधिकरण है । 'अदृश्ये- ऽनात्म्ये' 'भीषास्माद्वातः पवते' तथा 'सैषानन्दस्य मीमांसा' आदि वाक्यों- के अनुसार यहाँ परमात्माका ही प्रकरण है । अतः जिसका कोई प्रसङ्ग नहीं है उस [ दक्षिणनेत्रस्थ
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अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९३
[मूल संस्कृत-भाष्यम् (वामभागः)] युक्तो निर्देष्टुम् । परमात्मविज्ञानं च विवक्षितम् । तस्मात्पर एव निर्दिश्यते 'स एकः' इति । नन्वानन्दस्य मीमांसा प्रकृता तस्या अपि फलमुपसंहर्तव्यम् । अभिन्नः स्वाभाविक आनन्दः परमात्मैव न विषयविषयि- संबन्धजनित इति । ननु तदनुरूप एवायं निर्देशः 'स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः' इति भिन्नाधिकरणस्थ- विशेषोपमर्देन । नन्वेवमप्यादित्यविशेषग्रहण- मनर्थकम् । नानर्थकम् , उत्कर्षापकर्षा- पोहार्थत्वात् । द्वैतस्य हि मूर्त्ता- मूर्तलक्षणस्य पर उत्कर्षः सवि- त्रभ्यन्तर्गतः स चेत्पुरुषगत-
[हिन्दी-भाष्यार्थः (दक्षिणभागः)] पुरुष ] का अकस्मात् निर्देश करना उचित नहीं है । यहाँ परमात्माका विज्ञान वर्णन करना ही अभीष्ट है; इसलिये 'वह एक है' इस वाक्यसे परमात्माका ही निर्देश किया जाता है । शङ्का—यहाँ तो आनन्दकी मीमांसाका प्रकरण है, इसलिये उसके फलका उपसंहार भी करना ही चाहिये; क्योंकि अखण्ड और स्वाभाविक आनन्द परमात्मा ही है, वह विषय और विषयीके सम्बन्धसे होनेवाला आनन्द नहीं है । मध्यस्थ—'जो आनन्द इस पुरुषमें है और जो इस आदित्यमें है वह एक है' इस प्रकार भिन्न आश्रयोंमें स्थित विशेषका निराकरण करके जो निर्देश किया गया है वह तो इस प्रसंगके अनुरूप ही है । शङ्का—किन्तु, इस प्रकार भी 'आदित्य' इस विशेष पदार्थका ग्रहण करना व्यर्थ ही है । समाधान—उत्कर्ष और अपकर्षका निषेध करनेके लिये होनेके कारण यह व्यर्थ नहीं है । मूर्त्त और अमूर्त्तरूप द्वैतका परम उत्कर्ष सूर्यके अन्तर्गत है; वह यदि पुरुषगत विशेषके बाध-
[पाद-टिप्पणी / पाद-संख्या] तै० उ० २५—२६— CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
१९४ \hspace{70pt} तैत्तिरीयोपनिषद् \hspace{70pt} [ वल्ली २
१९४ \hspace{70pt} तैत्तिरीयोपनिषद् \hspace{70pt} [ वल्ली २
विशेषोपमर्देन परमानन्दमपेक्ष्य | द्वारा परमानन्दकी अपेक्षा उसके समो भवति न कश्चिदुत्कर्षोऽप- | तुल्य ही सिद्ध होता है तो उस गतिको प्राप्त हुए पुरुषका कोई कर्षो वा तां गतिं गतस्येत्यभयं | उत्कर्ष या अपकर्ष नहीं रहता और वह निर्भय स्थितिको प्राप्त कर लेता प्रतिष्ठां विन्दत इत्युपपन्नम्। | है; अतः यह कथन उचित ही है।
\hspace{10pt} अस्ति नास्तीत्यनुप्रश्नो व्या- | \hspace{10pt} ब्रह्म है या नहीं—इस अनुप्रश्नकी {@{}c@{}}\scriptsize द्वितीयानुप्रश्न- \scriptsize विचारः ख्यातः। कार्यरस- | व्याख्या कर दी गयी। कार्यरूप रसकी प्राप्ति, प्राणन, अभय-प्रतिष्ठा लाभप्राणानाभयप्र- | और भयदर्शन आदि युक्तियोंसे वह तिष्ठाभयदर्शनोपपत्तिभ्योऽस्त्येव | आकाशादिका कारणरूप ब्रह्म है तदाकाशादिकारणं ब्रह्मेत्यपा- | ही—इस प्रकार एक अनुप्रश्नका निराकरण किया गया। दूसरे दो कृतोऽनुप्रश्न एकः। द्वावन्याव- | अनुप्रश्न विद्वान् और अविद्वान्की नुप्रश्नौ विद्वदविदुषोर्ब्रह्मप्राप्त्य- | ब्रह्मप्राप्ति और ब्रह्मकी अप्राप्तिके विषयमें हैं। उनमें अन्तिम अनुप्रश्न प्राप्तिविषयौ तत्र विद्वान्सम् अश्नुते | यही है कि 'विद्वान् ब्रह्मको प्राप्त न समश्नुत इत्यनुप्रश्नोऽन्त्यस्त- | होता है या नहीं?' उसका निराकरण करनेके लिये कहा जाता है। दपाकरणायोच्यते। मध्यमोऽनु- | मध्यम अनुप्रश्नका निराकरण तो प्रश्नोऽन्त्यापाकरणादेवापाकृत | अन्तिमके निराकरणसे ही हो जायगा; इसलिये उसके निराकरणका इति तदपाकरणाय न यत्यते। | यत्न नहीं किया जाता।
\hspace{10pt} स यः कश्चिदेवं यथोक्तं ब्रह्म | \hspace{10pt} इस प्रकार जो कोई उत्कर्ष और उत्सृज्योत्कर्षापकर्षमद्वैतं सत्यं | अपकर्षको त्यागकर 'मैं ही उपर्युक्त सत्य, ज्ञान और अनन्तरूप अद्वैत ब्रह्म ज्ञानमनन्तमस्मीत्येवं वेत्ती- | हूँ' ऐसा जानता है वह एवंवित्
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[Header] अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९५
[संस्कृत-मूलभाष्यम्] त्येवंवित् । एवंशब्दस्य प्रकृत- परामर्शार्थत्वात् । स किम् ? अस्माल्लोकात्प्रेत्य दृष्टादृष्टेष्टवि- षयसमुदायो ह्ययं लोकस्तस्मा- ल्लोकात्प्रेत्य प्रत्यावृत्य निरपेक्षो भूत्वैतं यथाव्याख्यातमन्नमय- मात्मानमुपसंक्रामति । विषयजात- मन्नमयात्पिण्डात्मनो व्यतिरिक्तं न पश्यति । सर्वं स्थूलभूतमन्न- मयमात्मानं पश्यतीत्यर्थः । ततोऽभ्यन्तरमेतं प्राणमयं सर्वान्न मयात्मस्थम विभक्तम् । अथैतं मनोमयं विज्ञानमयमा- नन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति । अथादृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिल- यनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते । तत्रैतच्चिन्त्यम् । कोऽयमेवं- [पार्श्व-टिप्पणी: तृतीयानुप्रश्न-विचारः] वित्कथं वा संक्राम- तीति । किं परस्मा- दात्मनोऽन्यः संक्रमणकर्ता प्रवि- भक्त उत स एवेति ।
[हिन्दी-अनुवाद] (इस प्रकार जाननेवाला) है; क्योंकि 'एवम्' शब्द प्रसंगमें आये हुए पदार्थ- का परामर्श (निर्देश) करनेके लिये हुआ करता है । वह एवंवित् क्या [करता है] ? इस लोकसे जाकर — दृष्ट और अदृष्ट इष्ट विषयों- का समुदाय ही यह लोक है, उस इस लोकसे प्रेत्य-प्रत्यावर्तन करके (लौटकर) अर्थात् उससे निरपेक्ष होकर इस ऊपर व्याख्या किये हुए अन्नमय आत्माको प्राप्त होता है । अर्थात् वह विषयसमूहको अन्नमय शरीरसे भिन्न नहीं देखता; तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण स्थूल भूतवर्गको अन्नमय शरीर ही समझता है । उसके भीतर वह सम्पूर्ण अन्नमय कोशोंमें स्थित विभागहीन प्राणमय आत्माको देखता है । और फिर क्रमशः इस मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है । तत्पश्चात् वह इस अदृश्य, अशरीर, अनिर्वचनीय और अनाश्रय आत्मामें अभयस्थिति प्राप्त कर लेता है । अब यहाँ यह विचारना है कि यह इस प्रकार जाननेवाला है कौन ? और यह किस प्रकार संक्रमण करता है ? वह संक्रमणकर्ता परमात्मासे भिन्न है अथवा स्वयं वही है ।
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१९६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१९६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
किं ततः ? | पूर्व०-इस विचारसे लाभ क्या है ? | यद्यन्यः स्याच्छ्रुतिविरोधः । | सिद्धान्ती-यदि वह उससे भिन्न “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्” | है तो “उसे रचकर उसीमें अनुप्रविष्ट ( तै० उ० २ । ६ । १) “अ- | हो गया” “यह अन्य है और मैं न्योऽसावन्योऽहमस्मीति । न स | अन्य हूँ-इस प्रकार जो कहता है वेद” ( बृ० उ० १ । ४ । १० ) | वह नहीं जानता” “एक ही “एकमेवाद्वितीयम्” ( छा० उ० | अद्वितीय” “तू वह है” इत्यादि ६ । २ । १) “तत्त्वमसि” | श्रुतियोंसे विरोध होगा । और यदि ( छा० उ० ६ । ८-१६ ) इति । | वह स्वयं ही आनन्दमय आत्माको अथ स एव, आनन्दमयमात्मानमु- | प्राप्त होता है तो उस [ एक ही ] पसंक्रामतीति कर्मकर्तृत्वानुप- | में कर्म और कर्तापन दोनोंका होना पत्तिः, परस्यैव च संसारित्वं | असम्भव है, तथा परमात्माको ही पराभावो वा । | संसारित्वकी प्राप्ति अथवा उसके | परमात्मत्वका अभाव सिद्ध होता है । | यद्युभयथा प्राप्तो दोषो न | पूर्व०-यदि दोनों ही अवस्थाओं- | में प्राप्त होनेवाले दोषका परिहार परिहर्तुं शक्यत इति व्यर्था | नहीं किया जा सकता तो उसका | विचार करना व्यर्थ है और यदि चिन्ता । अथान्यतरस्मिन्पक्षे | किसी एक पक्षको स्वीकार कर लेनेसे | दोषकी प्राप्ति नहीं होती अथवा दोषाप्राप्तिस्तृतीये वा पक्षेऽदुष्टे | कोई तीसरा निर्दोष पक्ष हो तो उसे स एव शास्त्रार्थ इति व्यर्थैव | ही शास्त्रका आशय समझना चाहिये । | ऐसी अवस्था में भी विचार करना चिन्ता । | व्यर्थ ही होगा । | न; तन्निर्धारणार्थत्वात् । सत्यं | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि यह | उसका निश्चय करनेके लिये है ।
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अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२७ प्राप्तो दोषो न शक्यः परिहर्तु- | यह ठीक है कि इस प्रकार प्राप्त | होनेवाला दोष निवृत्त नहीं किया मन्यतरस्मिंस्तृतीये वा पक्षेऽदुष्टे- | जा सकता तथा उपर्युक्त दोनों | पक्षोंमेंसे किसी एकका अथवा किसी ऽवधृते व्यर्था चिन्ता स्यान्न तु | तीसरे निर्दोष पक्षका निश्चय हो | जानेपर भी यह विचार व्यर्थ ही सोऽवधृत इति तदवधारणार्थ- | होगा। किन्तु उस पक्षका निश्चय | तो नहीं हुआ है; अतः उसका | निश्चय करनेके लिये होनेके कारण त्वादर्थवत्येवैषा चिन्ता । | यह विचार सार्थक ही है । सत्यमर्थवती चिन्ता शास्त्रा- | पूर्व०—शास्त्रके तात्पर्यका निश्चय | करनेके लिये होनेसे तो सचमुच र्थावधारणार्थत्वात् । चिन्तयसि | यह विचार सार्थक है, परन्तु तू तो | केवल विचार ही करता है, निर्णय च त्वं न तु निर्णेष्यसि, | तो कुछ करेगा नहीं । किं न निर्णेतव्यमिति वेद- | सिद्धान्ती—निर्णय नहीं करना वचनम् ? | चाहिये—ऐसा क्या कोई वेदवाक्य है ? न। | पूर्व०—नहीं । कथं तर्हि ? | सिद्धान्ती—तो फिर निर्णय क्यों | नहीं होगा ? बहुप्रतिपक्षत्वात् । एकत्ववादी | पूर्व०—क्योंकि तेरा प्रतिपक्ष | बहुत है। वेदार्थपरायण होनेके त्वम्, वेदार्थपरत्वात्, बहवो हि | कारण तू तो एकत्ववादी है किन्तु | तेरे प्रतिपक्षी वेदबाह्य नानात्ववादी नानात्ववादिनो वेदबाह्यास्त्व- | बहुत हैं। इसलिये मुझे सन्देह है त्प्रतिपक्षाः । अतो ममाशङ्कां न | कि तू मेरी शङ्काका निर्णय नहीं निर्णेष्यसीति । | कर सकेगा। एतदेव मे स्वस्त्ययनं यन्मा- | सिद्धान्ती—तूने जो मुझे बहुत-से
१९८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
मेकयोगिनमनेकयोगिबहुप्रतिप- | अनेकत्ववादी प्रतिपक्षियोंसे युक्त | एकत्ववादी बतलाया है—यही बड़े क्षमात्थ । अतो जेप्यामि सर्वान्; | मङ्गलकी बात है । अतः अब मैं | सबको जीत लूँगा; ले, मैं विचार आरभे च चिन्ताम् । | आरम्भ करता हूँ । स एव तु स्यात्तद्भावस्य वि- | वह संक्रमणकर्ता परमात्मा ही | है; क्योंकि यहाँ जीवको परमात्म- वक्षितत्वात् । तद्विज्ञानेन परमा- | भावकी प्राप्ति बतलानी अभीष्ट है । | 'ब्रह्मवेत्ता परमात्माको प्राप्त कर लेता त्मभावो ह्यत्र विवक्षितो ब्रह्म- | है' इस वाक्यके अनुसार यहाँ ब्रह्म- | विज्ञानसे परमात्मभावकी प्राप्ति होती विदाप्नोति परमिति । न ह्यन्य- | है—यही प्रतिपादन करना इष्ट है । | किसी अन्य पदार्थका अन्य पदार्थ- स्यान्यभावापत्तिरुपपद्यते । ननु | भावको प्राप्त होना सम्भव नहीं है । | यदि कहो कि उसका स्वयं अपने तस्यापि तद्भावापत्तिरनुपपन्नैव ? | स्वरूपको प्राप्त होना भी असम्भव | ही है, तो ऐसी बात नहीं है; न; अविद्याकृततादात्म्यापो- | क्योंकि यह कथन केवल अविद्यासे | आरोपित अनात्मपदार्थोंका निषेध हार्थात् । या हि ब्रह्मविद्यया | करनेके लिये ही है । [ तात्पर्य यह | है कि ] ब्रह्मविद्याके द्वारा जो स्वात्मप्राप्तिरुपदिश्यते साविद्या- | अपने आत्मस्वरूपकी प्राप्तिका | उपदेश किया जाता है वह अविद्या- कृतस्यान्नादिविशेषात्मन आत्म- | कृत अन्नमयादि कोशरूप विशेषात्मा- | का अर्थात् आत्मभावसे आरोपित त्वेनाध्यारोपितस्यानात्मनोऽपो- | किये हुए अनात्माका निषेध करनेके | लिये ही है । हार्था । | कथमेवमर्थतावगम्यते ? | पूर्व०—उसका इस प्रयोजनके | लिये होना कैसे जाना जाता है ?
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अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९९ विद्यामात्रोपदेशात् । विद्या- | सिद्धान्ती—केवल ज्ञानका ही याश्च दृष्टं कार्यमविद्यानिवृत्ति- | उपदेश किया जानेके कारण । अज्ञानकी निवृत्ति—यह ज्ञानका स्तच्चेह विद्यामात्रमात्मप्राप्तौ | प्रत्यक्ष कार्य है, और यहाँ आत्माकी प्राप्तिमें वह ज्ञान ही साधन बतलाया साधनमुपदिश्यते । | गया है । मार्गविज्ञानोपदेशवदिति चे- | पूर्व०—यदि वह मार्गविज्ञानके उपदेशके समान हो तो ? [ अब त्नात्मत्वे विद्यामात्रसाधनोप- | इसीकी व्याख्या करते हैं—] केवल ज्ञानका ही साधनरूपसे उपदेश देशोऽहेतुः । कस्मात् ? देशान्तर- | किया जाना उसकी परमात्मरूपतामें कारण नहीं हो सकता । ऐसा प्राप्तौ मार्गविज्ञानोपदेशदर्श- | क्यों है ? क्योंकि देशान्तरकी प्राप्तिके लिये भी मार्गविज्ञानका उपदेश होता नात् । न हि ग्राम एव गन्तेति | देखा गया है । ऐसी अवस्थामें ग्राम ही गमन करनेवाला नहीं हुआ चेत् ? | करता—ऐसा माने तो ? न, वैधर्म्यात् । तत्र हि ग्राम- | सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं क्योंकि वे दोनों समान धर्मवाले नहीं विषयं विज्ञानं नोपदिश्यते । | हैं । * [तुमने जो दृष्टान्त दिया है ] उसमें ग्रामविषयक विज्ञानका उपदेश तत्प्राप्तिमार्गविषयमेवोपदिश्यते | नहीं दिया जाता, केवल उसकी प्राप्तिके मार्गसे सम्बन्धित विज्ञान-
- ग्रामको जानेवाले और ब्रह्मको प्राप्त होनेवालेमें बड़ा अन्तर है । इसके सिवा ग्रामको जानेवालेको जो मार्गके विज्ञानका उपदेश किया जाता है उसमें यह नहीं कहा जाता कि 'तू अमुक ग्राम है' परन्तु ब्रह्मज्ञानका उपदेश तो 'तू ब्रह्म है' इस अभेदसूचक वाक्यसे ही किया जाता है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
२०० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
२०० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ विज्ञानम् । न तथैह ब्रह्मविज्ञानं | का ही उपदेश किया जाता है । | उसके समान इस प्रसङ्गमें ब्रह्म- व्यतिरेकेण साधनान्तरविषयं | विज्ञानसे भिन्न किसी अन्य साधन- | सम्बन्धी विज्ञानका उपदेश नहीं विज्ञानमुपदिश्यते । | किया जाता । उक्तकर्मादिसाधनापेक्षं ब्रह्म- | यदि कहो कि [ पूर्वकाण्डमें ] | कहे हुए कर्मकी अपेक्षावाला ब्रह्मज्ञान विज्ञानं परप्राप्तौ साधनमुप- | परमात्माकी प्राप्तिमें साधनरूपसे | उपदेश किया जाता है, तो ऐसी दिश्यत इति चेन्न; नित्य- | बात भी नहीं है; क्योंकि मोक्ष | नित्य है—इत्यादि हेतुओंसे इसका त्वान्मोक्षस्येत्यादिना प्रत्युक्त- | पहले ही निराकरण किया जा चुका | है । 'उसे रचकर वह उसीमें अनु- त्वात् । श्रुतिश्च तत्सृष्ट्वा तदेवा- | प्रविष्ट हो गया' यह श्रुति भी कार्य- | में स्थित आत्माका परमात्मत्व प्रदर्शित नुप्राविशदिति कार्यस्थस्य तदा- | करती है । अभय-प्रतिष्ठाकी उपपत्ति- त्मत्वं दर्शयति । अभयप्रतिष्ठोप- | के कारण भी [ उनका अभेद ही | मानना चाहिये ] । यदि ज्ञानी अपनेसे पत्तेश्च । यदि हि विद्यावान्स्वा- | भिन्न किसी औरको नहीं देखता | तो वह अभयस्थितिको प्राप्त कर त्मनोऽन्यन्न पश्यति ततोऽभयं | लेता है—ऐसा कहा जा सकता | है; क्योंकि उस अवस्थामें भयके प्रतिष्ठां विन्दत इति स्याद्भयहेतोः | हेतुभूत अन्य पदार्थकी सत्ता नहीं | रहती । अन्य पदार्थ [ अर्थात् परस्यान्यस्याभावात् । अन्यस्य | द्वैत ] के अविद्याकृत होनेपर चाविद्याकृतत्वे विद्ययावस्तुत्व- | ही विद्याके द्वारा उसके अवस्तुत्व- | दर्शनकी उपपत्ति हो सकती दर्शनोपपत्तिस्तद्धि द्वितीयस्य | है । [ भ्रान्तिवश प्रतीत होनेवाले ]
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अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०१ चन्द्रस्य सत्त्वं यदतैमिरेकेण | द्वितीय चन्द्रमाकी वास्तविकता यही है कि वह तिमिररोगरहित चक्षुष्मता न गृह्यते । नेत्रोंवाले पुरुषद्वारा ग्रहण नहीं किया जाता। नैवं न गृह्यत इति चेत् ? पूर्व०-परन्तु द्वैतका ग्रहण न होता हो-ऐसी बात तो है नहीं । न, सुषुप्तसमाहितयोर- सिद्धान्ती-ऐसा मत कहो; क्योंकि सोये हुए और समाधिस्थ ग्रहणात् । पुरुषको उसका ग्रहण नहीं होता । सुषुप्तेऽग्रहणमन्यासक्तवदिति पूर्व०-किन्तु सुषुप्तिमें जो द्वैतका अग्रहण है वह तो विषयान्तरमें चेत् ? . आसक्तचित्त पुरुषके अग्रहणके समान है ? न, सर्वाग्रहणात् । जाग्रत्स्वप्न- सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि उस समय तो सभी पदार्थोंका अग्रहण योरन्यस्य ग्रहणात्सत्त्वमेवेति है [ फिर वह अन्यासक्तचित्त कैसे कहा जा सकता है ? ] यदि कहो कि जाग्रत् और स्वप्नावस्था में अन्य चेन्न; अविद्याकृतत्वाज्जाग्र- पदार्थोंका ग्रहण होनेसे उनकी सत्ता है ही, तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं; त्स्वप्नयोः; यदन्यग्रहणं जाग्रत्स्वप्न- क्योंकि जाग्रत् और स्वप्न अविद्या- कृत हैं। जाग्रत् और स्वप्नमें जो अन्य योस्तदविद्याकृतमविद्याभावेऽभा- पदार्थका ग्रहण है वह अविद्याके कारण है; क्योंकि अविद्याकी निवृत्ति होनेपर उसका अभाव हो जाता है ? वात् । सुषुप्तेऽग्रहणमप्यविद्याकृत- पूर्व०-सुषुप्तिमें जो अग्रहण है वह भी तो अविद्याके ही कारण है। मिति चेत् ?
२०२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
२०२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ न, स्वाभाविकत्वात् । द्रव्य- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि वह तो स्वाभाविक है । द्रव्यका तात्त्विक वस्तुन्स्तात्त्विक- | स्य हि तत्त्वमविक्रि- | स्वरूप तो विकार न होना ही है; विशेषरूपयो- | या परानपेक्षत्वात् । | क्योंकि उसे दूसरेकी अपेक्षा नहीं होती । दूसरेकी अपेक्षावाला होनेके र्निर्वचनम् | विक्रिया न तत्त्वं | कारण विकार तत्त्व नहीं है । जो परापेक्षत्वात् । न हि कारकापेक्षं | कर्ता, कर्म, करण आदि कारकोंकी अपेक्षावाला होता है वह वस्तुका वस्तुनस्तत्त्वम् । सतो विशेषः | तत्त्व नहीं होता । विद्यमान वस्तुका विशेष रूप कारकोंकी अपेक्षावाला कारकापेक्षः, विशेषश्च विक्रिया । | होता है, और विशेष ही विकार होता है । जाग्रत् और स्वप्नका जो जाग्रत्स्वप्नयोश्च ग्रहणं विशेषः । | ग्रहण है वह भी विशेष ही है । जिसका जो रूप अन्यकी अपेक्षासे यद्धि यस्य नान्यापेक्षं स्वरूपं | रहित होता है वही उसका तत्त्व होता है और जो अन्यकी अपेक्षा- तत्तस्य तत्त्वम्, यदन्यापेक्षं न | वाला होता है वह तत्त्व नहीं होता; क्योंकि उस अन्यका अभाव होनेपर तत्तत्त्वम्; अन्याभावेऽभावात् । | उसका भी अभाव हो जाता है । तस्मात्स्वाभाविकत्वाज्जाग्रत्स्वप्न- | अतः [सुषुप्तावस्था] स्वाभाविक होनेके कारण उस समय जाग्रत् और स्वप्न- वन्न सुषुप्ते विशेषः । | के समान विशेषकी सत्ता नहीं है । येषां पुनरीश्वरोऽन्य आत्मनः | किन्तु जिनके मतमें ईश्वर आत्मा- भेददृष्टे- | कार्यं चान्यत्तेषां | से भिन्न है और उसका कार्यरूप यह जगत् भी भिन्न है उनके भयकी र्भयहेतुत्वम् | भयानिवृत्तिर्भयस्या- | निवृत्ति नहीं हो सकती; क्योंकि भय दूसरेके ही कारण हुआ करता न्यनिमित्तत्वात् । सतश्चान्यस्यात्म- | है । अन्य पदार्थ यदि सत् होगा तब तो उसके स्वरूपका अभाव हानानुपपत्तिः । न चासत आ- | नहीं हो सकता और यदि असत्
अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०३
त्मलाभः । सापेक्षस्यान्यस्य भय- | होगा तो उसके स्वरूपकी सिद्धि ही नहीं हो सकती । यदि कहो हेतुत्वमिति चेन्न, तस्यापि तुल्य- | कि दूसरा ( ईश्वर ) तो [ हमारे धर्माधर्म आदिकी ] अपेक्षासे ही त्वात् । यद्धर्माद्यनुसहायीभूतं | भयका कारण है, तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि वह [ सापेक्ष ईश्वर ] भी वैसा ही है । जो कोई नित्यमनित्यं वा निमित्तमपेक्ष्या- | [ ईश्वरादि ] दूसरा पदार्थ नित्य या अनित्य अधर्मादिरूप सहायक निमित्त- न्यद्भयकारणं स्यात्तस्यापि तथा- | की अपेक्षासे भयका कारण होता है, यथार्थ होनेके कारण उसके स्वरूपका भी अभाव न होनेसे भूतस्यात्महानाभावाद्भयानिवृत्तिः | उसके भयकी निवृत्ति नहीं हो सकती; और यदि उसके स्वरूपका अभाव आत्महाने वा सदसतोरितरेत- | माना जाय तो सत् और असत्को इतरेतरत्व [ अर्थात् सत्को असत्त्व और असत्को सत्त्व ] की प्राप्ति रापत्तौ सर्वत्रानाश्वास एव । | होनेसे कहीं विश्वास ही नहीं किया जा सकता । \hspace{1cm} एकत्वपक्षे पुनः सनिमित्तस्य | \hspace{0.5cm} परन्तु एकत्व-पक्ष स्वीकार करने-पर तो सारा संसार अपने कारणके ज्ञानाज्ञानयो- \hspace{0.5cm} संसारस्य अविद्या- | सहित अविद्याकल्पित होनेके कारण कोई दोष ही नहीं आता । तिमिर र्नात्मधर्मत्वम् \hspace{0.5cm} कल्पितत्वाददोषः । | रोगके कारण देखे गये द्वितीय चन्द्रमाके स्वरूपकी न तो प्राप्ति ही तैमिरिकदृष्टस्य हि द्वितीयचन्द्र- | होती है और न नाश ही । यदि कहो कि ज्ञान और अज्ञान तो स्य नात्मलाभो नाशो वास्ति । | आत्माके ही धर्म हैं [ इसलिये उनके कारण आत्माका विकार होता होगा ] विद्याविद्ययोस्तद्धर्मत्वमिति चेन्न | तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि प्रत्यक्षत्वात् । विवेकाविवेकौ | वे तो प्रत्यक्ष ( आत्माके दृश्य ) हैं ।
२०४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ रूपादिवत्प्रत्यक्षावुपलभ्येते अन्तः-| रूप आदि विषयोंके समान अन्तः- करणस्थौ । न हि रूपस्य | करणमें स्थित विवेक और अविवेक प्रत्यक्ष उपलब्ध होते हैं । प्रत्यक्ष प्रत्यक्षस्य सतो द्रष्टृधर्मत्वम् । | उपलब्ध होनेवाला रूप द्रष्टाका धर्म अविद्या च स्वानुभवेन रूप्यते | नहीं हो सकता । 'मैं मूढ हूँ, मेरी बुद्धि मलिन है' इस प्रकार अविद्या मूढोऽहमविविक्तं मम विज्ञान- | भी अपने अनुभवके द्वारा निरूपण मिति । | की जाती है । तथा विद्याविवेकोऽनुभूयते । | इसी प्रकार विद्याका पार्थक्य भी अनुभव किया जाता है । बुद्धिमान् उपदिशन्ति चान्येभ्य आत्मनो | लोग दूसरोंको अपने ज्ञानका उपदेश किया करते हैं । तथा दूसरे लोग विद्याम्।तथा चान्येऽवधारयन्ति। | भी उसका निश्चय करते हैं । अतः तस्मान्नामरूपपक्षस्यैव विद्याविद्ये | विद्या और अविद्या नाम-रूप पक्षके ही हैं, तथा नाम और रूप आत्माके नामरूपे च नात्मधर्मौ । “नाम- | धर्म नहीं हैं, जैसा कि “जो नाम रूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा | और रूपका निर्वाह करनेवाला है तथा जिसके भीतर वे ( नाम तद्ब्रह्म” ( छा० उ० ८ । १४ । | और रूप ) रहते हैं, वह ब्रह्म है” १) इति श्रुत्यन्तरात् । ते च | इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है । वे नाम-रूप भी सूर्यमें दिन और पुनर्नामरूपे सवितर्यहोरात्रे इव | रात्रिके समान कल्पित ही हैं, कल्पिते न परमार्थतो विद्यमाने । | वस्तुतः विद्यमान नहीं हैं । अभेदे “एतमानन्दमयमा- | पूर्व ०–किन्तु [ ईश्वर और जीवका ] अभेद माननेपर तो “वह इस त्मानमुपसंक्रामति” ( तै० उ० | आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है” २ । ८ । ५ ) इति कर्मकर्तृत्व-| इस श्रुतिमें जो [ पुरुषका ] कर्तृत्व और [ आनन्दमय आत्माका ] कर्मत्व बताया नुपपत्तिरिति चेत् ? | है वह उपपन्न नहीं होता ? CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०५ न; विज्ञानमात्रत्वात्संक्रमण- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि पुरुष- [संक्रमणशब्द-तात्पर्यम्] स्य । न जलूकादि- | का संक्रमण तो केवल विज्ञानमात्र वत्संक्रमणमिहोप- | है । यहाँ जोंक आदिके संक्रमणके समान पुरुषके संक्रमणका उपदेश दिश्यते, किं तर्हि ? विज्ञानमात्रं | नहीं किया जाता । तो कैसा ? इस संक्रमण-श्रुतिका अर्थ तो केवल संक्रमणश्रुतेरर्थः । | विज्ञानमात्र है ।* ननु मुख्यमेव संक्रमणं श्रूयत | पूर्व ०—'उपसंक्रामति' इस पदसे यहाँ मुख्य संक्रमण ( समीप जाना ) उपसंक्रामतीति चेत् ? | ही अभिप्रेत हो तो ? न; अन्नमयेऽदर्शनात् । न | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि अन्नमयमें मुख्य संक्रमण देखा नहीं जाता— ह्यन्नमयमुपसंक्रामतो बाह्यादस्मा- | अन्नमयको उपसंक्रमण करनेवालेका ल्लोकाज्जलूकावत्संक्रमणं दृश्यते- | जोंकके समान इस बाह्य जगत्से अथवा किसी और प्रकारसे संक्रमण ऽन्यथा वा । | नहीं देखा जाता । मनोमयस्य बहिर्निर्गतस्य | पूर्व ०—बाहर [निकलकर विषयोंमें] गये हुए मनोमय अथवा विज्ञानमय विज्ञानमयस्य वा पुनः प्रत्या- | कोशोंका तो वहाँसे पुनः लौटनेपर अपनी ओर होना संक्रमण हो ही वृत्त्यात्मसंक्रमणमिति चेत् ? | सकता है ? न; स्वात्मनि क्रियाविरोधा- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि इससे अपनेमें ही अपनी क्रिया होना— दन्योऽन्नमयमन्यमुपसंक्रामतीति | यह विरोध उपस्थित होता है । अन्नमयसे भिन्न पुरुष अपनेसे भिन्न प्रकृत्य मनोमयो विज्ञानमयो वा | अन्नमयको प्राप्त होता है—इस प्रकार
- अर्थात् यहाँ 'संक्रमण', शब्दका अर्थ 'जाना' या 'पहुँचना' नहीं बल्कि 'जानना' है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
२०६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
२०६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
स्वात्मानमेवोपसंक्रामतीति वि- | प्रकरणका आरम्भ करके अब ‘मनो- रोधः स्यात् । तथा नानन्दमय- | मय अथवा विज्ञानमय अपनेको ही प्राप्त होता है’ ऐसा कहनेमें स्यात्मसंक्रमणमुपपद्यते । तस्मान्न | उससे विरोध आता है । इसी प्रकार प्राप्तिः संक्रमणं नाप्यन्नमयादी- | आनन्दमयका भी अपनेको प्राप्त होना सम्भव नहीं है; अतः प्राप्तिका नामन्यतमकर्तृकम् । पारिशेष्याद- | नाम संक्रमण नहीं है और न वह अन्नमयादिमेंसे किसीके द्वारा किया न्नमयाद्यानन्दमयान्तात्मव्यति- | जाता है । फलतः आत्मासे भिन्न रिक्तकर्तृकं ज्ञानमात्रं च संक्रमण- | अन्नमयसे लेकर आनन्दमय कोश- पर्यन्त जिसका कर्ता है वह ज्ञानमात्र मुपपद्यते । | ही संक्रमण होना सम्भव है ।
ज्ञानमात्रत्वे चानन्दमयान्तः- | इस प्रकार ‘संक्रमण’ शब्दका स्थस्यैव सर्वान्तरस्याकाशाद्यन्न- | अर्थ ज्ञानमात्र होनेपर ही आनन्दमय कोशके भीतर स्थित सर्वान्तर तथा मयान्तं कार्यं सृष्ट्वानुपविष्टस्य | आकाशसे लेकर अन्नमयकोशपर्यन्त कार्यवर्गको रचकर उसमें अनुप्रविष्ट हृदयगुहाभिसंबन्धादन्नमयादि- | हुए आत्माका जो हृदयगुहाके ष्वनात्मस्वात्मविभ्रमः संक्रमणे- | सम्बन्धसे अन्नमय आदि अनात्माओं- में आत्मत्वका भ्रम है वह संक्रमण- नात्मविवेकविज्ञानोत्पत्त्या विन- | स्वरूप विवेक ज्ञानकी उत्पत्तिसे नष्ट श्यति । तदेतस्मिन्नविद्याविभ्रम- | हो जाता है । अतः इस अविद्यारूप भ्रमके नाशमें ही संक्रमण शब्दका नाशे संक्रमणशब्द उपचर्यते न | उपचार ( गौणरूप ) से प्रयोग किया गया है; इसके सिवा किसी और ह्यन्यथा सर्वगतस्यात्मनः संक्र- | प्रकार सर्वगत आत्माका संक्रमण मणमुपपद्यते । | होना सम्भव नहीं है ।
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