तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ रूपादिवत्प्रत्यक्षावुपलभ्येते अन्तः-| रूप आदि विषयोंके समान अन्तः- करणस्थौ । न हि रूपस्य | करणमें स्थित विवेक और अविवेक प्रत्यक्ष उपलब्ध होते हैं । प्रत्यक्ष प्रत्यक्षस्य सतो द्रष्टृधर्मत्वम् । | उपलब्ध होनेवाला रूप द्रष्टाका धर्म अविद्या च स्वानुभवेन रूप्यते | नहीं हो सकता । 'मैं मूढ हूँ, मेरी बुद्धि मलिन है' इस प्रकार अविद्या मूढोऽहमविविक्तं मम विज्ञान- | भी अपने अनुभवके द्वारा निरूपण मिति । | की जाती है । तथा विद्याविवेकोऽनुभूयते । | इसी प्रकार विद्याका पार्थक्य भी अनुभव किया जाता है । बुद्धिमान् उपदिशन्ति चान्येभ्य आत्मनो | लोग दूसरोंको अपने ज्ञानका उपदेश किया करते हैं । तथा दूसरे लोग विद्याम्।तथा चान्येऽवधारयन्ति। | भी उसका निश्चय करते हैं । अतः तस्मान्नामरूपपक्षस्यैव विद्याविद्ये | विद्या और अविद्या नाम-रूप पक्षके ही हैं, तथा नाम और रूप आत्माके नामरूपे च नात्मधर्मौ । “नाम- | धर्म नहीं हैं, जैसा कि “जो नाम रूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा | और रूपका निर्वाह करनेवाला है तथा जिसके भीतर वे ( नाम तद्ब्रह्म” ( छा० उ० ८ । १४ । | और रूप ) रहते हैं, वह ब्रह्म है” १) इति श्रुत्यन्तरात् । ते च | इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है । वे नाम-रूप भी सूर्यमें दिन और पुनर्नामरूपे सवितर्यहोरात्रे इव | रात्रिके समान कल्पित ही हैं, कल्पिते न परमार्थतो विद्यमाने । | वस्तुतः विद्यमान नहीं हैं । अभेदे “एतमानन्दमयमा- | पूर्व ०–किन्तु [ ईश्वर और जीवका ] अभेद माननेपर तो “वह इस त्मानमुपसंक्रामति” ( तै० उ० | आनन्दमय आत्माको प्राप्त होता है” २ । ८ । ५ ) इति कर्मकर्तृत्व-| इस श्रुतिमें जो [ पुरुषका ] कर्तृत्व और [ आनन्दमय आत्माका ] कर्मत्व बताया नुपपत्तिरिति चेत् ? | है वह उपपन्न नहीं होता ? CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri