भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०३

त्मलाभः । सापेक्षस्यान्यस्य भय- | होगा तो उसके स्वरूपकी सिद्धि ही नहीं हो सकती । यदि कहो हेतुत्वमिति चेन्न, तस्यापि तुल्य- | कि दूसरा ( ईश्वर ) तो [ हमारे धर्माधर्म आदिकी ] अपेक्षासे ही त्वात् । यद्धर्माद्यनुसहायीभूतं | भयका कारण है, तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि वह [ सापेक्ष ईश्वर ] भी वैसा ही है । जो कोई नित्यमनित्यं वा निमित्तमपेक्ष्या- | [ ईश्वरादि ] दूसरा पदार्थ नित्य या अनित्य अधर्मादिरूप सहायक निमित्त- न्यद्भयकारणं स्यात्तस्यापि तथा- | की अपेक्षासे भयका कारण होता है, यथार्थ होनेके कारण उसके स्वरूपका भी अभाव न होनेसे भूतस्यात्महानाभावाद्भयानिवृत्तिः | उसके भयकी निवृत्ति नहीं हो सकती; और यदि उसके स्वरूपका अभाव आत्महाने वा सदसतोरितरेत- | माना जाय तो सत् और असत्‌को इतरेतरत्व [ अर्थात् सत्‌को असत्त्व और असत्‌को सत्त्व ] की प्राप्ति रापत्तौ सर्वत्रानाश्वास एव । | होनेसे कहीं विश्वास ही नहीं किया जा सकता । \hspace{1cm} एकत्वपक्षे पुनः सनिमित्तस्य | \hspace{0.5cm} परन्तु एकत्व-पक्ष स्वीकार करने-पर तो सारा संसार अपने कारणके ज्ञानाज्ञानयो- \hspace{0.5cm} संसारस्य अविद्या- | सहित अविद्याकल्पित होनेके कारण कोई दोष ही नहीं आता । तिमिर र्नात्मधर्मत्वम् \hspace{0.5cm} कल्पितत्वाददोषः । | रोगके कारण देखे गये द्वितीय चन्द्रमाके स्वरूपकी न तो प्राप्ति ही तैमिरिकदृष्टस्य हि द्वितीयचन्द्र- | होती है और न नाश ही । यदि कहो कि ज्ञान और अज्ञान तो स्य नात्मलाभो नाशो वास्ति । | आत्माके ही धर्म हैं [ इसलिये उनके कारण आत्माका विकार होता होगा ] विद्याविद्ययोस्तद्धर्मत्वमिति चेन्न | तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि प्रत्यक्षत्वात् । विवेकाविवेकौ | वे तो प्रत्यक्ष ( आत्माके दृश्य ) हैं ।