भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 195

अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८९ सुखोत्कर्षोपलब्धेरकामहतत्वस्य | सुखका सौगुना उत्कर्ष देखा जाता | है; अतः अकामहतत्वको परमानन्द- परमानन्दप्राप्तिसाधनत्वविधाना- | की प्राप्तिका साधन बतलानेके लिये | 'अकामहत' विशेषण ग्रहण किया र्थम् । व्याख्यातमन्यत् । | है । और सबक़ी व्याख्या पहले की | जा चुकी है । देवगन्धर्वा जातित एव । | देवगन्धर्व—जो जन्मसे ही गन्धर्व चिरलोकलोकानामिति पितॄणां | हों 'चिरलोकलोकानाम्' ( चिरस्थायी विशेषणम् । चिरकालस्थायी | लोकमें रहनेवाले ) यह पितृगणका लोको येषां पितॄणां ते चिर- | विशेषण है । जिन पितृगणका लोकलोका इति । आजान इति | चिरस्थायी लोक है वे चिरलोक- देवलोकस्तस्मिन्नाजाने जाता आ- | लोक कहे जाते हैं । 'आजान' जानजा देवाः स्मार्तकर्मविशेषतो | देवलोकका नाम है, उस आजानमें देवस्थानेषु जाताः । | जो उत्पन्न हुए हैं वे देवगण | 'आजानज' हैं, जो कि स्मार्त्त कर्म- | विशेषके कारण देवस्थानमें उत्पन्न | हुए हैं । कर्मदेवा ये वैदिकेन कर्मणा- | जो केवल अग्निहोत्रादि वैदिक ग्निहोत्रादिना केवलेन देवान- | कर्मसे देवभावको प्राप्त हुए हैं वे पियन्ति । देवा इति त्रयस्त्रिंश- | 'कर्मदेव' कहलाते हैं । जो तैंतीस द्धविर्भुजः । इन्द्रस्तेषां स्वामी | देवगण यज्ञमें हविर्भाग लेनेवाले हैं तस्याचार्यो बृहस्पतिः । प्रजा- | वे ही यहाँ 'देव' शब्दसे कहे गये हैं । पतिर्विराट् । त्रैलोक्यशरीरो ब्रह्मा | उनका स्वामी इन्द्र है और इन्द्रका समष्टिव्यष्टिरूपः संसारमण्डल- | गुरु बृहस्पति है । 'प्रजापति' का व्यापी । | अर्थ विराट् है, तथा त्रैलोक्यशरीर- | धारी ब्रह्मा है जो समष्टि-व्यष्टिरूप | और समस्त संसारमण्डलमें व्याप्त है । यत्रैत आनन्दभेदा एकतां | जहाँ ये आनन्दके भेद एकताको | प्राप्त होते हैं [ अर्थात् एक गच्छन्ति धर्मश्च तन्निमित्तो ज्ञानं | ही गिने जाते हैं ] तथा जहाँ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri