भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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१६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली १

काम्यप्रतिषिद्धयोरनारम्भा- | पूर्व०—काम्य और निषिद्ध कर्मों- (मीमांसकमत- दारब्धस्य चोप- | का आरम्भ न करनेसे, प्रारब्ध कर्मों- समीक्षा) भोगेन क्षयान्नित्या- | का भोगद्वारा क्षय हो जानेसे तथा | नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे प्रत्यवायका नुष्ठानेन प्रत्यवायाभावाद्यत्नत | अभाव हो जानेसे अनायास ही एव स्वात्मन्यवस्थानं मोक्षः । | अपने आत्मामें स्थित होनारूप मोक्ष | प्राप्त हो जायगा; अथवा 'स्वर्ग' अथवा निरतिशयायाः प्रीतेः | शब्दवाच्य आत्यन्तिक प्रीति कर्म- स्वर्गशब्दवाच्यायाः कर्महेतु- | जनित होनेके कारण कर्मसे ही | मोक्ष हो सकता है—यदि ऐसा माना त्वात्कर्मभ्य एव मोक्ष इति चेत् । | जाय तो ? न; कर्मानैकत्वात् । अने- | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि कर्म कानि ह्यारब्धफलान्यनारब्ध- | तो बहुत-से हैं । अनेकों जन्मान्तरोंमें | किये हुए ऐसे अनेकों विरुद्ध फलवाले फलानि चानेकजन्मान्तरकृतानि | कर्म हो सकते हैं जिनमेंसे कुछ तो विरुद्धफलानि कर्माणि सम्भवन्ति। | फलोन्मुख हो गये हैं और कुछ अभी अतस्तेष्वनारब्धफलानामेकस्मि- | फलोन्मुख नहीं हुए हैं । अतः उनमें | जो कर्म अभी फलोन्मुख नहीं हुए ञ्जन्मन्युपभोगक्षयासम्भवाच्छेष- | हैं उनका एक जन्ममें ही क्षय होना कर्मनिमित्तशरीरारम्भोपपत्तिः । | असम्भव होनेके कारण उन अवशिष्ट | कर्मोंके कारण दूसरे शरीरका कर्मशेषसद्भावसिद्धिश्च "तद्य इह | आरम्भ होना सम्भव ही है । रमणीयचरणाः" ( छा० उ० | “इस लोकमें जो शुभ कर्म करनेवाले ५।१०।७) “ततः शेषेण” | हैं [ उन्हें शुभयोनि प्राप्त होती है ]” | “[ उपभोग किये कर्मोंसे ] बचे हुए (आ०ध० २।२।२।३, गो० | कर्मोंद्वारा [ जीवको आगेका शरीर

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