भारतकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 261 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 23

अनु० १] शाङ्करभाष्यार्थ १७ स्मृ० ११) इत्यादिश्रुतिस्मृति- | प्राप्त होता है]" इत्यादि सैकड़ों शतेभ्यः । | श्रुति-स्मृतियोंसे अवशिष्ट कर्मके | सद्भावकी सिद्धि होती ही है । इष्टानिष्टफलानामनालब्धानां | पूर्व०-इष्ट और अनिष्ट दोनों | प्रकारके फल देनेवाले सञ्चित कर्मों- क्षयार्थानि नित्यानीति चेत् ? | का क्षय करनेके लिये ही नित्यकर्म | हैं-ऐसी बात हो तो ? न; अकरणे प्रत्यवायश्रव- | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि उन्हें | न करनेपर प्रत्यवाय होता है-ऐसा णात् । प्रत्यवायशब्दो ह्यनिष्ट- | सुना गया है। 'प्रत्यवाय' शब्द | अनिष्टका ही सूचक है। नित्य- विषयः । नित्याकरणनिमित्तस्य | कर्मोंके न करनेके कारण जो प्रत्यवायस्य दुःखरूपस्यागामिनः | आगामी दुःखरूप प्रत्यवाय होता है | उसका नाश करनेके लिये ही परिहारार्थानि नित्यानीत्यभ्युप- | नित्यकर्म हैं-ऐसा माना जानेके | कारण वे सञ्चित कर्मोंके क्षयके लिये गमान्नानारब्धफलकर्मक्षयार्थानि । | नहीं हो सकते। यदि ना़मानारब्धकर्मक्षया- | और यदि नित्यकर्म, जिनका | फल अभी आरम्भ नहीं हुआ है उन र्थानि नित्यानि कर्माणि तथा- | कर्मोंके क्षयके लिये हों भी तो भी | वे अशुद्ध कर्मका ही क्षय करेंगे, प्यशुद्धमेव क्षपयेयुर्न शुद्धम् । | शुद्धका नहीं; क्योंकि उनसे तो विरोधाभावात् । न हीष्टफलस्य | उनका विरोध ही नहीं है। जिनका | फल इष्ट है उन कर्मोंका तो शुद्ध- कर्मणः शुद्धरूपत्वान्नित्यैर्विरोध | रूप होनेके कारण नित्यकर्मोंसे उपपद्यते । शुद्धाशुद्धयोर्हि विरो- | विरोध होना सम्भव ही नहीं है। | विरोध तो शुद्ध और अशुद्ध कर्मोंका धो युक्तः । | ही होना उचित है। तै० उ० ३-४- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri