तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ
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अनु० ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७
| संस्कृत मूल एवं भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तैस्तत्कर्मत्वात् । कुर्वाणा निर्वर्त- | धातुका अर्थ विस्तार करना ही है; |
| यन्ती, अचीरमचिरं क्षिप्रमेव, | कुर्वाणा—करनेवाली; अचीरम्— |
| छान्दसो दीर्घः; चिरं वा कुर्वा- | अचिर अर्थात् शीघ्र ही; 'अचीरम्' में |
| णा आत्मनो मम, किमित्याह— | दीर्घ ईकार वैदिक प्रक्रियाके अनुसार |
| वासांसि वस्त्राणि मम गावश्च | है । अथवा चिरं ( चिरकालतक ) |
| गाश्चेति यावत्, अन्नपाने च | आत्मनः—मेरे लिये करनेवाली, क्या |
| सर्वदैवमादीनि कुर्वाणा श्रीर्या | करनेवाली ? सो बतलाते हैं—मेरे वस्त्र, |
| तां ततो मेधानिर्वर्तनात्परमा- | गौ और अन्न-पान इन्हें जो श्री सदा |
| वहानय । अमेधसो हि श्रीरन- | ही करनेवाली है उसे, बुद्धि प्राप्त |
| र्थायैवेति । | करानेके अनन्तर तू मेरे पास ला; क्योंकि बुद्धिहीनके लिये तो लक्ष्मी अनर्थका ही कारण होती है । |
| किंविशिष्टाम् । लोमशामजाव्या- | किन विशेषणोंसे युक्त श्रीको |
| दियुक्तामन्यैश्च पशुभिः संयुक्ता- | लावे ? लोमश अर्थात् भेड़-बकरी |
| मावहेत्यधिकारादोङ्कार एवाभि- | आदि ऊनवालोंके सहित और अन्य |
| संबध्यते । स्वाहा स्वाहाकारो | पशुओंसे युक्त श्रीको ला । यहाँ 'आवह' क्रियाका अधिकार होनेके कारण [ उसके कर्ता ] ओंकारसे ही सम्बन्ध |
| होमार्थमन्त्रान्तज्ञापनार्थः । आ- | है । स्वाहा—यह स्वाहाकार होमार्थ मन्त्रोंका अन्त सूचित करनेके लिये |
| यन्तु मामिति व्यवहितेन सं- | है । [ 'आ मायन्तु ब्रह्मचारिणः' इस वाक्यमें ] 'आयन्तु माम्' इस प्रकार |
| बन्धः । ब्रह्मचारिणो विमायन्तु | 'आ' का व्यवधानयुक्त 'यन्तु' शब्दसे सम्बन्ध है । [ इसी प्रकार मेरे प्रति ] |
| प्रमायन्तु दमायन्तु शमायन्वित्- | ब्रह्मचारीलोग निष्कपट हों । वे प्रमा- |
| त्यादि ॥१-२॥ | को धारण करें, इन्द्रिय-निग्रह करें, मनोनिग्रह करें, इत्यादि ॥ १-२ ॥ |