भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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३७४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग- न्यायकन्दली तदानीं शरीरस्य निष्क्रियत्वात् । नापि हस्तक्रियाकार्यो भवितुमर्हति, व्यधिकरणस्य कर्मणो विभागहेतुत्वादर्शनात् । अतः कारणाकारणविभागस्तस्य कारणमिति कल्प्यते । आकाशादावित्यादिपदं समस्तविभुद्रव्यावरोधार्थम् । अत एव विभागानिति बहुवचनम्, तद्विभागानां बहुत्वात् । अत्राहुरेके-कुड्यादिदेशाद्धस्तशरीरविभागयोर्युगपद्भावप्रतीतेस्तयोः कार्यकारणभावा- भिधानं प्रत्यक्षविरुद्धमिति । तदसङ्गतम्, हस्तविभागकाले शरीरविभागोत्पत्तिकारणा- भावात् । न चासति कारणे कार्योत्पत्तिरस्ति, हस्तक्रिया च न कारणमित्युक्तम् । तस्मात् तयोर्युगपदभिमानो भ्रान्तः । अनुमानगम्यः क्रमभावः, प्रत्यक्षसिद्धं च यौगपद्यम्, प्रत्यक्षे च परिपन्थि- न्यनुमानस्योत्पत्तिरेव नास्ति, अबाधितविषयत्वाभावात् । कथं तदनुरोधात् प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वमिति चेत् ? उत्पलपत्रशतव्यतिभेदेऽपि कुतोऽनुमानप्रवृत्तिः ? प्रत्यक्षविरोधात् । अथ मन्यसे तत्र प्रत्यक्षविरोधादनुमानं नोदेति, यत्रानेन शरीर का भी उससे विभाग देखा जाता है । यह (शरीर और दीवाल का विभाग शरीर की) क्रिया से उत्पन्न नहीं होता है; क्योंकि शरीर उस समय निष्क्रिय रहता है । हाथ की क्रिया से वह (शरीर और दीवाल का) विभाग उत्पन्न नहीं हो सकता; क्योंकि एक आश्रय में रहनेवाली क्रिया से उस आश्रयरूप देश से भिन्न देशों में विभाग की उत्पत्ति नहीं देखी जाती है । अतः यह कल्पना करते हैं कि (शरीर के) कारण हाथ और अकारणीभूत प्रदेशों का विभाग ही उस विभाग का कारण है । 'आकाशादि' शब्द में प्रयुक्त 'आदि' शब्द सभी विभु द्रव्यों का संग्राहक है । इसी कारण 'विभागान्' यह बहुवचनान्त प्रयोग भी है; क्योंकि उनके विभाग भी बहुत हैं । इस प्रसङ्ग में कोई कहते हैं कि (प्र.) दीवाल प्रभृति देशों की, हाथ और शरीर दोनों के साथ, दोनों विभागों की प्रतीति एक ही समय होती है । अतः उन दोनों विभागों में से एक को कारण मानना और दूसरे को कार्य मानना प्रत्यक्ष के विरुद्ध है । (उ.) किन्तु यह ठीक नहीं है; क्योंकि जिस समय दीवाल से हाथ का विभाग उत्पन्न होता है, उस समय दीवाल से शरीर के विभाग की उत्पत्ति होने का कारण नहीं रहता है । कारणों के न रहने से कार्यों की उत्पत्ति सम्भव नहीं है । पहले कह चुके हैं कि हाथ की क्रिया उस (दीवाल और शरीर के विभाग) का कारण नहीं है । अतः यह कहना भ्रान्त, अभिमान (मूलक) ही है कि हाथ एवं शरीर दोनों से (दीवाल प्रभृति के) एक ही समय दो विभाग उत्पन्न होते हैं । (प्र.) उक्त दोनों विभागों का एक समय में उत्पन्न होना प्रत्यक्ष प्रमाण से सिद्ध है एवं उन दोनों विभागों का क्रमशः उत्पन्न होना अनुमान से सिद्ध होता है । प्रत्यक्ष से विरुद्ध अनुमान की उत्पत्ति सम्भव नहीं है; क्योंकि अनुमान के विषय का प्रत्यक्ष के द्वारा बाधित न होना आवश्यक है । तो फिर अयौगपद्य के अनुमान से यौगपद्य के प्रत्यक्ष