वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ९ ] अन्धकासुरकी विजिगीषा, देवों और असुरोंके वाहनों एवं युद्धका वर्णन ५१ अन्धकस्य रथो दिव्यो युक्तः परमवाजिभिः । कृष्णवर्णैः सहस्रारस्त्रिनल्वपरिमाणवान् ॥ २६ प्रह्लादस्य रथो दिव्यश्चन्द्रवर्णैर्हयोत्तमैः । उह्यमानस्तथाष्टाभिः श्वेतरुक्ममयः शुभः ॥ २७ विरोचनस्य च गजः कुजम्भस्य तुरंगमः । जम्भस्य तु रथो दिव्यो हयैः काञ्चनसंनिभैः ॥ २८ शङ्कुकर्णस्य तुरगो हयग्रीवस्य कुञ्जरः । रथो मयस्य विख्यातो दुन्दुभेश्च महोरगः । शम्बरस्य विमानोऽभूदयःशङ्कोर्मृगाधिपः ॥ २९ बलवृत्रौ च बलिनौ गदामुसलधारिणौ । पद्भ्यां दैवतसैन्यानि अभिद्रवितुमुद्यतौ ॥ ३० ततो रणोऽभूत् तुमुलः संकुलोऽतिभयंकरः । रजसा संवृतो लोको पिङ्गवर्णेन नारद ॥ ३१ नाज्ञासीच्च पिता पुत्रं न पुत्रः पितरं तथा । स्वानेवान्ये निजघ्नुर्वै परानन्ये च सुव्रत ॥ ३२ अभिद्रुतो महावेगो रथोपरि रथस्तदा । गजो मत्तगजेन्द्रं च सादी सादिनमभ्यगात् ॥ ३३ पदातिरपि संक्रुद्धः पदातिनमथोल्बणम् । परस्परं तु प्रत्यघ्ननन्योन्यजयकाङ्क्षिणः ॥ ३४ ततस्तु संकुले तस्मिन् युद्धे दैवासुरे मुने । प्रावर्तत नदी घोरा शमयन्ती रणाद्रजः ॥ ३५ शोणितोदा रथावर्त्ता योधसंघट्टवाहिनी । गजकुम्भमहाकूर्मा शरमीना दुरत्यया ॥ ३६ तीक्ष्णाग्रप्रासमकरा महासिग्राहवाहिनी । अन्त्रशैवालसंकीर्णा पताकाफेनमालिनी ॥ ३७ गृध्रकङ्कमहाहंसा श्येनचक्राह्वमण्डिता । वनवायसकादम्बा गोमायुश्वापदाकुला ॥ ३८ पिशाचमुनिसंकीर्णा दुस्तरा प्राकृतैर्जनैः । रथप्लवैः संतरन्तः शूरास्तां प्रजगाहिरे ॥ ३९ आगुल्फादवमज्जन्तः सूदयन्तः परस्परम् । समुत्तरन्तो वेगेन योधा जयधनेप्सवः ॥ ४० अश्वोंसे परिचालित होता था। वह हजार अरों- पहियेकी नाभि और नेमिके बीचकी लकड़ियोंसे युक्त बारह सौ हाथोंका परिमाणवाला था। प्रह्लादका दिव्य रथ सुन्दर एवं सुवर्ण-रजत-मण्डित था। उसमें चन्द्रवर्णवाले आठ उत्तम घोड़े जुते हुए थे। विरोचनका वाहन हाथी था एवं कुजम्भ घोड़ेपर सवार था। जम्भका दिव्य रथ स्वर्णवर्णके घोड़ोंसे युक्त था ॥ २५-२८॥ इसी प्रकार शंकुकर्णका वाहन घोड़ा, हयग्रीवका हाथी और मय दानवका वाहन दिव्य रथ था। दुन्दुभिका वाहन विशाल नाग था। शम्बर विमानपर चढ़ा हुआ था तथा अयःशंकु सिंहपर सवार था। गदा और मुसलधारी बलवान् बल और वृत्र पैदल थे; पर देवताओंकी सेनापर चढ़ाई करनेके लिये उद्यत थे। फिर अति भयङ्कर घमासान युद्ध प्रारम्भ हो गया। नारदजी! समस्त लोक पीली धूलसे ढक गया, जिससे पिता पुत्रको और पुत्र पिताको भी परस्पर एक-दूसरेको पहचान नहीं पाते थे। सुव्रत ! कुछ लोग अपने ही पक्षके लोगोंको तथा कुछ लोग विरोधी पक्षके लोगोंको मारने लगे ॥ २९-३२॥ उस युद्धमें रथके ऊपर रथ और हाथीके ऊपर हाथी टूट पड़े तथा घुड़सवार घुड़सवारोंकी ओर वेगसे आक्रमण करने लगे। इसी प्रकार पादचारी (पैदल) सैनिक क्रुद्ध होकर अन्य बलशाली पैदलोंपर चढ़ बैठे। इस प्रकार एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे सभी परस्पर प्रहार करने लगे। मुने! उसके बाद देवताओं और असुरोंके उस घोर संग्राममें युद्धसे उत्पन्न धूलिको शान्त करती हुई रक्तरूपी जलधारावाली एवं रथरूपी भँवरवाली और योद्धाओंके समूहको बहा ले जानेवाली एवं गजकुम्भरूपी महान् कूर्म तथा शररूपी मीनसे युक्त बड़ी भारी नदी बह चली ॥ ३३-३६ ॥ उस नदीमें तेज धारवाले प्रास (एक प्रकारका अस्त्र) ही मकर थे, बड़ी-बड़ी तलवारें ही ग्राह थीं, उसमें आँतें ही शैवाल, पताका ही फेन, गृध्र एवं कङ्क पक्षी महाशंख, बाज ही चक्रवाक और जंगली कौवे ही मानो कलहंस थे। वह नदी शृगालरूपी हिंस्र एवं पिशाचरूपी मुनियोंसे संकीर्ण थी और साधारण मनुष्योंसे दुस्तर थी। जयरूप धनकी इच्छावाले शूर योद्धा लोग घुटनोंतक डूबते और एक-दूसरेको मारते हुए रथरूपी नौकाओंद्वारा उस नदीको वेगसे पार कर रहे थे ॥ ३७-४० ॥