भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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पृष्ठ 60
५०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अग्रतो द्वादशादित्याः पृष्ठतश्च त्रिलोचनाः ।<br>मध्येऽष्टौ वसवो विश्वे साध्याश्चिमरुतां गणाः ।<br>यक्षविद्याधराद्याश्च स्वं स्वं वाहनमास्थिताः ॥ १२निकल पड़ी। सेनाके आगे-आगे बारहोंने आदित्य और उनके पृष्ठभागमें ग्यारह रुद्रगण थे। उसके मध्यमें आठों वसु, तेरहों विश्वेदेव, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, यक्ष, विद्याधर आदि अपने-अपने वाहनपर सवार होकर चल रहे थे॥ ८—१२॥
नारद उवाच<br>रुद्रादीनां वदस्वेह वाहनानि च सर्वशः ।<br>एकैकस्यापि धर्मज्ञ परं कौतूहलं मम ॥ १३नारदजीने पूछा— धर्मज्ञ! रुद्र आदिके वाहनोंका एक-एक कर पूरी तरह वर्णन कीजिये। इस विषयमें मुझे बड़ी उत्सुकता हो रही है॥ १३॥
पुलस्त्य उवाच<br>शृणुष्व कथयिष्यामि सर्वेषामपि नारद ।<br>वाहनानि समासेन एकैकस्यानुपूर्वशः ॥ १४<br>रुद्रहस्ततलोत्पन्नो महावीर्यो महाजवः ।<br>श्वेतवर्णो गजपतिर्देवराजस्य वाहनम् ॥ १५<br>रुद्रोरुसंभवो भीमः कृष्णवर्णो मनोजवः ।<br>पौण्ड्रको नाम महिषो धर्मराजस्य नारद ॥ १६<br>रुद्रकर्णमलोद्भूतः श्यामो जलधिसंज्ञकः ।<br>शिशुमारो दिव्यगतिः वाहनं वरुणस्य च ॥ १७<br>रौद्रः शकटचक्राक्षः शैलाकारो नरोत्तमः ।<br>अम्बिकापादसंभूतो वाहनं धनदस्य तु ॥ १८पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! सुनिये; मैं एक-एक करके क्रमशः सभी देवताओंके वाहनोंका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ। रुद्रके करतलसे उत्पन्न अति पराक्रमवाला, अति तीव्रगतिवाला, श्वेतवर्णका ऐरावत हाथी देवराज (इन्द्र)-का वाहन है। हे नारद! रुद्रके ऊरुसे उत्पन्न भयंकर कृष्णवर्णवाला एवं मनके सदृश गतिमान् पौण्ड्रक नामक महिष धर्मराजका वाहन है। रुद्रके कर्ण-मलसे उत्पन्न श्यामवर्णवाला दिव्यगतिशील जलधि नामक शिशुमार (सूँस) वरुणका वाहन है। अम्बिकाके चरणोंसे उत्पन्न गाड़ीके चक्केके समान भयंकर आँखवाला, पर्वताकार नरोत्तम कुबेरका वाहन है॥ १४-१८॥
एकादशानां रुद्राणां वाहनानि महामुने ।<br>गन्धर्वाश्च महावीर्या भुजगेन्द्राश्च दारुणाः ।<br>श्वेतानि सौरभेयाणि वृषाण्युग्रजवानि च ॥ १९<br>रथं चन्द्रमसश्चार्द्धसहस्रं हंसवाहनम् ।<br>हरयो रथवाहाश्च आदित्या मुनिसत्तम ॥ २०<br>कुञ्जरस्थाश्च वसवो यक्षाश्च नरवाहनाः ।<br>किन्नरा भुजगारूढा हयारूढौ तथाश्विनौ ॥ २१<br>सारङ्गाधिष्ठिता ब्रह्मन् मरुतो घोरदर्शनाः ।<br>शुकारूढाश्च कवयो गन्धर्वाश्च पदातिनः ॥ २२हे महामुने! एकादश रुद्रोंके वाहन महापराक्रमशाली गन्धर्वगण, भयंकर सर्पराजगण तथा सुरभिके अंशसे उत्पन्न तीव्रगतिवाले सफेद बैल हैं। मुनिश्रेष्ठ! चन्द्रमाके रथको खींचनेवाले आधे हजार (पाँच सौ) हंस हैं। आदित्योंके रथके वाहन घोड़े हैं। वसुओंके वाहन हाथी, यक्षोंके वाहन नर, किन्नरोंके वाहन सर्प एवं अश्विनीकुमारोंके वाहन घोड़े हैं। ब्रह्मन्! भयंकर दीखनेवाले मरुद्गणोंके वाहन हरिण हैं, भृगुओंके वाहन शुक हैं और गन्धर्वलोग पैदल ही चलते हैं॥ १९—२२॥
आरुह्य वाहनान्येवं स्वानि स्वान्यमरोत्तमाः ।<br>संनह्य निर्ययुर्हृष्टा युद्धाय सुमहौजसः ॥ २३इस प्रकार बड़े तेजस्वी श्रेष्ठ देवगण अपने-अपने वाहनोंपर आरूढ़ एवं संनद्ध (तैयार) होकर प्रसन्नतापूर्वक युद्धके लिये निकल पड़े॥ २३॥
नारद उवाच<br>गदितानि सुरादीनां वाहनानि त्वया मुने ।<br>दैत्यानां वाहनान्येवं यथावद् वक्तुमर्हसि ॥ २४नारदने कहा— मुने! आपने देवादिकोंके वाहनोंका वर्णन किया; इसी प्रकार अब असुरोंके वाहनोंका भी यथावत् वर्णन करें॥ २४॥
पुलस्त्य उवाच<br>शृणुष्व दानवादीनां वाहनानि द्विजोत्तम ।<br>कथयिष्यामि तत्त्वेन यथावच्छ्रोतुमर्हसि ॥ २५पुलस्त्यजी बोले— द्विजोत्तम! (अब) दानवोंके वाहनको सुनो। मैं तत्त्वतः उनका ठीक-ठीक वर्णन करता हूँ। अन्धकका अलौकिक रथ कृष्णवर्णके श्रेष्ठ