वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
पृष्ठ 59, कुल 489 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 59
अध्याय ९ ] अन्धकासुरकी विजिगीषा, देवों और असुरोंके वाहनों एवं युद्धका वर्णन [ ४९
नवाँ अध्याय
अन्धकासुरकी विजिगीषा, देवों और असुरोंके वाहनों एवं युद्धका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नारद उवाच<br>नेत्रहीनः कथं राज्ये प्रह्लादेनान्धको मुने।<br>अभिषिक्तो जानताऽपि राजधर्मं सनातनम्॥ १ | **नारदजीने कहा—**मुने! प्रह्लादजी सनातन राजधर्मको भलीभाँति जानते थे। ऐसी दशामें उन्होंने नेत्रहीन अन्धकको राजगद्दीपर कैसे बैठाया ? ॥ १ ॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>लब्धचक्षुरसौ भूयो हिरण्याक्षेऽपि जीवति।<br>ततोऽभिषिक्तो दैत्येन प्रह्लादेन निजे पदे॥ २ | **पुलस्त्यजी बोले—**हिरण्याक्षके जीवनकालमें ही अन्धकको पुनः दृष्टि प्राप्त हो गयी थी, अतः दैत्यवर्य प्रह्लादने उसे अपने पदपर अभिषिक्त किया था ॥ २ ॥ |
| नारद उवाच<br>राज्येऽन्धकोऽभिषिक्तस्तु किमाचरत सुव्रत।<br>देवादिभिः सह कथं समास्ते तद् वदस्व मे॥ ३ | **नारदजीने पूछा—**सुव्रत! मुझे यह बतलाइये कि अन्धकने राज्यपर अभिषिक्त होनेपर क्या-क्या किया तथा वह देवताओं आदिके साथ कैसा व्यवहार करता था ॥ ३ ॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>राज्येऽभिषिक्तो दैत्येन्द्रो हिरण्याक्षसुतोऽन्धकः।<br>तपसाराध्य देवेशं शूलपाणिं त्रिलोचनम्॥ ४<br><br>अजेयत्वमवध्यत्वं सुरसिद्धर्षिपन्नगैः।<br>अदाह्यत्वं हुताशेन अक्लेद्यत्वं जलेन च॥ ५<br><br>एवं स वरलब्धस्तु दैत्यो राज्यमपालयत्।<br>शुक्रं पुरोहितं कृत्वा समध्यास्ते ततोऽन्धकः॥ ६<br><br>ततश्चक्रे समुद्योगं देवानामान्धकोऽसुरः।<br>आक्रम्य वसुधां सर्वां मनुजेन्द्रान् पराजयत्॥ ७ | **पुलस्त्यजी बोले—**हिरण्याक्षके पुत्र दैत्यराज अन्धकने राज्य प्राप्त करके तपस्याद्वारा शूलपाणि भगवान् शंकरकी आराधना की और उनसे देवता, सिद्ध, ऋषि एवं नागोंद्वारा नहीं जीते जाने और नहीं मारे जानेका वर प्राप्त कर लिया। इसी प्रकार वह अग्निके द्वारा न जलने, जलसे न भीगने आदिका भी वरदान प्राप्त कर राज्यका संचालन कर रहा था। उसने शुक्राचार्यको अपना पुरोहित बना लिया था। फिर अन्धकासुरने देवताओंको जीतनेका उपक्रम (आरम्भ) किया और उन्हें जीतकर सम्पूर्ण पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया—सभी श्रेष्ठ राजाओंको परास्त कर दिया॥ ४—७॥ |
| पराजित्य महीपालान् सहायार्थे नियोज्य च।<br>तैः समं मेरुशिखरं जगामाद्भुतदर्शनम्॥ ८<br><br>शक्रोऽपि सुरसैन्यानि समुद्योज्य महागजम्।<br>समारुह्यामरावत्यां गुप्तिं कृत्वा विनिर्ययौ॥ ९<br><br>शक्रस्यानु तथैवान्ये लोकपाला महौजसः।<br>आरुह्य वाहनं स्वं स्वं सायुधा निर्ययुर्बहिः॥ १०<br><br>देवसेनाऽपि च समं शक्रेणाद्भुतकर्मणा।<br>निर्जगामातिवेगेन गजवाजिरथादिभिः॥ ११ | उसने सभी राजाओंको पराजित कर उन्हें (सामन्त बनाकर) अपनी सहायतामें नियुक्त कर दिया। फिर उनके साथ वह सुमेरुगिरि पर्वतको देखनेके लिये उसके अद्भुत शिखरपर गया। इधर इन्द्र भी देवसेनाको तैयारकर और अमरावतीमें सुरक्षाकी व्यवस्था कर अपने ऐरावत हाथीपर सवार होकर युद्धके लिये बाहर निकले। इसी प्रकार दूसरे तेजस्वी लोकपालगण भी अपने-अपने वाहनोंपर सवार होकर तथा अपने अस्त्र लेकर इन्द्रके पीछे-पीछे चल पड़े। हाथी, घोड़े, रथ आदिसे युक्त देवसेना भी बड़े अद्भुत पराक्रमी इन्द्रके साथ तेजीसे |