भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १२८ ] क्षत्रियादि दीक्षा, गणान्तिकादीक्षा तथा दीक्षित पुरुषके कर्तव्य २२३


चाहिये। हवनके पश्चात् घुटनोंके बल जमीनपर झुककर इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये। मन्त्रका भाव यह है—'दोनों अश्विनीकुमार, दसों दिशाएँ, सूर्य और चन्द्रमा—ये सभी इस कार्यमें साक्षी हैं। सत्यके बलपर ही पृथ्वी तथा आकाश अवलम्बित हैं। सत्यके बलसे ही सूर्य गतिशील हैं तथा पवनदेव प्रवाहित होते हैं।' तदनन्तर मन्त्रपूर्वक विधिके साथ आचार्यकी पूजा कर उन्हें प्रसन्न करना चाहिये। गुरुको भगवान्‌में भक्ति रखनेवाला एवं दिव्य पुरुष होना चाहिये। फिर तीन बार गुरुकी प्रदक्षिणा कर उनके चरणोंको श्रद्धापूर्वक पकड़ ले और कहे—'गुरुदेव! मैं आपकी कृपा तथा इच्छाके अनुसार 'दीक्षा-ग्रहण-कर्म' में उद्यत हुआ हूँ। मुझसे कुछ अनुचित हुआ हो तो आप उसे क्षमा करनेकी कृपा करें। फिर स्वयं वह पूरब दिशाकी ओर मुख करके बैठ जाय। इस समय गुरुकी दृष्टि केवल शिष्यपर ही रहनी चाहिये। गुरुका कर्तव्य है कि हाथमें कमण्डलु एवं यज्ञोपवीत लेकर कहे—'शिष्य! भगवान् विष्णुकी कृपासे तुम्हें यह सुअवसर प्राप्त हुआ है। साथ ही सिद्धदीक्षा और कमण्डलु—ये वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं। कर्मके प्रभावसे दीक्षासम्बन्धी इस शुभ अवसरपर तुम अपने हाथोंमें कमण्डलु ले लो। इसके बाद गुरु उसे मन्त्रकी दीक्षा दें।

दीक्षाप्राप्त पुरुष गुरुके चरणोंपर मस्तक रखकर प्रणाम करे और उनकी प्रदक्षिणा कर इस प्रकार कहे—'गुरुदेव! मैंने अब आपकी शरण प्राप्त की है। आपके द्वारा मुझे 'वैष्णवी दीक्षा' सुलभ हो गयी, यह आपकी कृपाका फल है।' फिर गुरु उसे उठाकर शुद्ध जलसे भरा कमण्डलु तथा दिव्य तन्तुओंद्वारा निर्मित एक वस्त्र शिष्यको दें। उस समय गुरुको कहना चाहिये—'वत्स! तुम यह वस्त्र तथा पवित्र जल-भरा पवित्र कमण्डलु ग्रहण करो। पुनः शिष्य गुरुको चन्दन लगाकर हाथमें मधुपर्क लेकर कहे—'भगवन्! आप पार्थिव शरीरको शुद्ध करनेवाले इस मधुपर्कको ग्रहण कीजिये।'

तत्पश्चात् शिष्यको गुरुके चरणोंको पकड़कर उन्हें यत्नपूर्वक संतुष्ट करना चाहिये। फिर मनपर संयम रखते हुए अञ्जलिको मस्तकसे लगाकर गुरुप्रदत्त मन्त्रको हृदयमें धारण करे और कहे—'भगवान्‌में भक्ति रखनेवाले सभी पुरुष मेरी बात सुननेकी कृपा करें। गुरुदेवने मेरी सभी कामनाओंको पूर्ण कर दिया। मैं इनका सेवक और शिष्य हो गया और ये देवताके समान मेरे गुरु हो गये।'

वसुंधरे! आगम (वैष्णव) शास्त्रोंमें ब्राह्मणकी दीक्षाकी यही विधि कही गयी है। अब जो अन्य तीन वर्णोंके लिये दीक्षाकी विधि है, वह भी मुझसे सुनो। [अध्याय १२७]


क्षत्रियादि दीक्षा एवं गणान्तिकादीक्षाकी विधि तथा दीक्षित पुरुषके कर्तव्य

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! मैंने ब्राह्मण-दीक्षाके समय जिन वस्तुओंके संग्रहकी बात कही है, क्षत्रियको भी उन सबको एकत्र करना चाहिये। उसे केवल एक कृष्णसार मृगका चर्म नहीं लाना चाहिये। इसी प्रकार उसे पलाशके स्थानपर पीपल-वृक्षका दण्ड ग्रहण करना चाहिये और काले मृगके चर्मकी जगह काले बकरेका चर्म लेना चाहिये। उसकी दीक्षावेदी भी सोलह हाथकी जगह बारह हाथके प्रमाणकी हो। उसको गोबरसे लीप दे।

तदनन्तर गुरुके पैरोंको पकड़कर वह कहे—'विष्णो! मैंने सम्पूर्ण शस्त्रों एवं क्षत्रियके क्रूर कर्मोंका परित्याग कर दिया है और मैं अब आप विष्णुस्वरूप गुरुदेवकी शरणमें आ गया हूँ। आप जन्म-मरणरूपी संसार-सागरसे मेरा उद्धार कीजिये। इस प्रकार गुरुसे प्रार्थना कर उनमें मेरी भावना