वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 240, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १३१-१३२ ] दातुन न करने तथा मृतक एवं रजस्वलाके स्पर्शका प्रायश्चित्त २२९
राजाके अन्न-भक्षणका प्रायश्चित्त
पृथ्वी बोलीं— प्रभो! आपकी दीक्षाका माहात्म्य अत्यद्भुत है। महाभाग! इसे सुनकर मैं अत्यन्त निर्मल हो गयी। किंतु मेरे मनमें एक शङ्का रह गयी है। आपने इसके पूर्व बत्तीस प्रकारके अपराध कहे हैं। यदि अल्पबुद्धिवाले मनुष्यद्वारा इनमेंसे कोई अपराध बन जाता है तो उसकी शुद्धि किस प्रकार हो? माधव! आप मुझे इसे बतानेकी कृपा करें।
भगवान् वराह बोले— देवि! मेरी उपासनामें संलग्न रहनेवाले शुद्ध भागवत पुरुष यदि लोभ अथवा भयसे राजाका अन्न खाते हैं तो उन्हें दस हजार वर्षोंतक नरककी यातनाएँ सहनी पड़ती हैं।
भगवान्की यह बात सुनकर पृथिवीदेवी काँप उठीं। वे अत्यन्त दीन-मन होकर भगवान्से मधुर वचनोंमें फिर इस प्रकार कहने लगीं।
पृथ्वी बोलीं— भगवन्! राजाओंमें ऐसा कौन-सा दोष है, जिससे उनका अन्न खानेसे प्राणीको नरकमें जाना पड़ता है?
भगवान् वराह बोले— पृथ्वि! राजाका अन्न कभी खाने योग्य नहीं है। राजा यथासम्भव संसारमें यद्यपि सबसे समान भावसे ही व्यवहार करता है, फिर भी उससे दारुण राजस या तामस कर्म भी घटित हो जाते हैं, इसलिये पृथिवीदेवि! राजाका अन्न गर्हित—निन्द्य बतलाया गया है। अतएव जगत्में सम्यक् प्रकारसे धर्मका आचरण करनेवाले व्यक्तिको राजाका अन्न खाना उचित नहीं है। वसुंधरे! अब भक्तोंको जिस प्रकार राजाका अन्न खाना चाहिये, मैं उन-उन प्रक्रियाओंको बताता हूँ, उसे सुनो। पहले राजाको चाहिये कि वह शास्त्रीय विधिके अनुसार मन्दिर बनवाकर उसमें मेरी प्रतिष्ठा करे और फिर भक्त-भागवतोंको धन-धान्य-समृद्धि आदि प्रदानकर वैष्णवोंद्वारा मेरा नैवेद्य तैयार कराकर मुझे समर्पित करके भोजन करे-कराये। इस प्रकार राजाका अन्न खानेसे भागवतों (मेरे भक्तों)-को अन्नका दोष नहीं लगता।
पृथ्वी बोलीं— जनार्दन! यदि कोई मनुष्य आपका भक्त अनजानमें राजान्न-भक्षण कर लेता है तो वह कौन-सा कर्म करे; जिससे उसकी शुद्धि हो जाय?
भगवान् वराह बोले— देवि! एक बार चान्द्रायण या सांतपन-व्रत (छः रात्रियोंका उपवास)-के अनुष्ठान अथवा कई बार तप्तकृच्छ्र-व्रत (जल, दूध और घीको एक साथ गर्मकर एक दिन पीने तथा दूसरे दिन उपवास)-के आचरणद्वारा मनुष्य राजान्न-भक्षणके दोषसे छुटकारा प्राप्त कर लेता है और उसमें लेशमात्र भी दोष नहीं रह जाता। राजाका अन्न खाना उचित नहीं है। विशेषकर उसे जो मेरी पूजा-आराधना करता हुआ जीवन व्यतीत करना चाहता या उत्तम गति पानेकी चेष्टा करता है। [अध्याय १३०]
दातुन न करने तथा मृतक एवं रजस्वलाके स्पर्शका प्रायश्चित्त
भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! जो मानव दातुनका प्रयोग न कर मेरी उपासनामें सम्मिलित होता है, उसके इस एक अपकर्मसे ही पूर्वके किये हुए सारे धर्म नष्ट हो जाते हैं। मनुष्यका शरीर नाना प्रकारके मल एवं गंदे द्रव्योंसे भरा है। यह देह कफ, पित्त, पीब, रक्त आदिसे युक्त है और मनुष्यका मुख दुर्गन्धपूर्ण रहता है। दातुन करनेसे मुँहकी दुर्गन्ध सर्वथा नष्ट हो जाती है। पवित्रता भगवान् तथा देवताओंको प्रिय है और सदाचारसे वह बढ़ती है।