भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 308

अध्याय १६३ ] 'कपिल-वराह' का माहात्म्य २९७

अपने रहनेका प्रबन्ध किया। उस समय मथुरामें कान्यकुब्जके महाराज कुशिकका नित्य-सत्र चल रहा था, जिस सत्रमें प्रतिदिन दो हजार ब्राह्मण भोजन करते थे। वहाँ ब्राह्मणोंके खाते समय छूटे हुए जूठे (उच्छिष्ट) अन्नके खानेसे उस ब्राह्मण-कुमारका उद्धार हो गया। वह सदा 'चक्रतीर्थ' में जाकर स्नान करता। न किसीके घर वह भिक्षा माँगता और न कहीं अन्यत्र ही जाता था।

वसुंधरे! बहुत दिनोंके बाद उसके श्वशुरके मनमें उसकी चिन्ता हुई। उसने अपने दिव्य ज्ञानसे जामाताकी स्थिति ज्ञात कर ली और अपनी पुत्रीको आदेश दिया—'तुम भोजन लेकर अब मथुरापुरी जाओ; तुम्हारा पति वहीं है। वह कन्या भी योगसिद्धा एवं दिव्य ज्ञानसे सम्पन्न थी। अतएव अपने स्वामीको भोजन करानेके विचारसे वह प्रतिदिन उसके पास आने-जाने लगी और यह उसका नित्यका एक कार्यक्रम बन गया। सायंकाल भोजन लेकर वह ब्राह्मणपुत्री उस ब्राह्मणके पास जाती। वह ब्राह्मणकुमार पत्नीका दिया हुआ भोजन कर लेता और रात्रिमें उसी सत्रशालामें ही पड़ा रहता। इस प्रकार वहाँ निवास करते ब्राह्मणके छः महीने और व्यतीत हो गये। कुछ समयके पश्चात् वहाँ रहनेवाले ब्राह्मणोंने उससे पूछा—'आप यहाँ कहाँ निवास करते हैं और प्रतिदिन आपको भोजन कहाँसे प्राप्त होता है?'

अब उस ब्राह्मणने उन लोगोंसे अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त स्पष्ट कह दिया। इसे सुनकर वे सभी ब्राह्मण एकत्रित होकर उससे बोले—'द्विजवर ! अब तो आप सर्वथा शुद्ध हो गये हैं। इस 'चक्रतीर्थ' के प्रभावसे आपके सारे पाप दूर हो गये हैं। फिर हमलोगोंके शरीरसे सम्पर्क होनेके कारण आपके बचे-खुचे दूसरे पाप भी समाप्त हो गये हैं।' उन ब्राह्मणोंकी बात सुनकर उस ब्राह्मणका मन प्रसन्नतासे खिल उठा। अब वह स्नानार्थ पुनः 'चक्रतीर्थ' आया। यहाँ उसकी भार्या भोजन लेकर पहलेसे ही उपस्थित थी। उसने हर्षित मनसे अपने पतिसे कहा—'स्वामिन् ! मुझे ऐसा दिखायी पड़ता है कि आप अब ब्रह्महत्यासे सर्वथा मुक्त हो गये हैं।' पत्नीकी बात सुनकर उसने कहा—'प्रिये ! तुमने जो कहा है, उसे पुनः स्पष्ट करनेकी कृपा करो।' यह सुनकर पत्नीने कहा—'इससे पहले आप बात करनेमें भी अयोग्य हो चुके थे। क्योंकि आप उस समय ब्रह्महत्यासे ग्रस्त थे। द्विजवर ! अब आप 'चक्रतीर्थ' के प्रभावसे पापमुक्त हो गये हैं। कान्त ! अब आप उठें और परम पवित्र 'कल्पग्राम' को चलें।' तदनन्तर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण अपनी भार्याके साथ 'कल्पग्राम' चला गया। वसुंधरे ! उस परम पवित्र 'चक्रतीर्थ' में भगवान् 'भद्रेश्वर' विराजते हैं, जिनका दर्शन करनेसे तीर्थका फल प्राप्त होता है। वसुंधरे ! 'चक्रतीर्थ' के सेवनसे समग्र 'कल्पग्राम' की अपेक्षा भी सौगुना फल मिलता है। एक दिन-रात वहाँ उपवास करनेपर मनुष्यका ब्रह्महत्यासे भी उद्धार हो जाता है। [अध्याय १६१-१६२]


'कपिल-वराह' का माहात्म्य

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे ! मिथिला-प्रान्तमें जनकजीकी 'जनकपुरी' नामकी एक प्राचीन एवं परम रमणीय पुरी है, जहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये चारों वर्णोंके लोग निवास करते एवं तीर्थयात्रा आदिके लिये बाहरसे भी आते-जाते रहते थे। फिर वहाँके समीपवर्ती 'सौकरव-तीर्थ' में स्नानकर वे 'मथुरापुरी' की यात्रा करते थे; और वहाँ वे कुछ कालके लिये ठहर