वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २९८ | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [ अध्याय १६३ |
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जाते। उसी समाजमें एक ऐसा ब्राह्मण था, जिसके शरीरमें ब्रह्महत्याके चिह्न थे। उसके हाथसे सदा रुधिरकी धारा गिरती रहती थी, जिसे प्रायः सभी लोग देखते थे। वह ब्राह्मण उस हत्यासे मुक्त होनेके लिये सभी तीर्थोंमें भ्रमण-स्नान कर चुका था, फिर भी उसकी ब्रह्महत्या दूर न हुई। किंतु इसके बाद जब उसने 'वैकुण्ठ' तीर्थमें स्नान किया तो वह रुधिरधारा स्वतः बंद हो गयी। अब उसके सभी सहवासी आश्चर्यसे कहने लगे—'यह कैसे हो गया, यह कैसे हो गया!' उसी समय ब्राह्मणका रूप धारणकर एक दिव्य पुरुष वहाँ आया और उसने उन सभी उपस्थित लोगोंसे पूछा—'यहाँसे ब्रह्महत्या इस ब्राह्मणको छोड़कर कैसे चली गयी?' इसपर उन लोगोंने उसे उस ब्राह्मणके ब्रह्महत्यासे छूटनेके सारे प्रयत्न और अन्तमें 'वैकुण्ठ-तीर्थ' में स्नानद्वारा हत्यामुक्तिकी बात बतला दी, अतः इस तीर्थकी महिमामें किंचित् भी संदेह नहीं करना चाहिये।
सूतजी कहते हैं— ऋषियो! इसके बाद भगवान् वराहने पुनः पृथ्वीसे कहा—'देवि! यहाँ अमित पुण्य प्रदान करनेवाला 'असिकुण्ड' नामक एक दूसरा क्षेत्र है, अब मैं उसे बताता हूँ। उस क्षेत्रमें एक अन्य कुण्ड भी है, जिसे 'गन्धर्वकुण्ड' कहते हैं। वह सभी तीर्थोंमें प्रमुख है। वहाँ अवगाहन करनेवाला गन्धर्वोंके साथ आनन्द भोगता है और जो उस स्थानपर प्राणोंका त्याग करता है, वह मेरे लोकमें चला जाता है।
देवि! मथुरामण्डलकी सीमा बीस योजनमें है और सभीको मुक्ति देनेमें परम समर्थ उस पुरीकी आकृति कमलके समान है। इसकी कर्णिकाके मध्यभागमें क्लेशोंके नाशक भगवान् केशव विराजते हैं। इस स्थानपर जिनके प्राण प्रस्थान करते हैं, वे मुक्तिके भागी होते हैं। यही क्यों? मथुराके भीतर कहीं भी जिनकी मृत्यु होती है, वे सभी मुक्त हो जाते हैं। इस तीर्थके पश्चिम भागमें 'गोवर्धनपर्वत' है, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण निवास करते हैं। वहाँ उन देवेश्वरके दर्शन प्राप्त कर लेनेपर मनमें संताप नहीं रह जाता।
पृथ्वि! पूर्वकालमें मान्धाता नामके एक राजा थे। उनकी भक्तिपूर्वक स्तुतिसे प्रसन्न होकर मैंने उन्हें यह प्रतिमा सौंपी थी। राजा मान्धाताके मनमें मुक्ति पानेकी अभिलाषा थी, अतः वे नित्य इस प्रतिमाकी अर्चना करने लगे। जिस समय मथुरामें लवणासुरका वध हुआ था, उसी समय वह प्रतिमा इस तीर्थमें स्थापित की गयी थी। यह विग्रह परम दिव्य, पुण्यस्वरूप एवं तेजसे सम्पन्न है।
इसके मथुरा आनेकी कथा विचित्र है। कपिल नामके मुनिने अपार श्रद्धा और मनोयोगपूर्वक मेरी इस वाराही प्रतिमाका निर्माण किया था। ये विप्रवर कपिल प्रतिदिन इस प्रतिमाका ध्यान एवं पूजन करते थे। देवि! फिर इन्द्रने उन मुनिवर कपिलसे इसके लिये प्रार्थना की। तब कपिलने प्रसन्न होकर यह दिव्य रूपवाली प्रतिमा उन्हें दे दी। जब इन्द्रको यह प्रतिमा प्राप्त हुई तो उनके हृदयमें हर्ष भर गया और नित्यप्रति भक्तिके साथ मेरा पूजन करने लगे। इसके फलस्वरूप शक्रको सर्वोत्कृष्ट दिव्य ज्ञान प्राप्त हो गया। इन्द्रने मेरी इस 'कपिलवराह' नामक प्रतिमाकी बहुत वर्षोंतक पूजा की। इसके बाद रावणनामक दुर्दान्त राक्षस हुआ। वह महान् पराक्रमी निशाचर इन्द्रके लोकमें गया और स्वर्गको जीतनेकी चेष्टा करने लगा और देवराजके साथ युद्ध करने लगा। उसने देवताओंको परास्त कर दिया। परम पराक्रमी इन्द्र भी उससे हार गये और उन्हें बन्दी बनाकर