भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 310

अध्याय १६३ ] 'कपिल-वराह' का माहात्म्य २९९


रावण उनके भवनमें घुस गया। जब वह राक्षस रत्नोंसे सुशोभित इन्द्र-भवनमें गया तो उसे इन भगवान् ‘कपिलवराह’ के दर्शन हुए। देखते ही उसने अपना मस्तक जमीनपर टेक दिया और दीर्घकालतक इन श्रीहरिकी स्तुति की। इसपर भगवान् विष्णु सौम्यरूप धारणकर पुष्पक विमानपर आरूढ़ होकर उस राक्षसके पास आये। साथ ही उस विग्रहमें उनका प्रवेश हो गया। रावणने प्रतिमा उठानी चाही, किंतु वह उठा न सका। अब उसके आश्चर्यकी सीमा न रही। उसने कहा—'भगवन्! बहुत पहलेकी बात है, मैंने शंकरसहित कैलासपर्वतको भी अपने हाथोंसे उठा लिया था। आपकी आकृति तो बहुत ही छोटी है, फिर भी उठानेमें मेरी शक्ति कुण्ठित हो गयी है। देवेश्वर! आपको नमस्कार है। मुझपर प्रसन्न होनेकी कृपा करें। प्रभो! मेरी हार्दिक इच्छा है कि मैं आपको अपनी सर्वोत्तम पुरी लङ्कामें ले चलूँ।

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! उस समय मैंने 'कपिलवराह' के रूपमें रावणसे कहा था—'राक्षस! तुम अवैष्णव व्यक्ति हो। तुम्हें ऐसी भक्ति कहाँसे प्राप्त हो गयी?' तब मुझ 'कपिलवराह' की बात सुनकर रावणने कहा—'महात्मन्! आपके पवित्र दर्शनसे ही मुझे ऐसी अनन्य भक्ति सुलभ हो गयी है। देवेश्वर! आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। आप कृपया मेरी पुरीमें पधारें।' पृथ्वि! तब मेरी यह प्रतिमा हलकी हो गयी और रावण तीनों लोकोंमें विख्यात मेरी उस 'कपिलवराह' की प्रतिमाको पुष्पक विमानपर चढ़ाकर लङ्का ले आया और वहाँ उसे प्रतिष्ठित कर दी। तदनन्तर जब भगवान् रामने राक्षसराज रावणको मारकर लङ्काके राजसिंहासनपर विभीषणका अभिषेक किया तो विभीषणने श्रीरामसे प्रार्थना की—'प्रभो! यह सारा राज्य आपका है। आप इसे स्वीकार करें।'

श्रीरामजीने कहा—'राक्षसराज विभीषण! यह सब कुछ तुम्हारा है, इससे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। पर राक्षसेश्वर! इन्द्रके लोकसे रावणद्वारा जो 'कपिलवराह' की प्रतिमा यहाँ लायी गयी है, केवल उसे मुझे दे दो। उन वराहभगवान्की मैं प्रतिदिन पूजा करना चाहता हूँ। दानवेश्वर! मैं उन्हें अयोध्या ले जाऊँगा।' तब विभीषणने उस दिव्य प्रतिमाको श्रीरामको सादर समर्पण कर दिया। श्रीरामने उसे पुष्पक विमानपर रखकर अपनी नगरी अयोध्याके लिये प्रस्थान किया और अयोध्या पहुँचकर उसकी स्थापना की और प्रतिदिन पूजा करनेका नियम बना लिया। इस प्रकार दस वर्ष व्यतीत हो जानेपर श्रीरामने लवणासुरका वध करनेके लिये शत्रुघ्नको आज्ञा दी। उस समय वह राक्षस मथुरामें रहता था। शत्रुघ्नने महात्मा श्रीरामको प्रणाम किया और अपनी चतुरङ्गिणी सेना लेकर मथुराके लिये चल पड़े। लवणासुरका रूप बड़ा भयंकर था। सभी राक्षस उसे अपना नायक मानते थे। फिर भी शत्रुघ्नने उसका वध कर डाला। तत्पश्चात् शत्रुघ्न मथुरा नगरके भीतर गये और वहाँ उन्होंने अत्यन्त तेजस्वी छब्बीस हजार वेदके पारगामी ब्राह्मणोंको बसाया। जहाँ एक भी निवासी वेद नहीं जानता था, वहाँ चारों वेदोंके ज्ञाता पुरुष निवास करने लगे। अब वह स्थान ऐसा पवित्र बन गया, जहाँ एक भी ब्राह्मणको भोजन कराया जाय तो करोड़ ब्राह्मणोंके भोजन करानेके समान फल होने लगा।

पृथ्वि! फिर लौटनेपर जब शत्रुघ्नने लवणासुरके वधका यथावत् समाचार श्रीरामसे कहा, तब उस असुरकी मृत्युका वृत्तान्त सुनकर भगवान् राघवेन्द्रने