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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३००संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[अध्याय १६४-१६५

प्रसन्न होकर उनसे कहा—'शत्रुघ्न! तुम्हारे मनमें जिस वस्तुकी अभिलाषा हो, वह तुम मुझसे वरके रूपमें माँग लो। उस समय श्रीरामकी बात सुनकर शत्रुघ्नने कहा—'भगवन्! आप मेरे पूज्य हैं। यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और वर देना चाहते हैं तो मुझे यह भगवान् 'कपिलवराह' की प्रतिमा देनेकी कृपा करें।' तब शत्रुघ्नके वचन सुनकर श्रीरामने कहा—'शत्रुघ्न! तुम इन वराह भगवान्‌की प्रतिमा ले जा सकते हो। तुम्हारे अनुगत मण्डलीको धन्यवाद और संसारमें पवित्र उस मथुरापुरीको धन्यवाद! मथुराका वह जनसमाज धन्य है, जो सदा 'श्रीकपिलवराह' का दर्शन करेगा। शत्रुघ्न! जो इन कपिलवराहका दर्शन, स्पर्श एवं ध्यान करता है और इन्हें प्रतिदिन स्नान कराता तथा इनका अनुलेपन करता है, उसके सब पापोंको ये हर लेते हैं। जो इनकी पूजा तथा दर्शन करता है उसके समस्त पापोंका नाश करके ये मोक्षतक दे डालते हैं।'

पृथ्वि! इस प्रकार कहकर श्रीरामने कपिलवराह-की यह प्रतिमा शत्रुघ्नको दे दी। उसे लेकर शत्रुघ्न मथुरापुरी चले गये और वहाँ उन्होंने मेरे पास ही उसकी स्थापना कर दी। मध्यभागमें स्थापित करके उनकी विधिवत् पूजा की। 'गया' में तथा ज्येष्ठ मासमें 'पुष्कर'क्षेत्रमें पिण्डदान करनेसे एवं 'सेतुबन्ध-रामेश्वर' के दर्शन करनेसे मनुष्य जो फल पाता है, वह इनका दर्शन करनेसे पा जाता है। वैसा ही फल विश्रान्तिसंज्ञक, गोविन्द, केशव तथा दीर्घविष्णुके प्रति श्रद्धा होनेपर प्राप्त होता है। मेरा तेज प्रातःकाल 'विश्रान्तिसंज्ञक' में, मध्याह्नके अवसरपर 'दीर्घविष्णु' में तथा दिनके चतुर्थ भाग अर्थात् सायंकालमें 'केशव' में प्रतिष्ठित रहता है। देवि! यह ब्रह्मविद्या (वराहपुराण) परम प्राचीन है। [अध्याय १६३]


अन्नकूट (गोवर्धन)-पर्वतकी परिक्रमाका प्रभाव

भगवान् वराह कहते हैं—देवि! मथुराके पास ही पश्चिम दिशामें दो योजनके विस्तारमें गोवर्धन नामसे प्रसिद्ध एक क्षेत्र है, जहाँ वृक्षों और लताओंसे मण्डित एक सुन्दर सरोवर भी है। मथुराके पूर्व भागमें 'इन्द्र' तीर्थ, दक्षिणमें 'यम' तीर्थ, पश्चिममें 'वरुण' तीर्थ और उत्तरमें 'कुबेर' तीर्थ—ये चार तीर्थ हैं। भद्रे! यहाँ 'अन्नकुण्ड' नामका भी एक क्षेत्र है, इसकी परिक्रमा करनेवाले मानवका संसारमें फिर जन्म नहीं होता। फिर 'मानसी-गङ्गा' में स्नानकर गोवर्धनगिरिपर भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करना चाहिये। जो इस गोवर्धनपर्वतकी प्रदक्षिणा कर लेता है, उसके लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता। सोमवती अमावास्याके दिन जो यहाँ जाकर पितरोंको पिण्ड प्रदान करता है, उसे राजसूय-यज्ञका फल प्राप्त हो जाता है। गयातीर्थमें जाकर पिण्डदान करनेवाले मनुष्योंको जो फल मिलता है, वही गोवर्धनपर पिण्डदानसे सुलभ हो जाता है, इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं। गोवर्धन-भगवान्‌की परिक्रमा करनेसे राजसूय और अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है।

गोवर्धनकी परिक्रमाकी विधि यह है कि भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी पुण्यमयी एकादशी तिथिके दिन इस पर्वतके पास उपवास रहकर प्रातःकाल सूर्योदयके समय स्नानकर पर्वतपर स्थित श्रीहरिकी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद 'पुण्डरीक' तीर्थपर जाकर वहाँके कुण्डमें स्नानकर देवताओं और पितरोंका सम्यक् प्रकारसे अर्चन करके भगवान् पुण्डरीकका पूजन करे। वहाँ निर्मल जलसे पूर्ण एक 'अप्सरा-