वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १६४-१६५] अन्नकूट (गोवर्धन)-पर्वतकी परिक्रमाका प्रभाव ३०१
कुण्ड' है। वहाँ स्नान करनेसे सभी पाप धुल जाते हैं। उस कुण्डपर तर्पण करनेसे राजसूय और अश्वमेध-यज्ञोंका फल निश्चय ही मिल जाता है। मथुरामें 'संकर्षण' नामसे विख्यात एक तीर्थ है, उसके रक्षक बलभद्रजी हैं। वहाँ जाने एवं स्नान करनेसे पहलेसे लगी हुई गोहत्याके पापसे मुक्ति हो जाती है।
पृथ्वि! गोवर्धनके पासमें ही एक 'शक्रतीर्थ' है। यहाँ श्रीकृष्णने इन्द्रकी पूजाके लिये किये जा रहे यज्ञको नष्ट कर दिया था। उस यज्ञके अवसरपर भोज्य आदि पदार्थोंकी बहुत बड़ी ऊँची ढेरी लग गयी थी। उस समय इन्द्रके साथ श्रीकृष्णका विवाद छिड़ गया। इन्द्रने घोर वृष्टि की। वह जल व्रजवासियों तथा गौओंके लिये कष्टप्रद होने लगा। श्रीकृष्णने उनकी रक्षा करनेके निमित्त इस श्रेष्ठ पर्वत (गोवर्धन)-को हाथपर उठा लिया था। तभीसे यह पर्वत 'अन्नकूट-पर्वत' के नामसे विख्यात हो गया। यहीं आगे एक स्वच्छ जलवाला 'कदम्बखण्ड' नामक कुण्ड है। वहाँ स्नान करके पितरोंका तर्पण करनेसे ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। इसके बाद सौ शिखरवाले देवगिरिपर जाय, जहाँ स्नान एवं दर्शन करनेसे 'वाजपेय' यज्ञका फल मिलता है।
देवि! जब 'मानसीगङ्गा' के उत्तर तटपर चक्र धारण करनेवाले देवेश्वर श्रीहरिका अरिष्टासुरके साथ घोर युद्ध हुआ था, तब उस असुरने अपना वेष बैलका बना लिया था। उसकी जीवनलीला श्रीकृष्णके ही हाथ समाप्त हुई। उसके क्रोधपूर्वक एड़ीके प्रहारसे पृथ्वीपर एक तीर्थ बन गया। यह वृषाभासुरके वधसे निर्मित तीर्थ अत्यन्त अद्भुत है—यह जानने योग्य बात है। उस वृषभरूपी महासुरको मारनेके पश्चात् श्रीकृष्णने उसी तीर्थमें स्नान किया था। यह जानकर श्रीकृष्णके मनमें
चिन्ता उत्पन्न हो गयी कि यह पापी अरिष्टासुर बैलके रूपमें था और मेरे हाथ इसकी हत्या हो गयी है। इतनेहीमें भगवती श्रीराधादेवी श्रीकृष्णके समीप पधारीं। उन्होंने अपने नामसे सम्बद्ध उस स्थानको एक तीर्थरूप कुण्ड बना दिया। तबसे समस्त पापोंको हरनेवाले उस शुभ स्थानकी 'राधाकुण्ड' नामसे प्रसिद्धि हुई। प्रसङ्गतया लोग उसे 'अरिष्टकुण्ड' और 'राधाकुण्ड' भी कहते हैं। वहाँ स्नान करनेसे राजसूय और अश्वमेध-यज्ञोंका फल मिलता है। मथुराके पूर्व दिशामें एक तीर्थ 'इन्द्रध्वज' के नामसे विख्यात है, वहाँ स्नान करनेवाले स्वर्गलोकमें जाते हैं। यहाँ परिक्रमा एवं यात्राका पुण्य भगवान्को समर्पित कर देना चाहिये। मनुष्यका कर्तव्य है कि प्रारम्भ करते समय 'चक्रतीर्थ' में स्नान करे और यात्रा समाप्तिके अवसरपर 'पञ्चतीर्थकुण्ड' में स्नान कर ले। यहाँ रात्रि-जागरणका भी नियम है। इससे मनुष्यके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
भद्रे! 'अन्नकूटपर्वत' की परिक्रमाका विधान मैंने तुमसे बतला दिया। इसी प्रकार इसी क्रमसे आषाढ़में भी प्रदक्षिणा की जाती है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक भगवान् श्रीहरिके इस तीर्थकी प्रदक्षिणाके प्रसङ्गका तथा गोवर्धनके माहात्म्यको सुनता है, उसे गङ्गामें स्नान करनेका फल मिल जाता है।
**भगवान् वराह कहते हैं—**पृथ्वि! अब एक इतिहासयुक्त दूसरा प्रसङ्ग सुनो। मथुराके दक्षिण किसी नगरमें सुशील नामक एक धनी वैश्य रहता था। उस वैश्यका प्रायः सारा जीवन क्रय-विक्रयमें ही बीत गया। न कभी उसे किसी प्रकारका सत्सङ्ग प्राप्त हुआ और न उसने कोई दान-धर्म आदि सत्कर्म ही किये। इस प्रकार गृह-कुटुम्बमें आसक्त रहते ही वह वैश्य कालवश होकर इस लोकसे चल बसा और उसे प्रेतयोनि