भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३०२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १६४-१६५

मिली और बिना जलवाले तथा छायारहित जङ्गलोंमें भूख-प्याससे व्याकुल होकर वह इधर-उधर भटकने लगा। यों घूमता हुआ वह भयंकर प्रेत मरुस्थलमें पहुँच गया और बहुत दिनोंतक वहाँ एक वृक्षपर निवास करता रहा।

पृथ्वि! इस प्रकार बहुत समय व्यतीत हो जानेपर दैवयोगसे वहाँ एक खरीद-बिक्री करनेवाला वैश्य आया, जिसे देखकर उस प्रेतको अत्यन्त प्रसन्नता हुई और नाचते हुए वह बोला—'अहो! तुम इस समय मेरा आहार बनकर यहाँ आ गये हो।' अब क्या था, प्रेतकी बात सुनकर वह व्यापारी वैश्य अत्यन्त भयभीत होकर भाग चला। पर प्रेतने दौड़कर उसे पकड़ लिया और कहा—'अब मैं तुम्हें खाऊँगा।' उस प्रेतकी बात सुनकर महाजनने कहा—'राक्षस! मैं अपने परिवारके भरण-पोषणके विचारसे इस घोर वनमें आया हूँ। मेरे घरमें बूढ़े पिता और माता हैं, एक पतिव्रता पत्नी भी है। यदि तुम मुझे खा लोगे तो उन सबकी मृत्यु हो जायगी।' उस वैश्यकी बात सुनकर प्रेतने पूछा—'महामते! तुम किस स्थानसे यहाँ कैसे आये हो? सब सत्य-सत्य बताओ।'

वैश्यने कहा—'प्रेत! मैं गिरिराज गोवर्धन और महानदी यमुना—इन दोनोंके बीच मथुरापुरीमें रहता हूँ। मैंने पहलेसे जो कुछ सम्पत्ति संचित की थी, वह सब चोर उठा ले गये और मैं सर्वथा निर्धन हो गया, अतः थोड़ा धन लेकर व्यापारके लिये इस मरुस्थलकी ओर आया हूँ। ऐसी स्थितिमें अब तुम्हें जो जँचे, वह करो।

प्रेतने कहा—'वैश्य! तुमपर मुझे दया आ गयी है, अतः अब मैं तुम्हें खाना नहीं चाहता। यदि तुम मेरे वचनका पालन कर सको तो एक शर्तपर मैं तुम्हें छोड़ दूँगा। तुम मेरा एक कार्य सिद्ध करनेके लिये यहाँसे लौटकर मथुरा जाओ। वहाँ जाकर तुम 'चातुःसामुद्रिक' नामक कूपपर जाकर सविधि स्नानकर मेरे नामका उच्चारण करके अपने घरके धनसे विधिपूर्वक पिण्डदान करो और उन स्नान-दानादि सभी कर्मोंका फल मुझे दे देना। बस, इतना ही काम है, अब तुम सुखपूर्वक जा सकते हो।' प्रेतकी बात सुनकर वैश्यने उत्तर दिया—'प्रेत! मेरे पास एक मकानको छोड़कर घरपर और कोई धन नहीं है।' इसपर प्रेतने उससे मुसकाकर कहा—'वैश्य! मैंने जो तुमसे कहा है कि तुम्हारे घरमें धन है, उसका अभिप्राय यह है—तुम्हारे घरमें एक गढ़ा है और उसमें सुवर्णकी बहुत बड़ी संचित राशि गड़ी है। मैं तुम्हें मथुराका मार्ग भी दिखला देता हूँ।'

सूतजी कहते हैं—ऋषियो! इसपर उस वैश्यने पुनः पूछा—'प्रेत! इस योनिमें तुम्हें ऐसा दिव्य ज्ञान कैसे प्राप्त है?

प्रेतने कहा—'वैश्य! मैं भी पहले जन्ममें मथुराका निवासी था। जहाँ साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण विराजते हैं। एक दिन प्रातःकाल उन भगवान्‌के मन्दिरपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रजनोंका समाज जुटा था। वहाँ एक श्रेष्ठ कथावाचक बैठे थे जो पुराणोंकी पवित्र कथा कह रहे थे। मेरा एक मित्र भी प्रतिदिन वहीं जाया करता था। उस दिन मित्रकी प्रेरणासे मैं भी वहाँ पहुँच गया। अत्यन्त आदरके साथ समाजने बार-बार मुझे संतुष्ट करनेका प्रयत्न किया। उसमें मैंने सुना कि वहाँ एक पवित्र कूप है जो पापोंको धो डालता है। इस कूपमें चारों समुद्र आ करके प्रतिष्ठित होते हैं। इस कूपके माहात्म्यको सुननेसे महान् फल मिलता है। उस समय सभी श्रेष्ठ पुरुषोंने कथा-वाचकजीको धन दिया, किंतु मैं मौन रह गया। तब मित्रने मुझसे पुनः कहा—'प्रियवर! अपनी शक्तिके अनुसार कुछ अवश्य