भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १६६-१६७ ] 'असिकुण्ड'-तीर्थ तथा विश्रान्तिका माहात्म्य ३०३

देना चाहिये।' इसपर मैंने उन कथावाचकको एक 'सुवर्ण' (आठ रत्ती सोनेकी एक मुद्रा) प्रदान कर दिया। इसके बाद जब मेरी मृत्यु हुई तो मेरे पूर्वकर्मोंके अनुसार यमराजकी आज्ञासे मुझे यह दुःखद प्रेतयोनि मिली। मैंने पूर्वजन्ममें कभी तीर्थस्नान, दान-हवन अथवा पितरोंके लिये तर्पण नहीं किये थे, इसी कारण मुझे प्रेत बनना पड़ा।' इसपर उस वैश्यने पुनः पूछा—'तुम इस वृक्षकी जड़में रहकर कैसे प्राण धारण करते हो?'

प्रेत बोला—'पहलेकी बातें मैं तुम्हें बता ही चुका हूँ। मैंने उन कथावाचकको जो सुवर्णमुद्रा दी थी, उसीके प्रभावसे मैं इस वृक्षपर भी प्रायः तृप्त रहता हूँ, यद्यपि उसे भी मैंने दूसरेकी प्रेरणासे ही दी थी। इसीका परिणाम है कि प्रेतयोनिमें भी मेरा दिव्य ज्ञान बना है।

वसुंधरे! प्रेतकी बात सुनकर वह वैश्य मथुरापुरी गया और वहाँ पहुँचकर उसने प्रेतके निर्देशानुसार सब कुछ वैसा ही किया। इससे वह प्रेत मुक्त होकर स्वर्ग गया।

देवि! यह मथुरापुरीका माहात्म्य है। यहाँ 'चतुःसामुद्रिक' कूपपर पिण्डदान करनेसे परम गति प्राप्त होती है। मथुराके किसी स्थानपर, चाहे वह देवालय हो या चौराहा—जहाँ-कहीं भी किसीकी मृत्यु हो, वह मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं। दूसरी जगहके किये हुए पाप तीर्थोंमें जानेपर नष्ट हो जाते हैं, पर जो पाप उन तीर्थस्थानोंमें किये जाते हैं, वे तो वज्रलेप हो जाते हैं। पर यह मथुरापुरीकी ही विशेषता है कि यदि (भूलसे) यहाँ पाप बन भी गया तो वह वहीं नष्ट भी हो जाता है, क्योंकि यह पुरी परम पुण्यमयी है और इसमें कहीं पापके लिये स्थान नहीं है*। यदि कोई एक पुरुष हजार युगोंतक एक पैरपर खड़ा होकर तपस्या करे और एक व्यक्ति मथुरामें निवास करे तो मथुरावासीका पुण्य ही अधिक होता है। मथुरामें जो क्रोधरहित मानव देवताओंकी पूजा तथा तीर्थोंमें स्नान करते हैं, वे देवयोनिमें जाते हैं। दूसरी जगह एक हजार महाभाग ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे जो फल मिलता है, वही फल मथुरामें एक ब्राह्मणकी पूजासे प्राप्त होता है; क्योंकि देवताओंका सिद्ध समाज मथुरामें आकर सामान्य प्राणीके रूपमें स्थित है। देवताओं, सिद्धों और भूतोंका जो समुदाय है, वे सभी यहाँ चार भुजावाले विष्णुस्वरूप मथुरावासी प्राणियोंका दर्शन करने आते हैं; अतः मथुरामें जो मनुष्य हैं, वे विष्णुके ही स्वरूप हैं।

[अध्याय १६४-१६५]


'असिकुण्ड'-तीर्थ तथा विश्रान्तिका माहात्म्य

धरणीने कहा— प्रभो! महादेव! आपके श्रीमुखसे मैं अनेक प्रकारके तीर्थोंका वर्णन सुन चुकी। अब आप मुझे 'असिकुण्ड' के तीर्थका प्रसङ्ग सुनानेकी कृपा करें।

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! सुमति नामके एक धार्मिक और विख्यात राजा थे, जिनकी किसी तीर्थयात्रा-प्रसङ्गमें मृत्यु हो गयी। अब उनके पुत्र विमतिने राज्य सँभाला। इसी बीच एक दिन वहाँ नारदजी पधारे। उसने उनका पाद्य एवं अर्घ्य आदिसे स्वागत किया। फिर


* अन्यत्र हि कृतं पापं तीर्थमासाद्य गच्छति। तीर्थे तु यत्कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति।
मथुरायां कृतं पापं तत्रैव च विनश्यति। एषा पुरी महापुण्या यस्यां पापं न विद्यते॥ (१६५।५७-५८)