वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३०४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १६६-१६७ |
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बातोंने प्रसङ्गमें मुनिने उससे कहा—'राजन्! पिताके ऋणको चुका देनेपर ही पुत्र धर्मका भागी हो सकता है।' यों कहकर नारदमुनि वहीं अन्तर्धान हो गये। मुनिके चले जानेपर राजाने अपने मन्त्रियोंसे नारदजीकी बातका अर्थ पूछा। मन्त्रियोंने कहा—'अपनी तीर्थयात्राका फल आप महाराजको समर्पण कर दें तो पिताका ऋण चुक सकता है, क्योंकि उनकी तीर्थयात्रा अधूरी ही रही थी।' नारदजीके कथनका यही आशय था।
देवि! मन्त्रियोंकी बात सुनकर विमतिने मथुरापुरीमें निवासकी बात सोची, क्योंकि वहाँ प्रायः सभी तीर्थ स्थित हैं। विमतिके मथुरा आनेपर वहाँके तीर्थोंने आपसमें कहा—'इसका सामना करनेमें तो हम सभी असमर्थ हैं; अतः उचित है कि जहाँ भगवान् वराह विराजते हैं, हमलोग उस 'कल्पग्राम' में चलें।' वसुंधरे! इस प्रकार परामर्श करके सभी तीर्थ 'कल्पग्राम' में चले गये। देवि! वराहका रूप धारण कर वहाँ मैं आनन्दसे निवास करता हूँ। वे सभी मेरे सामने कल्पग्राममें आये और कहने लगे—भगवान्! आप स्वयं श्रीहरि हैं, आप अचिन्त्य, अच्युत एवं जगत्के शास्ता और स्रष्टा हैं। प्रभो! आपकी जय हो, जय हो!
भगवान् वराह कहते हैं—वसुधे! जब तीर्थोंने मेरी इस प्रकार स्तुति की, तब मैंने उनसे कहा—'तीर्थवरो! तुम्हारा कल्याण हो। तुम मुझसे कोई वर माँग लो।'
तीर्थ बोले—'वराहका रूप धारण करनेवाले देवेश्वर! यदि आप प्रसन्न हैं तो हमें विपत्तिसे अभय प्रदान करनेकी कृपा कीजिये।'
इसपर मैं चलकर मथुरापुरी आया और अपने दिव्य 'असि' (तलवार)-से विमतिका शिरश्छेद कर दिया। तलवारकी नोकसे वहाँ पृथ्वीमें एक गड्ढा हो गया, जो एक दिव्य कुण्डके रूपमें परिवर्तित हो गया और वही 'असिकुण्ड' नामसे प्रसिद्ध हुआ। इसके प्रभावसे सुमति और विमति भी मुक्त हो गये।
देवि! दक्षिणसे उत्तरतकके तीर्थोंकी जो संख्या मैं पहले कह चुका हूँ, उनकी गणना इस असिकुण्डसे ही आरम्भ करनी उत्तम है। जो मनुष्य द्वादशीके दिन प्रातःकाल सोनेसे उठते ही असिकुण्डमें स्नान करता है, उसे यहाँ वराह, नारायण, वामन और राघवकी सुवर्ण प्रतिमाओंके दिव्य दर्शन होते हैं। इनका दर्शन करनेवाला फिर संसारमें नहीं आता।
भगवान् वराहने कहा—देवि! अब विश्रान्ति-तीर्थकी महिमा सुनो। पहले उज्जयिनीमें एक दुराचारी ब्राह्मण रहता था। वह न देवताओंकी पूजा करता, न साधु-संतोंको प्रणाम करता और न तीर्थोंमें जाकर कभी स्नान ही करता था। वह मूर्ख प्रातः और सायंकाल इन दोनों संध्याओंमें भी सोया रहता था। ब्रह्माजीने बताया है कि सम्पूर्ण आश्रमोंमें गार्हस्थ्य ही उत्तम है। जैसे सभी जन्तु पृथ्वीके आश्रित हैं और शिशुओंका जीवन मातापर अवलम्बित है। इसी प्रकार सम्पूर्ण प्राणिवर्ग गृहस्थोंपर ही आश्रित है। पर वह अधम ब्राह्मण इस आश्रममें भी रहकर सदा चोरी आदिमें ही लगा रहता।
वसुंधरे! एक बार जब वह रातमें चोरीके लिये इधर-उधर दौड़ रहा था, उसी समय राजाके सैनिकोंने उसे पकड़नेके लिये ललकारा। इसपर वह तेजीसे भागता हुआ एक कुएँमें जा गिरा, जहाँ उसकी जीवनलीला ही समाप्त हो गयी और इस प्रकार वह अगले जन्ममें एक वनमें ब्रह्मराक्षस हुआ।
उसका रूप बड़ा भयंकर था। एक समयकी