वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| अध्याय १६८-१६९] | मथुरा तथा उसके अवान्तरके तीर्थोंका माहात्म्य | ३०५ |
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बात है कि कार्यवश वहीं एक जनसमाज आ गया। उसीमें एक ऐसा ब्राह्मण भी था, जो रक्षोघ्नमन्त्र पढ़कर सबकी रक्षा करता था। अब वह ब्रह्मराक्षस उस ब्राह्मणसे आकर कहने लगा—'विप्र! तुम्हारे मनमें जिस वस्तुकी इच्छा हो, वह मैं तुम्हें देनेके लिये तत्पर हूँ। बहुत दिनोंके बाद आज मुझे मनचाहा भोजन प्राप्त हुआ है। विप्र! तुम उठो और यहाँसे अन्यत्र जाकर कहीं सो जाओ। जिससे मैं इन सबको खाकर तृप्त हो जाऊँ। इसपर ब्राह्मणने कहा—'राक्षस! मैं इन्हींके साथ यहाँ आया हूँ, ये सभी मेरे परिवार ही हैं। अतः मैं इन्हें छोड़ नहीं सकता। तुम यहाँसे चले जाओ। मेरे मन्त्रमें ऐसी शक्ति है कि उसके प्रभावसे तुम इनपर आँखतक नहीं उठा सकते। अस्तु, अब तुम यह बतलाओ कि तुम्हें यह योनि कैसे मिली?'
इसपर वह राक्षस कहने लगा—'विप्र! केवल अनाचारके कारण मेरी यह दुर्गति हुई है।' इस प्रकार उस राक्षसने अपनी सारी बातें यथावत् ब्राह्मणके सामने स्पष्ट कीं। इसपर उस ब्राह्मणने कहा—'राक्षस! तुम अब मित्रकी श्रेणीमें आ गये हो। बोलो मैं तुम्हें क्या दूँ?'
राक्षस बोला—'विप्र! यदि मेरे मनमें जो बात बसी है, वह तुम देना चाहते हो तो दे दो। तुमने मथुरापुरीमें विश्रान्तितीर्थमें जो स्नान किया है, उसका फल मुझे देनेकी कृपा करो, जिससे मैं मुक्त हो जाऊँ।' अब राक्षसके दुःखसे दुःखी होकर वह कृपालु ब्राह्मण बोला—'राक्षस! विश्रान्ति नामक तीर्थके विषयमें तुम्हें जानकारी कैसे प्राप्त हुई और उसका ऐसा नाम क्यों हुआ? इसे बतानेकी कृपा करो।'
राक्षस बोला—'ब्राह्मण! मैं पहले उज्जयिनीमें निवास करता था। एक समयकी बात है, मैं संयोगवश श्रीविष्णुके मन्दिरमें चला गया। उस मन्दिरके फाटकपर एक कथा कहनेवाले वेदके विद्वान् ब्राह्मण बैठते थे, जिनका विश्रान्तितीर्थकी महिमा सुनाना प्रतिदिनका व्रत था। उस माहात्म्यको सुननेसे ही मेरे हृदयमें भक्ति उदित हुई। अनघ! मुझे वहीं यह सुननेका अवसर मिला कि इस तीर्थका 'विश्रान्ति' नाम कैसे हुआ है? उन्होंने ही स्पष्ट बतलाया था कि इस स्थानपर संसारके शासक श्रीहरि विश्राम करते हैं। उन विशाल भुजावाले प्रभुको वासुदेव भी कहते हैं। इसीलिये यह तीर्थ 'विश्रान्ति' नामसे विख्यात हुआ है।' राक्षसकी यह बात सुनकर उस ब्राह्मणने कहा—'राक्षस! उस तीर्थमें एक बार स्नान करनेका पुण्यफल मैंने तुम्हें दे दिया।' प्रिये! ब्राह्मणके मुखसे यह वचन निकलते ही वह राक्षस उस योनिसे मुक्त हो गया। [अध्याय १६६-१६७]
मथुरा तथा उसके अवान्तरके तीर्थोंका माहात्म्य
भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! भगवान् शिव इस मथुरापुरीकी निरन्तर रक्षा करते हैं। उनके दर्शनमात्रसे मथुराका पुण्य-फल सुलभ हो जाता है। बहुत पहले रुद्रने पूरे एक हजार वर्षतक मेरी कठिन तपस्या की थी। मैंने संतुष्ट होकर कहा—'हर! आपके मनमें जो भी हो, वह वर मुझसे माँग लें।
महादेवजी बोले—'देवेश! आप सर्वत्र विराजमान हैं। आप मुझे मथुरामें रहनेके लिये स्थान देनेकी कृपा करें।' इसपर मैंने कहा—'देव! आप मथुरामें क्षेत्रपालका स्थान ग्रहण करें—मैं यह चाहता हूँ। जो व्यक्ति यहाँ आकर आपका दर्शन नहीं करेगा, उसे कोई सिद्धि प्राप्त न होगी। जिस प्रकार स्वर्गमें इन्द्रकी अमरावतीपुरी है, वैसी ही जम्बूद्वीपमें यह मथुरापुरी है। यद्यपि मथुरामण्डलका विस्तार बीस योजनोंका है, पर वहाँ एक-एक पैर रखनेपर भी अश्वमेध-यज्ञोंका फल मिलता है। इस क्षेत्रमें साठ करोड़, छः