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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३०६संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १६८-१६९

हजार तीर्थ हैं। गोवर्धन तथा अक्रूरक्षेत्र—ये दो करोड़ तीर्थोंके समान हैं एवं 'प्रस्कन्दन' और 'भाण्डीर'—ये छः कुरुक्षेत्रोंके समान हैं। 'सोमतीर्थ', 'चक्रतीर्थ', 'अविमुक्त', 'यमन', 'तिन्दुक' और 'अक्रूर' नामक तीर्थोंकी 'द्वादशादित्य' संज्ञा है। मथुराके सभी तीर्थ कुरुक्षेत्रसे सौ गुना बढ़कर हैं, इसमें कोई संशय नहीं। जो मथुरापुरीके इस माहात्म्यको समाहित चित्तसे पढ़ता या सुनता है, वह परमपदको प्राप्त होता है और अपने मातृ-पितृ—दोनों पक्षोंके दो सौ बीस पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है।

मथुराके सभी स्थानोंमें भगवान् श्रीकृष्णके चरणके चक्रचिह्न सुशोभित हैं। उन्हींके मध्यमें एक ऐसा भी तीर्थ है, जहाँ चक्रका आधा ही चिह्न दृष्टिगोचर होता है। वहाँके निवासी मुक्ति पानेके अधिकारी हो जाते हैं—इसमें संशय नहीं। श्रीकृष्णकी क्रीडाभूमिके भी दो छोर हैं—एक उत्तर और दूसरा दक्षिण। उन दोनोंके मध्यभागमें वे विराजते हैं। आकारमें वे द्वितीयाके चन्द्रमाके समान हैं। जो मनुष्य वहाँ स्नान और दान करता है, उसे वे दिव्य तीर्थ मथुराक्षेत्रका फल प्रदान करनेके लिये सदा उद्यत रहते हैं। यहाँ नियमके अनुसार रहकर जो शुद्ध भोजन करनेवाले व्यक्ति स्नान करते हैं, उन्हें अक्षय लोकोंकी प्राप्ति होती है—इसमें कोई संशय नहीं। 'दक्षिणकोटि' से आरम्भ करके 'उत्तरकोटि' पर यात्रा समाप्त करनी चाहिये। वहाँ यज्ञोपवीतके प्रमाणभर भूमिपर जो चलते हैं, उनके द्वारा अनेक कुलोंकी रक्षा हो सकती है।

**पृथ्वीने पूछा—**प्रभो! 'यज्ञोपवीत' का क्या माप है, आप यह मुझे स्पष्टतः बतानेकी कृपा करें।

भगवान् वराह कहते हैं— वरवर्णिनि! अब मैं यज्ञोपवीतकी विधि बताता हूँ, सुनो। मेरी क्रीडाभूमिके जो दक्षिणका छोर है, वहाँसे लेकर और उत्तर सिरेतककी जो सीमा है, इसीको 'यज्ञोपवीत' की सीमा कही गयी है। इसी क्रमसे दक्षिणसे आरम्भ करके उत्तरकी सीमापर यात्रा समाप्त करनी चाहिये। घरसे बाहर होनेपर जबतक स्नान न करे, तबतक मौन रहनेका नियम है। वसुंधरे! स्नान करनेके उपरान्त भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करना परम आवश्यक है। इसके बाद बोला जा सकता है। देवि! स्नान समाप्त होनेपर क्रमशः देवाधिदेव श्रीकृष्णकी पूजा, यज्ञ, पयस्विनी गौका दान, सुवर्ण एवं धनका वितरण कर ब्राह्मणोंको भोजन कराये। इस प्रकार कर्म करनेवाला व्यक्ति पुनः संसारमें लौटकर नहीं आता, वह मेरे धामको प्राप्त होता है। इस 'अर्द्धचन्द्र' तीर्थमें जिनकी मृत्यु होती है या और्ध्वदेहिक क्रिया होती है, वे सभी स्वर्गमें जाते हैं। इस तीर्थमें पुरुषकी हड्डियाँ जबतक रहती हैं, तबतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित रहता है। अधिक क्या? यदि यहाँ गदहेका भी शरीर जला दिया जाय तो वह भी विष्णुका रूप प्राप्त कर सकता है।

मथुराके प्राणी मेरे ही रूप हैं, उनके तृप्त होनेसे मैं तृप्त होता हूँ—इसमें संशय नहीं। देवि! इस विषयमें गरुडका एक आख्यान सुनो। एक बार वे श्रीकृष्ण-दर्शनकी अभिलाषासे मथुरा आये और देखा कि यहाँके सभी निवासी कृष्णके रूप थे। अन्तमें वे जैसे-तैसे भगवान्‌के पास पहुँचे और उनकी बड़ी स्तुति की। उनकी स्तुति सुनकर भगवान्‌ने कहा—'गरुड! तुम किस उद्देश्यसे मथुरा आये हो? और किसलिये यह मेरी स्तुति कर रहे हो? सभी बातें स्पष्ट बताओ।'

**गरुड बोले—**भगवन्! मैं आपके कृष्णरूपके दर्शनकी अभिलाषासे मथुरा आया था। पर यहाँके सभी निवासी मुझे आपके ही स्वरूप दीखे। मेरी दृष्टिमें मथुराकी सारी जनता एक समान प्रतीत होने लगी। सबको एक समान देखकर मैं मोहमें पड़ गया हूँ। गरुडकी यह बात सुनकर श्रीहरि मुसकाये और मधुर वाणीमें इस प्रकार बोले।

श्रीकृष्णने कहा—'गरुड! मथुराके निवासियों- का जो रूप है, वह मेरा ही रूप है। पक्षिराज!