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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३२८संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १८१-१८२

भी भगवत्प्रेमी लोग उपस्थित हों, वे सभी इसी विधिसे अर्चाविग्रहकी पूजा करें। फिर सबको चन्दन, पुष्प, अनुलेपन एवं नैवेद्यद्वारा सविधि पूजन करना चाहिये। सुन्दरि! महुएकी लकड़ीसे प्रतिमा बनाने और प्रतिष्ठा करनेका यही विधान है। जो मानव काष्ठकी प्रतिमा स्थापित कर इस विधिके साथ पूजा करता है, वह संसारमें न जाकर मेरे लोकको प्राप्त होता है।

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! अब मैं जिस प्रकार पाषाणकी बनी हुई प्रतिमाओंमें निवास करता हूँ, वह बतलाता हूँ। पाषाणकी अच्छी प्रतिमा बनानेके लिये देखनेमें सुन्दर, शल्यरहित एवं भलीभाँति शुद्ध किसी पत्थरको देखकर उसमें दक्ष कलाकारको नियुक्त करे। सर्वप्रथम उस पत्थरपर एक उजली बातीसे प्रतिमा चिह्नित करके उसकी अक्षत आदिसे पूजा कर, दीपक दिखाये और दही एवं चावलसे बलि देकर प्रदक्षिणा करे। इसके पश्चात्—'ॐ नमो नारायणाय' यह मन्त्र पढ़कर कहे—'भगवन्! आप सम्पूर्ण प्राणियोंमें श्रेष्ठ एवं परम प्रसिद्ध हैं; सूर्य-चन्द्रमा एवं अग्नि आपके ही रूप हैं। आपसे अधिक विज्ञ चराचर विश्वमें अन्य कोई है ही नहीं। भगवान् वासुदेव! इस मन्त्रके प्रभावसे प्रभावित होकर आप इस प्रतिमामें शनैः-शनैः प्रतिष्ठित होकर मेरी कीर्तिको बढ़ायें तथा स्वयं भी वृद्धिको प्राप्त हों। अच्युत वराह! आपकी जय हो, जय हो। आप अपनी अभीष्ट प्रतिमा स्वयं निर्मित करायें।'* फिर ऐसी धारणा करे कि सारा विश्व एक परम प्रभु भगवान् नारायणका ही स्वरूप है। जब मूर्ति बन जाये तो उसे पूर्वाभिमुख रखे। फिर उज्ज्वल वस्त्र धारणकर रातमें उपवास करे। पुनः प्रातः दन्तधावन कर और सफेद यज्ञोपवीत पहनकर हाथमें गन्धादि लेकर कहे—'भगवन्! जिन्हें सर्वरूप एवं 'मायाशबल' कहा जाता है, वही आप अखिल जगत्के रूपमें विराजते हैं। प्रभो! इस प्रतिमामें भी आपका वास है। जगत्के कारण, जगत्के आकार तथा अर्चावतार धारण करके शोभा पानेवाले लोकनाथ! इस प्रकार मैंने आपकी आराधना की है। यह विग्रह भी आपसे रिक्त नहीं है। आदि और अन्तसे रहित प्रभो! इस जगत्की सत्ता स्थिर रहनेमें आप ही निमित्त हैं। आप अपराजेय हैं!' इस प्रकार भगवद्विग्रहकी पूजा कर—'ॐ नमो वासुदेवाय' मन्त्र पढ़कर प्रतिमाके ऊपर जल छिड़कना चाहिये।

सुन्दरि! इस प्रकार पाषाणमयी प्रतिमामें मेरी प्राण-प्रतिष्ठाकर पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रमें अन्नादिमें अधिवासन करना चाहिये। मेरी उपासनामें उद्यत रहनेवाला जो व्यक्ति मेरी प्रतिमाकी स्थापना करता है, वह मुझ भगवान् श्रीहरिके लोकमें जाता है—यह निश्चित है। स्थापनाके दिनोंमें साधक यव अथवा दूधसे बने आहारपर दिन-रात व्यतीत करे। इष्टदेवकी प्रतिमा प्रतिष्ठित हो जानेपर सायंकालकी संध्याके समय चार दीपक प्रज्वलित करे। भगवान्के आसनके नीचे पञ्चगव्य, चन्दन और जलसे परिपूर्ण चार कलश स्थापित करना चाहिये। इस समय सामवेदके गान करनेवाले ब्राह्मण वेदध्वनि करें। देवि! जो ब्राह्मण वेदके हजारों मन्त्रोंको पढ़ते हैं, उनके मुखसे निकलते हुए इस शुभप्रद सामके


* यहाँ प्रतिमानिर्माणकी विधि अत्यन्त संक्षिप्त है। इसे विस्तारसे जाननेके लिये 'श्रीविष्णुधर्मोत्तरमहापुराण' खण्ड ३, अध्याय ४५ से १२०, 'काश्यपशिल्पम्' पृष्ठ ४९ से ८० तक तथा 'Elements of Hindu Ichonography'-(T.N. Gopinath Rao.) आदि पुस्तकें देखनी चाहिये।

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