भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १८१-१८२ ] काष्ठ-पाषाण-प्रतिमाके निर्माण, प्रतिष्ठा एवं पूजाकी विधि [ ३२७

करना उचित है।

सूतजी कहते हैं—ऋषियो! भगवान् वराहकी यह वाणी सुनकर देवी धरणीका मन अत्यन्त आश्चर्यसे भर गया। अब उन देवीने प्रसन्नतापूर्वक प्रतिमाकी स्थापनाके विषयमें प्रभुसे पुनः प्रश्न करना आरम्भ किया। [अध्याय १८०]


काष्ठ-पाषाण-प्रतिमाके निर्माण, प्रतिष्ठा एवं पूजाकी विधि

सूतजी कहते हैं—ऋषियो! भगवती वसुन्धराने जब तीर्थोंका महत्त्व सुना तो वे आश्चर्य एवं प्रसन्नतासे भर गयीं और भगवान् वराहसे पुनः बोलीं।

धरणीने पूछा—भगवन्! आपने मथुरा-क्षेत्रकी महत्ताका जो वर्णन किया, उसे सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई; परंतु मेरे हृदयमें एक जिज्ञासा है। विष्णो! उसे सविस्तार बतानेकी कृपा कीजिये। मैं यह जानना चाहती हूँ कि काष्ठ, पाषाण एवं मृत्तिकाके विग्रहमें आप किस प्रकार विराजते हैं? अथवा ताँबा, काँसा, चाँदी और सुवर्ण आदिकी प्रतिमामें आपको कैसे प्रतिष्ठित करना चाहिये, जिससे वे अर्चाएँ आपका स्वरूप बन सकें। माधव! लोग अपने दक्षिण-भागमें दीवालपर अथवा भूमिपर भी आपके श्रीविग्रहकी रचना करते हैं, मैं उसकी विधि भी जानना चाहती हूँ।

भगवान् वराह बोले—वसुंधरे! जिस वस्तु या द्रव्यादिसे प्रतिमा बनवानी हो, पहले उसका शोधन करके उसे लक्षणोंके अनुसार चिह्नित करना चाहिये। फिर उसकी शुद्धि कर सविधि प्रतिष्ठा करानी चाहिये। देवि! इसके पश्चात् जन्म-मरणरूपी भयसे मुक्त होनेके लिये उसकी पूजा करनी चाहिये। वसुंधरे! यदि काष्ठमयी प्रतिमा बनवानी हो तो महुएकी लकड़ी सर्वोत्तम है। प्रतिमा बन जानेपर उसकी सविधि प्रतिष्ठा-पूजा करे। प्रतिष्ठाके समय अर्चनाकी जिन वस्तुओंका मैंने वर्णन किया है, उन गन्ध आदि पदार्थोंको विग्रहपर अर्पित करना चाहिये। कपूर, कुंकुम, दालचीनी, अगुरु, रस, इत्र, चन्दन, सिल्हक तथा उशीर आदि सामानोंसे विवेकशील पुरुष उस प्रतिमाका अनुलेपन एवं पूजन करे। स्वस्तिक वृद्धिका सूचक है। अतः प्रतिमापर उसका, श्रीवत्सका तथा कौस्तुभ मणिका चिह्न रहना आवश्यक है। फिर विधिपूर्वक उसका पूजन कर अर्चाको दूधसे सिद्ध हुए खीरका भोग लगाना चाहिये। यह अत्यन्त मङ्गलप्रद है। तिलके तेल या घीका दीपक पूजाके लिये उत्तम है—इसमें कोई संदेह नहीं।

प्राणायाम करके इस मन्त्रको पढ़ना चाहिये—मन्त्रका भाव इस प्रकार है—'भगवन्! यह सम्पूर्ण विश्व आपका ही स्वरूप है, तथापि आपकी स्पष्ट प्रतीति नहीं होती। प्रभो! अब आप सुस्पष्ट रूपसे भूमण्डलपर पधारकर इस काष्ठमयी प्रतिमामें प्रतिष्ठित होइये। काठकी बनी हुई प्रतिमाओंमें भगवान्की स्थापनाकी यह विधि है। स्थापनाके बाद भगवत्प्रेमी पुरुषोंके साथ प्रदक्षिणा करनी चाहिये। पूजाके बाद भी दीपक प्रज्वलित रहना चाहिये। मन-ही-मन 'ॐ नमो नारायणाय' इस मन्त्रका उच्चारण करे। प्रतिष्ठित मूर्तिकी पूजा नित्य होनी चाहिये। साथ ही इस प्रकार प्रार्थना करे—'भगवन्! आप मेरे एकमात्र आश्रय हैं। वासुदेव! मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप इस स्थानका कभी परित्याग न करें।'

वसुंधरे! फिर उस समय वहाँ अन्य जितने

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