भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३२६ | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [ अध्याय १८०

संतानोंसे उत्पन्न हैं। तुम परिपुष्ट हो जाओ, एतदर्थ राजाकी कृपासे इनका यहाँ आगमन हुआ है।'

तब वह पितर बोला—'यह दासी इस 'ध्रुवतीर्थ'में पहले स्नान करे, फिर वेदमें निर्दिष्ट क्रमसे तर्पण करे। तदनन्तर प्राचीन ऋषियोंने जो विधि बतायी है, उसके अनुसार यह पिण्ड-दानादि श्राद्धकर्म करे। सभी कर्मपात्र चाँदीके हों। साथमें वस्त्र और चन्दन रहना आवश्यक है। फिर भक्तिपूर्वक पिण्डार्चन करके पितरोंकी पूजा करे। आप सभी सज्जन यहीं रहें और इसका परिणाम तत्काल देख लें—मैं परम सुखसे सम्पन्न हो जाऊँगा। इस विधानसे इस संतानके द्वारा मेरा श्राद्ध कराना आप सभीकी कृपापर निर्भर है।'

वसुंधरे! रानी चन्द्रप्रभा अगस्तिकी बात सुनकर दासीके द्वारा उस प्राणीका श्राद्ध करानेमें तत्पर हो गयीं। उस श्राद्धमें बहुत-सी दक्षिणाएँ दी गयीं। रेशमी वस्त्र, धूप, कर्पूर, अगुरु, चन्दन, तिल और अन्न आदि विविध वस्तुएँ पिण्डदानके अवसरपर काममें लायी गयीं। फलस्वरूप श्राद्ध एवं पिण्डदानका क्रम समाप्त होते ही वह विकृत दशावाला अगस्ति ऐसा बन गया, मानो कोई देवता हो। उसका शरीर परम तेजोमय हो गया। पार्श्ववर्ती जो मशक थे, उनकी आकृतिमें भी वैसा ही परिवर्तन हो गया। अब उनसे घिरा हुआ वह प्राणी ऐसी असीम शोभा पाने लगा, मानो यज्ञमें दीक्षित कोई पुरुष अन्तमें अवभृथ-स्नानसे सम्पन्न हुआ हो। उस समय स्वर्गसे इतने दिव्य विमान आये कि आकाश ढक गया।

अब अगस्ति आदि सभी बोले—'महानुभावो! हम लोग भलीभाँति तृप्त हो गये हैं। अतः अब परमधाममें जाते हैं। ध्रुवतीर्थकी यह महिमा मैंने आपके सामने प्रकट कर दी। महामुने! मेरे कहनेकी बात ही क्या है। आप सबने स्वयं भी इसकी महिमा देख ली। हमारा उद्धार होना नितान्त असम्भव था; किंतु आपकी कृपासे हमने इस दुस्तर पापपुञ्जको पार कर लिया।'

पृथ्वि! अब वह अगस्ति नामका प्राणी, मुनिवर त्रिकालज्ञ, राजा चन्द्रसेन, रानी चन्द्रप्रभा, उपस्थित जनता, दासी प्रभावती तथा उसकी पुत्रीको इस प्रकारकी बातें सुनाकर तथा 'आप सभी लोगोंका कल्याण हो'—इस प्रकार कहता हुआ अपने सहचरोंके साथ उत्तम विमानपर चढ़कर स्वर्गके लिये प्रस्थान कर गया।

भगवान् वराह कहते हैं—भद्रे! इसके पश्चात् महाराज चन्द्रसेन उस तीर्थकी महिमा देखकर महर्षि त्रिकालज्ञको प्रणामकर अपने परिजन, पुरजनसहित नगरको लौट गये।

पृथ्वि! मथुरा-मण्डलके अन्तर्गत तीर्थोंका माहात्म्य मैंने तुम्हें सुनाया। यह तीर्थ ऐसा शक्ति-सम्पन्न है कि जिसका स्मरण करनेसे भी मनुष्यके पूर्व-जन्मके पाप नष्ट हो जाते हैं। जो पुरुष ब्राह्मणोंकी संनिधिमें बैठकर इस प्रसङ्गको पढ़ता है, उसने मानो गयशिरपर (गयाक्षेत्रमें) जाकर अपने पितरोंको तृप्त कर दिया। महाभागे! जिसकी व्रतमें आस्था न हो, इस प्रसङ्गको सुननेमें उदासीन हो तथा भगवान् श्रीहरिकी अर्चासे विमुख हो, उसके सामने इसका वर्णन नहीं करना चाहिये। यह प्रसङ्ग तीर्थोंमें परम तीर्थ, धर्मोंमें श्रेष्ठ धर्म, ज्ञानोंमें सर्वोत्कृष्ट ज्ञान एवं लाभोंमें उत्तम लाभ है। महाभागे! जिनकी भगवान् श्रीहरिमें सदा श्रद्धा रहती है तथा जो पुण्यात्मा पुरुष हैं, उनके सामने ही इसका प्रवचन