भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १८० ] श्राद्धसे अगस्तिका उद्धार, श्राद्ध-विधि [ ३२५

तुरंत उन नरेशसे कहा—‘राजन्! मेरे आनेका एक विशेष कारण भी है, आप उसे सुनें।' इसपर राजर्षि चन्द्रसेनने उन तपोधन ऋषिसे पूछा—'तपोधन! वह कौन-सा कार्य है? आप बतानेकी कृपा कीजिये। मैं वह समुचित कार्य करनेके लिये उद्यत हूँ, जिससे आपका मनोरथ सिद्ध हो सके।'

मुनिने कहा—‘राजन्! आप अपनी पटरानी तथा उनकी दासीको जिसे लोग प्रभावती कहते हैं, यहाँ बुलायें।' इसपर राजाने अपनी रानी तथा दासीको वहाँ बुलवाया। रानी परम साध्वी थीं। वे आकर जमीनपर बैठ गयीं। पर उस समय उनका शरीर भय एवं आशङ्काओंसे काँप रहा था। उन्होंने आते ही विनयपूर्वक ऋषिको प्रणाम किया।

उनके बैठ जानेपर मुनिने कहा—‘'मैंने 'ध्रुवतीर्थ'में जो आश्चर्यकी एक बात देखी है, उसे आप सभीके सामने व्यक्त करना चाहता हूँ। वह बात यह है कि आज प्राणियोंके पितृगण 'ध्रुवतीर्थ'में उपस्थित हुए थे। श्राद्ध करनेमें कुशल पुत्रोंने जिनका विधिवत् श्राद्ध किया है, वे तो तृप्त होकर स्वर्गको गये; किंतु वहीं मुझे एक अत्यन्त दुःखी पितर मिले हैं। उनका शरीर भूख-प्याससे सूख गया है। उनका मुख शुष्क और आँखें बड़ी छोटी हैं। स्वर्गमें जानेकी आशा तो दूर, वे पुनः अपवित्र नरकमें ही जानेके लिये विवश हैं। उन्हें देखकर मेरे हृदयमें बड़ी दया आयी, अतः मैंने उनसे पूछा—‘भाई! तुम कौन हो और क्या चाहते हो? मुझे बतानेकी कृपा करो।' तब उन्होंने अपनी सारी स्थिति बतायी। उस समय उनकी बात सुनते ही करुणासे मैं विवश हो गया हूँ। महारानीजी! बात ऐसी है—आपकी जो यह दासी है, इसकी एक पुत्री है, जो 'विरूपकनिधि' नामसे प्रसिद्ध है। आप उसे भी इस समय यहाँ बुलानेकी कृपा करें।'

वसुंधरे! इस प्रकार मुनिवर त्रिकालज्ञकी बात सुनकर महाराजा चन्द्रसेनकी रानीने उसी क्षण उस दासी-पुत्रीको बुलानेकी आज्ञा दी। उस समय वह मद्यपान कर उन्मत्त हो रही थी। किसी प्रकार राजसेवकोंने उसे सँभालकर हाथसे पकड़े हुए वहाँ लाकर उन मुनिके पास उपस्थित किया। मुनि धर्मके पूर्ण ज्ञाता थे। मदके प्रभावसे विक्षिप्त चित्तवाली उस दासीको देखकर उन्होंने उससे पूछा—‘अरे! तुमने पितरोंके लिये पिण्डदान तथा जलसे 'स्वधा' कहकर 'तर्पण' किया है अथवा नहीं? ऐसा जान पड़ता है कि तुमने पितरोंको मुक्त करनेवाली पिण्ड एवं तर्पणकी विधियाँ सम्पन्न नहीं की है।' वसुधे! इसपर उस दासीने उन मुनिसे कहा—'मैंने ऐसी कोई भी विधि सम्पन्न नहीं की है। मैं तो यह भी नहीं जानती कि कौन मेरे पितर हैं और उनके लिये कौन-सी क्रिया करनी चाहिये।'

पृथ्वि! फिर तो ऐसी बात कहनेवाली उस दासीसे उन त्रिकालज्ञ मुनिने कहा—'आज इस नगरके महाराज, महारानी और यहाँके निवासी—सभी सज्जन पुरुष 'ध्रुवतीर्थ'में पधारें। वहाँ पितरोंके लिये पुत्रोंद्वारा किये गये श्राद्धकी महिमाका फल आपलोगोंके सामने सुस्पष्ट हो जायगा। यह सुनकर सभी नगरनिवासी तथा जिनकी श्राद्ध करनेमें कौतुकवश भी प्रवृत्ति न थी, वे सभी अधिकारी ब्राह्मण भी 'ध्रुवतीर्थ'में गये। वहाँ जानेपर सबकी दृष्टि उस संतानद्वारा असत्कृत एवं अस्त-व्यस्त प्राणीपर पड़ी। बेचारेको क्षुद्र मच्छड़-जैसे जीव चारों ओरसे घेरे हुए थे। साथ ही वह भूखसे भी अत्यन्त व्यथित था। उस समय त्रिकालज्ञने कहा—'देखो, ये स्त्रियाँ तुम्हारी