वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३२४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १८० |
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आपने जिन पितरोंको स्वर्गमें जाते हुए देखा है, वे सभी आज राजा चन्द्रसेनके द्वारा सत्कृत हुए हैं।'
पितरने कहा—'जो पितरोंके लिये श्राद्ध करता है, उसका उत्तम फल निश्चित है, किंतु न करनेसे विपरीत फल सामने आता है और पितर नरकके भागी हो जाते हैं; इसमें कुछ कारण है, वह भी मैं आपको बताता हूँ; सुनें। श्राद्धसम्बन्धी जो द्रव्य उचित देश, काल और पात्रको नहीं दिया गया, विधिकी रक्षा न हुई, साथमें दक्षिणा न दी गयी तो वह प्रत्यवायका कारण हो जाता है। जो श्राद्ध श्रद्धाके साथ सम्पन्न नहीं हुआ, जिसपर दुष्ट प्राणीकी दृष्टि पड़ गयी, जिसमें तिल और कुशाका अभाव रहा एवं मन्त्र भी नहीं पढ़े गये, उस श्राद्धको असुर ग्रहण कर लेते हैं। प्राचीन समयसे ही भगवान् वामनने ऐसे श्राद्धका अधिकारी बलिको बना रखा है। ऐसे ही दशरथनन्दन भगवान् रामके द्वारा अपने गणोंके साथ क्रूर रावण जब दिवंगत हो गया तो उन त्रिभुवनभर्ता श्रीरामने कुछ ऐसे श्राद्धोंका फल त्रिजटाको भी दे दिया था। भगवान् राम जब भगवती सीताके साथ बैठे थे, सीताने उनसे कहा—'त्रिजटा आपमें भक्ति रखती थी। सीताजीकी बात सुनकर श्रीराम प्रसन्न हो गये।' अतः उन परम प्रभुने उस राक्षसीको यह वर दिया—'त्रिजटे! जिस श्राद्ध करनेवाले व्यक्तिके घर श्राद्धकी उत्तम हविष् पदार्थ आदि सामग्रियाँ न हों, विधि और पात्र उचित रहनेपर भी यदि श्राद्ध करते समय क्रोध आ गया हो तथा पाक्षिक, मासिक श्राद्ध उचित समयपर सम्पन्न न हों एवं दक्षिणा भी न दी जाय तो उसका फल मैं तुम्हें देता हूँ।'
इसी प्रकार एक बार भगवान् शंकरने नागराज वासुकिकी भक्तिसे प्रसन्न होकर उसे वर देते हुए कहा था—'नागराज! जिस मनुष्यने वार्षिक श्राद्ध करनेके पूर्व भगवान् श्रीहरिसे आज्ञा प्राप्त नहीं की और श्राद्ध-क्रिया सम्पन्न कर ली, यज्ञके अवसरपर उचित दक्षिणा न दी, देवता एवं ब्राह्मणके सामने देनेकी प्रतिज्ञा करके उसे पूरा नहीं किया, श्राद्धमें बिना मन्त्र पढ़े ही क्रियाएँ कर दीं—ऐसे यज्ञों एवं श्राद्धोंका सम्पूर्ण फल मैं तुम्हें अर्पित करता हूँ।' मुने! ये सभी बातें पुराणों एवं इतिहासोंमें वर्णित हैं।
'मुने! जिन्हें आपने दयनीय दशामें देखा था, उनके श्राद्ध, अवैध रूपमें ही अनुष्ठित हुए हैं। अतः उसका उत्तम फल इन पितरोंको प्राप्त नहीं हो सका है। यही कारण है कि ये नंग-धड़ंग कालक्षेप कर रहे हैं। इनके पुत्रोंने जो श्राद्ध-क्रिया की थी, उसमें त्रुटि रह गयी थी। इसी लिये पितृगण गाथा गाते हैं कि 'क्या हमारे कुलमें ऐसा कोई व्यक्ति जन्म लेगा, जो प्रभूत जलवाली नदियोंमें 'तृप्यध्वं०, उदीरतां०, आयन्तु०' इत्यादि मन्त्रोंसे हमारा तर्पण एवं उनके तटपर श्राद्ध करेगा। महाप्राज्ञ! आपने मुझसे जो पूछा था, संक्षेपमें उसका यही उत्तर है।'
वसुंधरे! यह सब सुनकर वे ऋषि राजा चन्द्रसेनके पास पहुँचे। उन ऋषिको देखकर राजा सिंहासनसे उठकर पृथ्वीपर खड़े होकर उनके चरणोंमें मस्तक झुकाकर कहा—'मुनिवर! आप मेरे घरपर पधारे, इससे मैं धन्य एवं कृतार्थ हो गया। आपके यहाँ आ जानेसे मेरा जन्म सफल हो गया। मुने! पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क और गौ—ये सभी वस्तुएँ आपकी सेवामें समर्पित हैं। इन्हें आप स्वीकार करें, जिससे मुझे पूर्ण संतोष हो जाय।'
देवि! उस समय राजा चन्द्रसेनके दिये हुए अर्घ्य आदिको स्वीकार करके त्रिकालज्ञ मुनिने