भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १८१-१८२ ] काष्ठ-पाषाण-प्रतिमाके निर्माण, प्रतिष्ठा एवं पूजाकी विधि ३२९

स्वरको सुनकर मैं वहाँ आ जाता हूँ। क्योंकि वेद-मन्त्रका पाठ मुझे परम प्रिय है। किंतु वहाँ अनर्गल प्रलाप नहीं होना चाहिये।

पुण्यव्रती व्यक्ति पूजाके समय इस अर्थवाले मन्त्रको पढ़कर आवाहन करे—‘भगवन्! छः प्रकारके कर्मोंमें आपकी प्रधानता है। आप पाँचों इन्द्रियोंसे सम्पन्न होकर यहाँ पधारनेकी कृपा कीजिये। जगत्प्रभो! आपमें सभी वेदमन्त्र स्थान पाये हुए हैं। समस्त प्राणियोंकी स्थिति भी आपहीमें है। यह अर्चा आपके रहनेका सुरक्षित स्थान है।’ इसी अर्थके मन्त्रका उच्चारण करते हुए तिल, घृत, समिधा और मधुसे एक सौ आठ आहुतियाँ भी देनी चाहिये। देवि! मैं इस विधिके द्वारा प्रतिमामें प्रतिष्ठित हो जाता हूँ*। फिर प्रातःकाल स्वच्छ जलमें स्नान करे और मन्त्र पढ़कर पञ्चगव्यका पान करे। अनेक प्रकारके गन्ध, पुष्प और लाजा आदिका प्रयोग कर फिर माङ्गलिक गीत-वाद्यके साथ प्रतिमाको मध्यभागमें एक ऊँचे स्थानपर स्थापित करे। सब प्रकारके सुगन्धोंको लेकर फिर प्रार्थना करे—‘भगवन्! जिन्हें लक्षणोंसे लक्षित, देवी लक्ष्मीसे सुशोभित तथा सनातन श्रीहरि कहते हैं, वे आप ही तो हैं। प्रभो! हमारी प्रार्थना है कि परम प्रकाशसे सुशोभित होकर आप यहाँ विराजिये। आपको मेरा बारम्बार नमस्कार है।’

इस प्रकार भगवान्‌की शैलार्चाकी स्थापना कर उसका अनुलेपन (उबटन) करना चाहिये। चन्दन-कुंकुमादिसे मिला हुआ ‘यक्षकर्दम’ का उद्वर्तन (उबटन) श्रेष्ठ है। इस प्रकार उद्वर्तन अर्पण करके इस अर्थका मन्त्र पढ़ना चाहिये—‘प्रभो! आप सम्पूर्ण संसारमें प्रधान हैं तथा ब्रह्मा और बृहस्पतिने आपकी भलीभाँति पूजा की है। आप अखिल लोकके कारण एवं मन्त्रयुक्त हैं। भगवन्! मैं आपका इस मन्त्रके द्वारा स्वागत करता हूँ। आप यहाँ विराजनेकी कृपा कीजिये।’ इस विधिसे भलीभाँति स्थापना करके गन्ध एवं फूलोंसे पूजा करनी चाहिये। मेरे विग्रहपर पहले श्वेत वस्त्र चढ़ाना चाहिये। वस्त्र अर्पण करते समय इस अर्थका मन्त्र पढ़े—‘देवेश! भक्तिपूर्वक वस्त्र आपके लिये अर्पित करता हूँ। विश्वमूर्ते! इन वस्त्रोंको आप ग्रहण करके मुझपर प्रसन्न होइये। आपको मेरा बारम्बार नमस्कार है।’

तत्पश्चात् कुंकुम और अगुरुसे मिला हुआ धूप देना चाहिये। धूप देते समय इस अर्थका मन्त्र पढ़ना चाहिये—‘देवेश! जो आदिरहित, पुराणपुरुष तथा सम्पूर्ण संसारमें सर्वोपरि शोभा पाते हैं, वे भगवान् नारायण! आप चन्दन, मालाएँ, धूप और दीप स्वीकार करनेकी कृपा कीजिये। आपको मेरा निरन्तर नमस्कार है।’

इस प्रकार पूजा करनेके पश्चात् भगवत्प्रतिमाके सामने नैवेद्य अर्पण करना चाहिये। प्रापण-अर्पण करनेका मन्त्र पूर्वमें बतला दिया गया है, उसीका उच्चारण करके विज्ञ पुरुष उसे अर्पित करे। शरीरकी शुद्धिके लिये नैवेद्यके बाद आचमन देना आवश्यक है। शान्ति-पाठ करे। क्योंकि शान्तिका पाठ करनेसे सम्पूर्ण कार्योंमें सिद्धि सुलभ हो जाती है। मन्त्रका भाव यह है—‘जगत्प्रभो! ओंकार आपका स्वरूप है। आप ऐसी कृपा करें


* यह प्रतिमा-प्रतिष्ठाकी अत्यन्त संक्षिप्त विधि है। विशेष जानकारीके लिये—‘शारदातिलक’, ‘प्रतिष्ठामयूख’ (भगवन्तभास्कर), ‘प्रतिष्ठा-महोदधि’, ‘कल्याण’-अग्निपुराणाङ्क, अध्याय ९२ से १०३ तक देखना चाहिये। प्रतिमा-निर्माणके बाद कर्मकुटी, जलानाधिवासन, ग्रामादिप्रदक्षिणा, हवन-प्रतिष्ठा, न्यासादि कर्म भी करने आवश्यक होते हैं।